खेलों से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं, पर सीखते नहीं। न ही कभी कोशिश करते हैं। शायद इसीलिए हम अपने बच्चों को खेलने के लिए प्रेरित नहीं करते, बल्कि खेल के समय में कटौती कर उन्हें पढ़ने पर जोर देते हैं। मानो हम खेलों की अनदेखी कर रहे हों। जबकि पढ़ाई का अपना महत्त्व होता है, तो खेलों की अपनी अहमियत है। खेलों से हम अनुशासन ही नहीं, भाईचारा यानी सौहार्द भी सीखते हैं। खेलों की दुनिया में कोई भी किसी खास धार्मिक पहचान में कैद नहीं होता। सब सूरत से और सीरत से भी सिर्फ खिलाड़ी होते हैं। जाति-धर्म, भाषा-रंग और देश-प्रदेश सब भूल कर जब ये खेल के परिधान में आते हैं, तो एक ही रंग में हो जाते हैं। जीत की तरंग में जिस झंडे के तले खेल रहे होते हैं, उसकी शान में पूरी जान लगा देते हैं।

समानता का उदाहरण बताने के लिए यह पर्याप्त होगा कि गली-मोहल्ले में क्रिकेट खेली जा रही हो या फुटबाल या कोई अन्य खेल, वहां खिलाड़ियों के लिए पानी से भरी एक बाल्टी होती है और उसमें रखा होता है एक गिलास, एक-एक कर खिलाड़ी अपनी प्यास बुझाता है, बिना किसी भेदभाव के। पानी का एक गिलास या एकता का पाठ पढ़ाया करता है। संघर्ष कर रहे खिलाड़ियों के लिए वहां पानी राहत का काम करता है, तो जीत की ओर बढ़ रहे खिलाड़ियों को धैर्य का संदेश देता है। फिर भी न जाने क्यों, हम कुछ नहीं सीखते!

देखा जाए तो खेलों से हिम्मत आती है, साहस का संचार होता है। और तो और, एक जिद पनपती है, जिसे दृढ़ इच्छाशक्ति या एक जुनून कह सकते हैं। बेरुखी में दीवानापन का नाम भी दे दिया जाता है। इसकी वजह भी है कि खेलने पर जब हम आते हैं, तो खेलते ही चले जाते हैं। न रात देखते हैं, न दिन। भूखे-प्यासे खेलने में इतने मस्त कि न धूप की चिंता, न बारिश का भय। बिल्कुल बेपरवाह। बचपन में बच्चे खेलते तो अपनी उम्र के हिसाब से ही हैं, पर हंसी इसलिए आती है इन पर कि इनके खेल निराले होते हैं… बचपने भरे। कभी घर-घर खेलते हैं, तो कभी डाक्टर-डाक्टर या छुप्पम-छुपाई जैसे अनेक खेल। खुल कर खेला करते हैं बच्चे। बीच-बीच में खेलते हुए लड़ते हैं, तो लड़ते हुए खेलते हैं। यानी कभी कुट्टी करते हैं, फिर तुरंत ही रजामंदी की पुच्ची भी कर लेते हैं। यही आगे चल कर जीवन-शैली बना ली जाए, तो कहने क्या?

असल में बचपन की लड़ाई थोड़ी देर के लिए होती है। प्रमुख होता है खेलना… खेलते रहना। एक पार्क में कुछ बच्चे आपस में खेल रहे थे। एक बच्चे ने दूसरे को धक्का दे दिया। धक्के से वह बच्चा गिर गया और रोने लगा। धक्का देने वाला बच्चा उसे देख खुद भी रोने लगा। इसे देखा-देखी के असर में रोना कहना उचित नहीं। असल में धक्का देने वाला वह बच्चा जानता है कि उसे इसकी सजा मिल सकती है। इससे बचने की सोची-समझी तरकीब भी समझी जा सकती है। यह भी संभव है कि गिरने वाले बच्चे को रोते देख उसके भीतर डर पैदा हो गया हो और वह भी रोने लगा। वैसे गिराना-उठाना खेलों का हिस्सा होते हैं। खेल ही सिखाते हैं दम से खेलो, जम के खेलो।

खेलों से रणनीति ही नहीं, कूटनीति भी सीखना चाहिए। क्रिकेट, हाकी, फुटबाल, बाक्सिंग आदि खेलों में सिखाया जाता है कि आगे बढ़ कर खेलो। पहले खुद पहल करो, ताकि विपक्ष के खिलाड़ी बचाव करें। क्रिकेट के विशेषज्ञ कहते हैं कि गेंद को बाहर ही मारो, घर में घुसने न दो। कहने का तात्पर्य यह कि बल्लेबाज को ‘फ्रंटफुट’, यानी आगे बढ़ कर बल्लेबाजी करनी चाहिए। पीछे जाकर ‘बैकफुट’ खेलने से कोई फिरकी गेंद विकेट गिरा सकती है। ऐसे ही हाकी या फुटबाल जैसे खेलों में पीछे हट कर खेलने से ‘सेल्फ गोल’ हो जाया करते हैं। इसलिए खेलों में आक्रामक खेलना उच्च कोटि की कूटनीति मानी जाती है।

जैसे-जैसे बच्चों की उम्र बढ़ती है, बच्चे स्कूल से कालेज जाने लगते हैं, तो वे खेलों से संघर्ष करना ही नहीं, बल्कि सौहार्दपूर्ण मुकाबला करना सहज ही सीख लेते हैं। आमतौर पर खेलने से पहले और खेल के बाद कोई हारे या कोई जीते, पर रेफरी या अंपायर खिलाड़ियों के आपस में हाथ मिलवाते हैं। दर्शकों का इनसे यथा आदर-अभिवादन भी करवाते हैं। यह एक अच्छा और स्वच्छ तरीका होता है मन के खुले भाव प्रदर्शित करने का। खेलते वक्त जीतने की लालसा में खिलाड़ी खेल के नियम-कायदे भुलाकर लड़ते-झगड़ते भी देखे जाते हैं। फिर भी सबसे प्रमुख यह कि रेफरी, जज या अंपायर, जो भी अंतिम निर्णय देते हैं, वह खेल-भावना के तहत सभी को स्वीकार्य होते हैं।

चूंकि खेल एक जरूरत है, इसलिए देखकर खेलना या खेलकर देखना चाहिए, पर खेल सदा चलते रहने चाहिए। सही और उज्ज्वल भविष्य निर्माण के लिए खेलों की महती भूमिका होती है। मौसम और वातावरण के अनुरूप दुनिया में खेल खेले जाते हैं। हाकी, क्रिकेट, फुटबाल, बैडमिंटन, बालीबाल आदि प्रमुख खेल हैं। हालांकि मुख्य रूप से दो खेलों को प्रचार मिलता है- क्रिकेट या फुटबाल। क्रिकेट कुछ महंगा खेल है। इसमें हर खिलाड़ी को बैट, पैड, जूते, दस्ताने, हेलमेट आदि महंगी चीजों की जरूरत पड़ती है, जबकि फुटबाल आम लोगों के लिए होती है। केवल फुटबाल वाले जूते पहन के खेला जाए या नंगे पांव। बस खेल-भावना बनी रहनी चाहिए।