किसी भी इंसान का आचरण और व्यवहार उसके चरित्र को प्रतिबिंबित करता है। कहा जा सकता है कि जीवन की हर सकारात्मक या नकारात्मक उपलब्धि चरित्र पर निर्भर करती है। सामाजिक सम्मान मिलना, किसी इंसान पर लोगों का विश्वास होना या कम होना भी चरित्र पर निर्भर करता है।
चरित्र की ऊर्जा व्यक्ति के विचारों और भावनाओं को दिशा प्रदान करती है। सवाल है कि क्या यह कोई जन्मजात गुण है या बनाया जाता है। क्या हर परिस्थिति में चरित्र अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होता है? चरित्र का संबंध मनुष्य की नैतिकता, संस्कारों, आचरण तथा सही और गलत के ज्ञान से है। काम करने की प्रकृति का संदर्भ भी लिया जा सकता है। जब मनुष्य जन्म लेता है, तब उसके चरित्र का पूर्ण आकलन करना संभव नहीं होता। किसी परिवार में जन्मे बच्चे में कुछ जन्मजात प्रवृत्तियां अवश्य होती हैं, लेकिन जीवन-यात्रा के प्रारंभ से ही परिवेश, अनुभव और शिक्षा-दीक्षा उसके चरित्र के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जिस प्रकार बीज की देखभाल के अनुसार पौधा विकसित होता है और उसके फलों की गुणवत्ता भी वैसी ही होती है, उसी प्रकार चरित्र-निर्माण का सिद्धांत मनुष्य पर भी लागू होता है। मनुष्य को बचपन से सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देना, बड़ों का सम्मान करना सिखाना, ईर्ष्या और द्वेष से दूर रखना तथा हार-जीत को समान रूप से स्वीकार करना सिखाना- ये सब उसके आचरण को विकसित करते हैं। साथ ही उसे भावनात्मक रूप से समृद्ध और मजबूत बनाना ही चरित्र-निर्माण की सुदृढ़ भूमि तैयार करता है। इस भूमि पर खड़ी होने वाली इमारत अत्यंत मजबूत होती है।
व्यक्ति की मजबूती गरीबी, अमीरी या किसी बड़े व्यक्ति की संतान होने पर निर्भर नहीं करती, बल्कि वह स्वयं के विकास की धरोहर होती है। कई बार लोग विपरीत परिस्थितियों में अपना मूल स्वभाव छोड़ कर भ्रष्ट हो जाते हैं। वास्तव में इसका सही मूल्यांकन संकट या प्रलोभन की स्थिति में ही होता है। मनुष्य का ईमानदार रहना, सत्य के मार्ग पर चलना और किसी भी परिस्थिति में अपने सिद्धांतों से समझौता न करना तभी संभव है, जब उसका आंतरिक चरित्र मजबूत हो।
अच्छे व्यक्ति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता आत्मानुशासन भी है। जिस व्यक्ति की इंद्रियां उसके वश में होती हैं, वह जीवन की अनेक कठिनाइयों और प्रलोभनों पर विजय प्राप्त कर सकता है। अपनी अनुचित इच्छाओं, कलुषित भावनाओं तथा क्रोध के आवेग को नियंत्रित करने की कला जिस मनुष्य में होती है, उसके चरित्र को अपनी जगह से हिलाना अत्यंत कठिन होता है।
गलत राह के आकर्षण और दबाव के बीच भी सही मार्ग पर चलते रहना ही अच्छे चरित्र की पहचान है। जो इंसान जितनी ईमानदारी और निष्ठा के साथ जीवन जीता है, वह उतना ही अधिक जिम्मेदार बनता है। जिम्मेदार व्यक्ति कभी भी अपने स्वाभाविक गुण के विपरीत जाकर समझौता नहीं करता। जिम्मेदारी मनुष्य को अनुशासित बनाती है और अनुशासन चरित्र की पहली सीढ़ी होता है। ऐसे व्यक्ति का विवेक सदैव उसके साथ चलता है, जिससे उसकी निर्णय क्षमता मजबूत होती है। सुदृढ़ निर्णय क्षमता भी अच्छे चरित्र की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है।
यह मजबूती तब और बढ़ जाती है, जब मनुष्य समय का मूल्य समझता है और उसे व्यर्थ नहीं गंवाता। समय का सदुपयोग करने वाला व्यक्ति निरंतर अपनी योग्यताओं का विकास करता है, नई बातें सीखता है और विपरीत परिस्थितियों के लिए स्वयं को तैयार रखता है। ऐसे व्यक्ति को अपने चरित्र से समझौता करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस प्रकार आत्मानुशासन, जिम्मेदारी, विवेक और समय का सदुपयोग व्यक्ति को दृढ़ता और स्थायित्व प्रदान करते हैं।
कई बार इंसान जो होता है, उसे ढकने के लिए अपने ऊपर एक मुखौटा ओढ़ लेता है और समाज तथा परिवार से छिपाकर नैतिकता के विरुद्ध कार्य करता है। देश में कई बड़े लोग ऐसे होते हैं, जो देशसेवा को अपना प्रथम कर्तव्य बताते हैं, लेकिन अवसर आने पर देश के विरुद्ध कार्य करते हैं। स्वतंत्रता संग्राम के समय ऐसे अनेक उदाहरण इतिहास में दर्ज हुए।
जब मनुष्य सकारात्मक दृष्टिकोण रखता है और विकट परिस्थितियों में भी स्वयं को नहीं बदलता, तब वह अगले पड़ाव पर और अधिक मजबूत चरित्र के साथ प्रकट होता है। जिन लोगों का चरित्र मजबूत होता है, उन्हें हराना आसान नहीं होता। अगर कोई कमजोर चरित्र वाला व्यक्ति छल-कपट या चालबाजी से उन्हें हरा भी दे, तब भी वह सच्चा विजेता नहीं बन सकता, क्योंकि वह नैतिक रूप से पहले ही हार चुका होता है। झूठी जीत कभी वास्तविक संतुष्टि नहीं दे सकती।
अगर व्यक्ति कठिनाइयों को सीखने और विकसित होने के अवसर के रूप में देखे, तो वही परिस्थितियां उसके व्यक्तित्व को ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती हैं। महान व्यक्तियों के जीवन का अध्ययन करने पर पता चलता है कि उनकी सफलता के पीछे संघर्षों की लंबी कहानी होती है। भौतिक सफलता को जरूरत से ज्यादा महत्त्वपूर्ण समझने वाले कई लोग आधुनिक जीवन में सुबह से शाम तक अपने नैतिक मूल्यों से समझौता करते रहते हैं।
धीरे-धीरे वे ऐसे कार्य करने लगते हैं, जो समाज और परिवार के हित में नहीं होते। ऐसी नकारात्मकता के साथ जीने वाले मनुष्य का पतन निश्चित होता है। चरित्र के बिना न तो व्यक्ति की स्वयं की कोई पहचान बन पाती है और न ही ऐसा समाज प्रगति कर सकता है, जिसके लोगों के भीतर नैतिक मूल्यों का विकास न हुआ हो। जब व्यक्ति मजबूत चरित्र वाला होगा, तब परिवार मजबूत होगा। परिवार मजबूत होगा, तो समाज मजबूत होगा। और जब समाज मजबूत होगा, तब निश्चित रूप से देश भी मजबूत होगा।
