यों तो ‘स्वभावोक्ति’ का अर्थ है किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थिति का उसके स्वाभाविक रूप में, बिना बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किए, यथार्थ चित्रण करना। जब हम ‘जीवन की स्वभावोक्ति’ की बात करते हैं, तो इसका अर्थ है जीवन को वैसे ही स्वीकार करना और वर्णित करना। जीवन में अनुभव, जीवन-संबंधी धारणाओं, जीवन की जय-पराजय आदि उतरना अस्वाभाविक प्रतीति नहीं है। इसके प्रस्थान-बिंदु बहुत गहराई में होते हैं, जिसमें उतार और चढ़ाव का नवाचार भी होता है, जो सबका बिल्कुल अलग-अलग होता है। जीवन में एक ही विषय पर सबके अनुभव बिलकुल अलग-अलग हो सकते हैं, अपनी ‘स्वभावोक्ति’ के साथ। उन अनुभवों को कहने से पहले बहुत कुछ घटित हो चुका होता है।

दरअसल, भाषा बोलने-पढ़ने-लिखने के पहले हम ‘देखते’ हैं। यह सारा संसार एक दृश्य-लेख की तरह हमारे सामने उपस्थित होता है। हम अपने-अपने परिप्रेक्ष्य के बंदी होते हैं। अपनी ‘स्वभावोक्ति’ को सबसे अधिक महत्त्व देते हैं। हम जानते हैं समाज में असंतोष और प्रतिरोध हर व्यक्ति के भीतर घटित होता है। यह एक सुदीर्घ और अनवरत परंपरा है, जो उत्तरोत्तर जीवन की मुख्यधारा के स्तर पर प्रतिष्ठित होती गई है, लेकिन उनमें मानव-नियति, मानव के अस्तित्व, मनुष्य केंद्रित मौलिक अनुभव होना जरूरी है। केवल घोषित प्रतिरोध छलावा है।

मानवीय सघनता स्वभावोक्ति का सत्व है। मानवीय संसक्ति की पहली और आखिरी शर्त मानव जीवन है, चाहे वह एक सीमा तक विरोधाभासों से क्यों न भरा हो। जीवन में निराशा, हताशा, संत्रास, ऊब, भय सब कुछ खप जाता है। जीवन यह सब पचाने की क्षमता रखता है। बल्कि यह मनुष्य के स्वभाव में है। आज एक संवेदनशील चौकन्नेपन के साथ लोगों के भीतर पसरे ‘सूखे’ को भी तरल बनाना होगा। हमें अनुभव की सीढ़ियों पर धीरे-धीरे चढ़ना सीखना होगा। आखिर छोटे-छोटे ईमानदार प्रयास धीरे-धीरे शक्ल लेते हैं।

इन दिनों हमारी बौद्धिक प्रक्रिया इतनी तीव्र हो गई है कि वह हृदय के क्षेत्र से अनभिज्ञ हो रही है। एक स्थिर, रुके हुए, स्व-विवादों, व्यक्तिगत कुंठाओं से भरे समकाल में वर्तमान में उपस्थित मानवीय संकटों से भविष्य की संभावनाओं को कैसे तराशा जाएगा, यह प्रश्न खड़ा है। एक तरह की भ्रामक स्थिति कभी-कभी मन में निर्मित होने लगती है, जो रफ्तार और व्यस्तता हम महसूस कर रहे हैं, क्या जीवन वाकई उतनी ही गति से आगे बढ़ रहा है? भले ही हमें सब कुछ तेज गति में देखने की आदत-सी हो गई है, पर वास्तविकता ठहराव की है।

एक छोटे-से स्थायी बदलाव के लिए जीवन को कितना गहरा और लंबा संघर्ष करना पड़ता है। जबकि हम उससे बच रहें हैं, इसलिए जीवन से स्थायित्व समाप्त हो रहा। प्रगति और प्रयास साथ-साथ चलते हैं, लेकिन इनके साथ बहुत कुछ दबा-छिपा भी होता है, जो दिखाई नहीं देता। हम तेज रफ्तार में उसे धूमिल कर देते हैं।

