किसी दौर में हम सुबह उठकर अपने घर के बड़े-बुजुर्गों के पांव छूते थे और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हुए रोजमर्रा की सामान्य बातचीत के दौरान परिवार और समाज की स्थिति से संबंधित ज्ञान बटोरते थे। बुजुर्गों के अनुभव सुनते हुए हम अपनी बौद्धिक क्षमता में वृद्धि करते थे और साथ ही उनकी आज्ञा को भी शिरोधार्य करते थे।

इसी प्रकार, स्कूल और कॉलेज में भी गुरुजन हमारे ही हित के बारे में सोचते थे। भले ही उनकी डांट-फटकार, सवाल पूछने आदि की सख्ती हमें तब प्रताड़ना या उपेक्षा लगती रही हो, लेकिन उनके पढ़ाने का उद्देश्य सिर्फ हमें अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाना नहीं होता था, बल्कि वे हमारे सर्वांगीण विकास के बारे में सोचते थे।

समाज में हम आदर प्राप्त कर सकें और आने वाली पीढ़ी के लिए आदर्श भी बन सकें, वे अपने स्तर पर हमें ऐसे व्यक्तित्व में ढालने का प्रयास करते थे। हम समाज के विकास के लिए समाज से जुड़े किसी व्यक्ति विशेष से चर्चा किया करते थे, जिनसे हमारे व्यक्तित्व के विकास का रास्ता भी खुलता था।

हम ऐसी गोष्ठियों और सभाओं में भी अवश्य जाते थे, जहां सामाजिक, शारीरिक और बौद्धिक विषयों की चर्चा हुआ करती थी। अपने कार्य के दौरान या नौकरी करते हुए भी हम एक आदर्श का पालन करते थे और अनुभवी लोगों के अनुभवों को आधार बनाते थे।

मगर आज वक्त बदल गया है और इस बदले हुए वक्त में पुरानी पीढ़ी से लेकर नई पीढ़ी और उसके बाद की पीढ़ी वाले बच्चों की भी अपेक्षाएं आसमान पर हैं। बल्कि कहा जाना चाहिए कि दो-तीन या चार दशक पहले जो इच्छाएं-अपेक्षाएं जमीनी हकीकतों से दो-चार थीं, वे अब नए स्वरूप में पूरी तीव्रता से उड़ान भर रही हैं।

वर्तमान में हम देखते हैं कि हमारे देश में बहुत से लोग स्वयं को परम ज्ञानी मानते हैं। बाहर से वे भले ही विद्वान बने रहने का प्रयास करते हैं, लेकिन जब उनके भीतर झांककर देखा जाए, तो वहां खोखलापन नजर आता है। दरअसल, उनमें वह अदब ही नहीं होता, जो उनकी शिक्षा, व्यवहार-कुशलता और विनम्रता के लिए आवश्यक है।

इसमें अगर उनकी कमी को कोई इंगित करता है, तो वे सारा दोष अपने गुरुओं पर ही डाल देते हैं और यह कहते हुए बचकर निकलने का प्रयास करते हैं कि हमें यही सिखाया गया है। किसी भी गुरु या बुजुर्ग से ज्ञान प्राप्त करने की पहली शर्त शिष्य का समर्पण भाव है।

ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि उनको जो भी ज्ञान प्राप्त हुआ है, उसमें उनकी ही समर्पण भावना में कमी रही है। वे स्वयं अपना आकलन नहीं करते, क्योंकि उनके भीतर स्वार्थ पनप रहा होता है। जहां उनका स्वार्थ पूरा हो रहा है, उन्हें वही अपने हितैषी नजर आते हैं। वे उन तथाकथित परोपकारियों को ही अपना गुरु मान लेते हैं।

कहा गया है कि चाहे जितने ही वेद और पुराण पढ़ लिए जाएं, लेकिन उनका गूढ़ अर्थ समझाने वाला कोई गुरु तो होना ही चाहिए और उसे सीखने के लिए खुद को भी निस्वार्थ भाव से तैयार करना चाहिए।

जैसे सूरज और चंद्रमा अपने मार्ग पर हमेशा प्रशस्त रहते हैं, क्योंकि उन दोनों में परोपकार की भावना विद्यमान है, वे स्वार्थी नहीं हैं। इसी प्रकार हवा और पानी का कोई तोड़ नहीं है और वे हमारा जीवन स्वस्थ बनाने में लगे रहते हैं। इसी तरह ज्ञान और शिष्टाचार का सबक हमारे लिए अत्यंत आवश्यक है।

आधा-अधूरा ज्ञान तो वैसे भी खतरनाक होता है। जब हम यह सोच लेते हैं कि अब हम ज्ञानी हो गए हैं, उसी दिन हमारी बुद्धि के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं। ज्ञान प्राप्ति एक सतत प्रक्रिया है, जो जीवनपर्यंत बनी रहनी चाहिए। ज्ञान की कोई सीमा नहीं है।

इसी प्रकार शिष्टाचार किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व के लिए ऐसी औषधि है, जिसका असर हमारे भावी जीवन पर भी बना रहता है। शिष्टाचार की कोई एक श्रेणी नहीं है, उसमें अनेक प्रकार का मिश्रण होता है। हमारे घर, विद्यालय, समाज, कार्यालय आदि विभिन्न क्षेत्रों में, जिनका संबंध हमसे है, हमसे शिष्टाचार की आशा की जाती है। प्रत्येक स्थान पर इसके अलग नियम हो सकते हैं। कहीं-कहीं यह कठोर भी होंगे, लेकिन हमारी पहचान और हमारा आदर इसी शिष्टाचार में निहित है।

वर्तमान में समाज में भ्रष्टाचार और दुर्भावनाएं विकराल रूप ले रही हैं और इसका वास्तविक कारण यही है कि ऐसा करने वालों की समस्या को सही रूप में पहचाना ही नहीं जा रहा है। इसके अभाव में समाधान कहां से आएगा?

ऐसे में उन्हें उनकी योग्यता के मूल्यांकन और उससे संबंधित पूर्ण ज्ञान की आवश्यकता है। इस रोग का असली इलाज उन्हें सुविधाएं मुहैया कराना मात्र नहीं है, बल्कि इसके लिए उन्हें सच्चे गुरु और मार्गदर्शक की आवश्यकता है।

यदि हम किसी पर परोपकार करना चाहते हैं या उसे कोई जिम्मेदारी देना चाहते हैं अथवा उसकी सेवाओं की आवश्यकता हमें है, तो संबंधित कार्य में उसका पारंगत होना एक महत्त्वपूर्ण आधार है। हर कार्य के लिए हमें पारंगत या संपूर्ण ज्ञानी व्यक्ति मिले, इसकी संभावना लगभग नगण्य ही है। फिर भी उसकी इच्छाशक्ति, समर्पण भावना और अनुभव आदि का मूल्यांकन हमें कर ही लेना चाहिए।

इसी मूल्यांकन से हम उसके भीतर के शिष्टाचार को पहचान सकते हैं। किसी भी अशिष्ट से तिलिस्म की आशा करना व्यर्थ है। कहा भी गया है कि जो बे-अदब है और उसमें इच्छाशक्ति भी नहीं है, वह बे-नसीब ही रहेगा। इसके विपरीत, बा-नसीब वही बन सकता है, जो बा-अदब हो और जिसे अपनी उपलब्धियों पर लेशमात्र भी घमंड न हो।