भारत सरकार का शिक्षा मंत्रालय पिछले कुछ समय से चर्चा में है। अच्छे नहीं, बुरे कारणों से। नीट-यूजी परीक्षा पेपर लीक मामले में आज सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान एसजी तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद, इस मामले की निगरानी कर रहे हैं।
एक दिन पहले शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ तस्वीर सार्वजनिक हुई। इस तस्वीर के साथ खबर आई कि नीट-यूजी परीक्षा के पर्चों के वितरण में वायु सेना की मदद ली जा सकती है। रक्षा मंत्री और शिक्षा मंत्री की इस बैठक में संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी उपस्थित थे।
नीट-यूजी विवाद के बीच ही सीबीएसई के एक छात्र ने नई चर्चा शुरू कर दी। छात्र को सीबीएसई ने गलत उत्तर-पुस्तिका दे दी। विवाद होने के बाद सही उत्तर-पत्रिका दी गयी मगर तब तक केंद्रीय शिक्षा बोर्ड की एक बड़ी लापरवाही दुनिया के सामने आ चुकी थी।
नीट-यूजी और सीबीएसई से पहले एनसीईआरटी में न्यायपालिका पर लिखे गये अध्याय को लेकर सुप्रीम कोर्ट भड़क गया। एनसीईआरटी में इतिहास से जुड़े अध्याय पर भी विवाद हुआ। एनटीए के माध्यम से ली जाने वाली परीक्षाओं से जुड़े विवाद भी सामने आए। अगर विवादों के हिसाब से रैंकिंग बनाएं तो शिक्षा मंत्रालय मोदी सरकार का सबसे विवाद-प्रिय मंत्रालय माना जा सकता है। मगर पिछले 12 साल में किसी शिक्षा मंत्री ने किसी भी विवाद के बाद पद से इस्तीफा नहीं दिया।
कोई कह सकता है कि मोदी सरकार के किसी मंत्री ने किसी भी अशोभनीय विवाद के बाद इस्तीफा नहीं दिया तो शिक्षा मंत्रालय से त्यागपत्र की उम्मीद क्यों करें? कोई कह सकता है कि वह ओल्ड इंडिया था जिसमें रेल दुर्घटना होने रेल मंत्री इस्तीफा देते थे, आतंकी वारदात से जुड़ा विवाद होने पर गृह मंत्री इस्तीफा देते थे, भ्रष्टाचार के आरोप लगने पर संचार मंत्री इस्तीफा देते थे!
‘न्यू इंडिया’ में मंत्री इस्तीफा नहीं देते, टीवी चैनलों पर जाकर लम्बे-लम्बे इंटरव्यू देते हैं! मंत्री इंटरव्यू क्यों न दें! जब प्रधानमंत्री खुद उनके बिगड़े मामलों की निगरानी करने के लिए उपस्थित रहते हैं, रक्षा मंत्री और संचार मंत्री मिलकर संकट से निकलने की योजना बनाते हैं, तो फिर इ्स्तीफा किस बात का! लेकिन कोई यह भी पूछ सकता है कि जिस मंत्री के मामले की निगरानी प्रधान मंत्री को करनी पड़ती है, रक्षा मंत्री और संचार मंत्री को मिलकर योजना बनानी पड़ रही है, उसे नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे देना चाहिए!
“नैतिकता के आधार पर इस्तीफा” जुमला सुनकर चौंकने की जरूरत नहीं। भारत की जेन-जी को शायद यह अजूबा लगे कि कभी नेता नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दिया करते थे। ‘न्यू इंडिया’ में शायद यह नैतिक आधार गायब हो चुका है इसलिए नैतिकता के नाम पर इस्तीफे भी नहीं होते।
ऐसा भी नहीं है कि पीएम मोदी ने अपने मंत्रिमंडल में मंत्रियों को जोड़ा-घटाया नहीं है मगर हर बार जनता के बीच यह सन्देश गया कि फलाँ के काम से पीएम नाखुश थे, उनका रिपोर्ट कार्ड खराब था! ऐसा सन्देश कभी नहीं गया कि फलाँ के मंत्रालय की फलाँ बड़ी विफलता के बाद उनसे नैतिक आधार पर इस्तीफा ले लिया गया!
हम कह सकते हैं कि मोदी कैबिनेट में नैतिकता से ज्यादा असरदार है, पीएम मोदी की नाराजगी! जब जनता पीड़ित और आक्रोशित होकर इस्तीफा माँग रही हो तब मंत्री से इस्तीफा ले लेने से वह सन्देश नहीं जाएगा जो प्रधानमंत्री द्वारा छमाही या सालाना समीक्षा में रिपोर्ट कार्ड खराब होने पर “नौकरी” चले जाने की खबर से जनता के बीच जाएगा। पिछले 12 साल में यह कहानी कई बार दुहराई जा चुकी है। नीट-यूजी और सीबीएसई की भसड़ के बाद भी शायद वही कहानी दुहराई जाए। मेरे ख्याल से, देश को अब ‘न्यू इंडिया’ की इस ‘न्यू नैतिकता’ की आदत डाल लेनी चाहिए!