जीवन का प्रत्येक क्षण, हर घटना किसी प्रयोगशाला की तरह है

आज स्मृतिहीनता, डर, अवसाद, असहायता, तात्कालिकता आदि साहित्य और कलाओं के विषय बन जरूर रहे हैं, लेकिन मनुष्य को मनुष्य से नहीं जोड़ रहे। तमाम सुख-सुविधाओं के बावजूद आज का मनुष्य चक्की के दो निर्मम पाटों के बीच पिस रहा है। देखा जाए, तो जीवन का प्रत्येक क्षण, हर घटना किसी प्रयोगशाला की तरह है। शांत नीरवता है, तो आवेग भी। इसी में चट्टानों से थपेड़े खाकर भी अडिग रहने वाला पहाड़ी स्वभाव भी, लेकिन जीवन का प्रत्येक क्षण अपनी प्रासंगिकता में रहे, यह जरूरी नहीं, क्योंकि हर स्वभाव की प्रकृति है हर प्रकृति में कुछ गुण-अवगुण। व्यक्ति को भावुकता और स्वभाव-कोमल दुर्बलता के कारण जीवन में अधिक संघर्ष करना पड़ता है और अपनी महत्त्वाकांक्षा के कारण बाहर के संसार के अतिरिक्त अपने अंतर्जगत से भी निरंतर जूझते रहना पड़ता है।

जीवन में पश्चाताप आंतरिक भावनाओं से संबंधित है। यह स्वभाव में निहित होकर भी कभी मुखर नहीं होता। पश्चाताप तभी हो सकता है, जब हमारे पास उदारता हो। जिस परिवेश में हम हैं, वहां पश्चाताप करने की स्थिति तो कई बार निर्मित हो सकती है, लेकिन हम करते नहीं, क्योंकि हम एक ऐसे युग में पैदा हुए हैं, जिसमें हर मनुष्य का जीवन मौजूदा उतार-चढ़ावों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है।

कभी-कभी ऐसा लगता है कि इस आपाधापी में मनुष्य अपनी मानसिक सीमाओं के रहते हुए शांति, जीवन-सौंदर्य और लोकमंगल के स्वर्ग को प्रतिष्ठित नहीं कर सकता। मनुष्य को दो समायोजन जीवनपर्यंत समझने होते हैं। एक बाहर, एक भीतर का। दोनों ही उसके स्वभाव से टकराते हैं। हालांकि जीवन का स्वभाव ही परिवर्तन है। सुख-दुख, सफलता-असफलता, उतार-चढ़ाव- सब समय के प्रवाह में आते-जाते रहते हैं।

आज चारों ओर से हमारी सोच और भावनाओं, विचारों, विचारधाराओं ने और धर्मों तथा पूर्वाग्रहों ने ऐसे घेर रखा है, जैसे मनुष्य स्वत: प्रवाह से नियतिकृत जीवन न जीकर किसी बनावटी दुनिया का सांचा तैयार कर रहा है। एक समय था, जब मनुष्यों के माध्यम से जीवन में व्यक्त होने वाली सच्चाई मिलती थी। अब घटनाओं में भी सच्चाई को तलाशना पड़ता है।

जमीन पर आधारित पारिवारिक जीवन जीने का दौर किस प्रकार खत्म हो रहा है, हमें समझना होगा। ऐसे में बाजारी खतरों के बीच भी इंसानी अहमियत और समाजी इंसाफ के सवालों को व्यक्ति कब तक कितनी दृढ़ता से थामे रखता है। आखिर जीवन यात्रा का अर्थ अपनी इच्छाओं के साथ दूसरों को जीवन को भी बेहतर बनाने में निहित है।

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हर सफल संस्था की रीढ़ ईमानदार और परिश्रमी लोगों से बनती है। किसी दफ्तर, विद्यालय या शासन व्यवस्था की गाड़ी उन गिने-चुने लोगों के श्रम, निष्ठा और जिम्मेदारी से चलती है, जो अपने कर्तव्य को धर्म समझते हैं। ऐसे लोग बिना किसी पुरस्कार या प्रशंसा की अपेक्षा के अपने हिस्से का काम पूर्ण मनोयोग से करते हैं। इन्हीं लोगों के परिश्रम के कारण ही कई खोटे सिक्के भी सहजता से चल जाते हैं। वे जानते हैं कि संस्था की साख इन ईमानदार लोगों से बनी है, इसलिए खोटे कर्मचारियों के दोष उसी उज्ज्वल साख की परछाई के पीछे छिप जाते हैं। एक कहावत है कि खोटे सिक्के खरे सिक्कों की आड़ में चल पाते हैं। यह तथ्य केवल बाजार या मुद्रा तक सीमित नहीं, यह तो जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है। वैसे सरकारी दफ्तरों का उदाहरण देखा जा सकता है, जहां असंख्य खरे सिक्के भी हैं, ईमानदार, कर्मठ, जिम्मेदार कर्मचारी, पर इनको अक्सर खोटे सिक्कों के साथ सहअस्तित्व बना कर चलना पड़ता है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक