School Education: किसी बच्चे के जीवन में भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह उसके सोचने, समझने और संसार को पहचानने की पहली खिड़की भी होती है। जन्म के बाद बच्चा जिस भाषा में अपने माता-पिता से स्नेह पाता है, अपने आसपास की वस्तुओं को पहचानता है और अपने विचार व्यक्त करना सीखता है, वही उसकी मातृभाषा होती है। इसलिए जब शिक्षा की शुरुआत उसी परिचित भाषा में होती है, तो सीखना बच्चे के लिए बोझ नहीं, बल्कि एक सहज और उत्साहजनक प्रक्रिया बन जाती है।
मातृभाषा की यह शक्ति अद्भुत है। भारत भाषाई विविधता से समृद्ध देश है। यहां अलग-अलग क्षेत्रों में अनेक भाषाएं और बोलियां प्रचलित हैं। प्रत्येक भाषा अपने भीतर उस क्षेत्र का इतिहास, संस्कृति, लोक ज्ञान और जीवन-अनुभव समेटे हुए है। ऐसे में मातृभाषा में शिक्षा का महत्त्व केवल शैक्षणिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, यह बच्चों को उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का भी माध्यम है।
प्रारंभिक कक्षाओं में बच्चे के सामने दोहरी चुनौती होती है। उसे एक ओर नए विषय और नई अवधारणाएं समझनी होती है, दूसरी ओर यदि पढ़ाई किसी अपरिचित भाषा में हो रही हो, तो पहले उस भाषा को समझने का प्रयास करना पड़ता है। इससे कई बार बच्चे की वास्तविक बौद्धिक क्षमता सामने नहीं आ पाती। वह विषय को समझने के बजाय शब्दों और उनके अर्थ याद करने में उलझ जाता है। इसके विपरीत, परिचित भाषा में पढ़ाए जाने पर वह प्रश्न पूछने, उदाहरण देने और अनुभवों को पाठ से जोड़ने में अधिक सहज महसूस करता है। सरकारी नीतियों में इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। मातृभाषा में शिक्षा का सबसे बड़ा लाभ अवधारणाओं की स्पष्ट समझ है।
यदि किसी बच्चे को गणित, विज्ञान या पर्यावरण से जुड़ी बात उसके घर एवं परिवेश की भाषा में समझाई जाए, तो वह उसे अपने दैनिक जीवन से आसानी से जोड़ सकता है। जल संरक्षण, खेती, मौसम या स्थानीय वनस्पतियों से जुड़े विषयों को परिचित शब्दों और स्थानीय उदाहरणों के माध्यम से प्रभावी ढंग से समझाया जा सकता है। ऐसी शिक्षा केवल परीक्षा के लिए याद की गई जानकारी नहीं होती, बल्कि लंबे समय तक स्मृति में रहने वाला ज्ञान बन जाती है।
भाषा का आत्मविश्वास से भी गहरा संबंध है। यह चिंता की बात है कि कई बच्चे केवल इसलिए कक्षा में प्रश्न नहीं पूछते, क्योंकि वे शिक्षण की भाषा में स्वयं को सहजता से व्यक्त नहीं कर पाते। यह झिझक उनके आत्मविश्वास को प्रभावित करने लगती है। कभी-कभी भाषा की कमजोरी को ज्ञान की कमी समझ लिया जाता है, जबकि दोनों अलग बातें हैं। मातृभाषा में अपनी बात रखने का अवसर मिलने पर बच्चा अधिक सक्रिय होकर कक्षा की गतिविधियों में भाग लेता है। उसे यह अनुभव होता है कि उसकी भाषा और उसके विचारों का भी सम्मान है। ऐसे में मातृभाषा में शिक्षा की पहल महत्त्वपूर्ण है।
इसी व्यापक सोच के बीच विद्यालयी शिक्षा में तीन भाषाओं को पाठ्यक्रम से जोड़ने की व्यवस्था चर्चा का विषय बनी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा के अनुरूप केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने त्रि-भाषा व्यवस्था लागू करने की दिशा में नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके अंतर्गत विद्यार्थियों को तीन भाषाओं का अध्ययन करना होगा और उनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं होंगी। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने भी विभिन्न भारतीय भाषाओं में शिक्षण सामग्री और पुस्तकों की उपलब्धता बढ़ाने की दिशा में प्रयास किए हैं। यह एक सार्थक पहल है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य विद्यार्थियों को अपनी भाषा से जोड़े रखते हुए उन्हें अन्य भाषाओं को सीखने का अवसर प्रदान करना है। निश्चित रूप से इसके सार्थक नतीजे निकलेंगे। इस निर्णय पर समाज में अलग-अलग वर्ग से प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। अनेक शिक्षाविदों और अभिभावकों का मानना है कि एक से अधिक भारतीय भाषाओं का ज्ञान बच्चों की संवाद क्षमता को बढ़ाएगा और उन्हें देश की भाषाई विविधता को समझने में सहायता करेगा। नई भाषा सीखने से स्मरण शक्ति, रचनात्मकता और विभिन्न संस्कृतियों के प्रति संवेदनशीलता विकसित होगी।
वहीं, कुछ अभिभावकों, विद्यार्थियों व विद्यालयों ने व्यावहारिक चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया है।
उनकी चिंता है कि माध्यमिक कक्षाओं में अचानक नई भाषा जोड़ने से विद्यार्थियों पर अतिरिक्त शैक्षणिक दबाव पड़ सकता है। कुछ विद्यालयों में अलग-अलग भाषाओं के प्रशिक्षित शिक्षकों और पर्याप्त पाठ्य सामग्री की उपलब्धता भी चुनौती हो सकती है। पहले से विदेशी भाषा पढ़ रहे विद्यार्थियों के सामने विषय बदलने व नई भाषा के साथ तालमेल बैठाने की कठिनाई भी सामने आ सकती है। हालांकि इन चिंताओं को देखते हुए कुछ लचीले प्रावधान किए गए हैं। यह दर्शाता है कि किसी भी शैक्षणिक सुधार की सफलता केवल उसके उद्देश्य पर नहीं, बल्कि उसके संवेदनशील और व्यवस्थित क्रियान्वयन पर निर्भर करती है और यह जरूरी भी है।
तीन भाषाएं सीखना तभी लाभकारी होगा, जब इसे अंकों व परीक्षाओं के अतिरिक्त बोझ के रूप में न देखा जाए। भाषा को कहानियों, कविताओं, संवाद, नाटक, लोकगीत और दैनिक जीवन के अनुभवों से सिखाया जाना चाहिए। विद्यार्थियों को भाषा चुनने में पर्याप्त विकल्प मिलें तथा किसी क्षेत्र की भाषाई परिस्थितियों और विद्यालयों के उपलब्ध संसाधनों का भी ध्यान रखा जाए। भाषा सीखने का उद्देश्य संवाद व समझ का विस्तार होना चाहिए, केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं। यह भी समझना जरूरी है कि मातृभाषा को महत्त्व देने का अर्थ अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा के महत्त्व को कम करना नहीं है।
आज उच्च शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और वैश्विक रोजगार के क्षेत्र में अंग्रेजी सहित अनेक भाषाओं का ज्ञान उपयोगी है। आवश्यकता किसी एक भाषा को दूसरी भाषा का प्रतिस्पर्धी बनाने की नहीं, बल्कि उनके बीच संतुलन स्थापित करने की है। बच्चे की बुनियादी शिक्षा उस भाषा में मजबूत होनी चाहिए, जिसे वह सहजता से समझता है।
मातृभाषा में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए केवल नीतिगत घोषणाएं पर्याप्त नहीं होंगी। इसके लिए अच्छी पाठ्यपुस्तकों, प्रशिक्षित शिक्षकों, वैज्ञानिक शब्दावली, डिजिटल सामग्री और स्थानीय भाषाओं में उपयोगी शैक्षणिक संसाधनों का विकास आवश्यक है। साथ ही अभिभावकों को भी यह समझना होगा कि किसी बच्चे की प्रतिभा का मूल्यांकन केवल उसके अंग्रेजी बोलने की क्षमता से नहीं किया जा सकता। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य बच्चे को केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि उसे स्वतंत्र रूप से सोचने, प्रश्न पूछने और आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखने योग्य बनाना है।
मातृभाषा इस उद्देश्य तक पहुंचने का सबसे सहज मार्ग हो सकती है। अगर विद्यालय बच्चों की अपनी भाषा को सम्मान देते हुए उन्हें अन्य भाषाओं से भी परिचित कराएं, तो शिक्षा अधिक समावेशी, प्रभावी और जीवन से जुड़ी बन सकती है। भाषा जब सीखने की बाधा नहीं, बल्कि ज्ञान तक पहुंचने का पुल बनती है, तभी शिक्षा अपने वास्तविक अर्थ को हासिल करती है।
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स्वतंत्रता दिवस जब भी पास आता है, मुझे एक चीज बहुत तकलीफ देती है। वह है छोटे बच्चों को तिरंगा बेचते हुए देख कर जो दिल्ली और मुंबई की ट्रैफिक बत्तियों पर खड़े दिखते हैं। इन बच्चों के चेहरों पर थकावट नजर आती है, अक्सर इन बच्चों के बाल बेरंग होते हैं कुपोषण की वजह से। अक्सर नंगे पांव होते हैं और इनके कपड़े दर्शाते हैं। इनके माता-पिता की गरीबी। कई बार बच्चे इतने छोटे होते हैं कि उनके हाथ गाड़ी की खिड़की तक नहीं पहुंचते हैं, कई बार बारिश से भीगे होते हैं वे तिरंगे झंडे, जिन्हें बेचने की कोशिश में रहते हैं। पढ़िए पूरी खबर…
