उच्च शिक्षा व्यवस्था में योग्यता, समान अवसर और क्षेत्रीय संतुलन की प्रतिबद्धता का होना जरूरी है। देश में इस दिशा में समय-समय पर प्रयास होते रहे हैं और भारतीय प्रबंधन संस्थान (Indian Institutes of Management) इन आदर्शों के प्रतीक माने जाते हैं। इन संस्थानों को उत्कृष्टता, प्रतिस्पर्धा और पेशेवर सफलता के मानक के रूप में देखा जाता है। मगर, जिन संस्थानों की पहचान पारदर्शिता और श्रेष्ठता से जुड़ी है, उनकी प्रवेश प्रक्रिया काफी असमन्वित प्रतीत होती है। जब देश प्रशासनिक सुधार, डिजिटल सरलीकरण और छात्र-केंद्रित नीतियों की ओर बढ़ रहा है, तब IIM की प्रवेश परीक्षा व्यवस्था पर पुनर्विचार समय की मांग है।

देश में भारतीय प्रबंधन संस्थानों की यात्रा स्वतंत्र भारत के विकास से गहराई से जुड़ी है। वर्ष 1961 में अहमदाबाद और कोलकाता में पहले IIM स्थापित हुए, जिनका उद्देश्य विकासशील राष्ट्र को कुशल प्रबंधक देना था। वर्ष 1973 में IIM बंगलुरु की स्थापना हुई। उदारीकरण के बाद लखनऊ, इंदौर और कोझिकोड जैसे संस्थान अस्तित्व में आए, जिन्होंने बदलती अर्थव्यवस्था की जरूरतों को पूरा किया।

पिछले एक दशक में देश के विभिन्न राज्यों में नए IIM खोले गए, ताकि क्षेत्रीय संतुलन सुनिश्चित हो और गुणवत्तापूर्ण प्रबंधन शिक्षा महानगरों से बाहर भी पहुंचे। विस्तार की यह नीति सराहनीय रही, मगर इन संस्थानों में प्रवेश के लिए समन्वय का अभाव आज भी खलता है।

प्रवेश प्रक्रिया की बात की जाए, तो सभी IIM के लिए एक समान प्रवेश द्वार यानी लिखित परीक्षा है—कॉमन एडमिशन टेस्ट (Common Admission Test)। यह परीक्षा लाखों अभ्यर्थियों में से प्रतिभाशाली विद्यार्थियों की पहचान करती है। इसकी खासियत है कि यह देशभर के युवाओं को समान मंच प्रदान करती है। भौगोलिक स्थिति, विश्वविद्यालय या सामाजिक पृष्ठभूमि चाहे जो हो, सभी का मूल्यांकन एक ही कसौटी पर होता है। CAT ने यह सिद्ध किया है कि बड़े स्तर पर भी निष्पक्ष और मानकीकृत परीक्षा संभव है, मगर यह सिर्फ एक लिखित परीक्षा भर है और इसके परिणाम घोषित होते ही प्रवेश प्रक्रिया अलग-अलग दिशाओं में बिखर जाती है।

इसका अर्थ यह है कि CAT उत्तीर्ण विद्यार्थियों के लिए प्रत्येक IIM अपनी अलग आवेदन प्रणाली, अलग शुल्क और अलग साक्षात्कार प्रक्रिया चलाता है। एक छात्र एक ही स्कोर के आधार पर कई संस्थानों में आवेदन करता है और अलग-अलग शहरों में जाकर लगभग समान प्रकार के साक्षात्कार देता है। इस प्रक्रिया की प्रकृति भले मिलती-जुलती हो, लेकिन उसका संचालन पूरी तरह अलग-अलग होता है।

एक तथ्य यह भी है कि CAT के स्कोर का उपयोग IIM के अलावा कई भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (Indian Institutes of Technology), राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (National Institutes of Technology) और अन्य सरकारी एवं निजी संस्थान भी करते हैं। हर संस्थान अपनी अलग चयन प्रक्रिया आयोजित करता है। नतीजतन, विद्यार्थी को समान प्रकृति के अनेक साक्षात्कारों से गुजरना पड़ता है। यह पुनरावृत्ति समय, संसाधन और ऊर्जा की अनावश्यक खपत है।

दोहराव विद्यार्थियों के लिए प्रशासनिक, सामाजिक एवं आर्थिक बोझ बन जाता है। सबसे पहले आर्थिक पक्ष सामने आता है। हर आवेदन के साथ शुल्क, साक्षात्कार के लिए यात्रा और ठहरने का खर्च तथा कई बार कार्य या पढ़ाई से अनुपस्थिति की कीमत—सब मिलकर एक बड़ा वित्तीय दबाव बनाते हैं। छोटे शहरों या सीमित आय वाले परिवारों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए यह चरण विशेष रूप से कठिन हो सकता है। कई प्रतिभाशाली विद्यार्थी केवल इसलिए सभी अवसरों का लाभ नहीं उठा पाते, क्योंकि वे हर शहर तक पहुंचने का खर्च वहन नहीं कर सकते। यदि उत्कृष्टता तक पहुंच आर्थिक सामर्थ्य पर निर्भर होने लगे, तो योग्यता की अवधारणा कमजोर पड़ जाती है।

आर्थिक बोझ के साथ मानसिक और सामाजिक दबाव भी जुड़ा होता है। प्रवेश सत्र के दौरान छात्रों को कम समय में कई यात्राएं करनी पड़ती हैं। तिथियों का टकराव, अनिश्चितता और बार-बार मूल्यांकन की प्रक्रिया तनाव बढ़ाती है। महिला उम्मीदवारों और दूरदराज के क्षेत्रों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए सुरक्षा एवं ठहराव की चिंता अतिरिक्त चुनौती बन जाती है। प्रश्न यह है कि क्या इस स्थिति को किसी भी विद्यार्थी-हितैषी व्यवस्था के अनुरूप देखा जा सकता है?

एक मेधावी छात्र को कई IIM, IIT, NIT इत्यादि से प्रस्ताव मिल सकते हैं

इस संदर्भ में सिर्फ विद्यार्थियों को नहीं, बल्कि संस्थानों को भी समन्वित व्यवस्था के अभाव का दुष्परिणाम झेलना पड़ता है। एक मेधावी छात्र को कई IIM, IIT, NIT इत्यादि से प्रस्ताव मिल सकते हैं। वह अपनी पसंद का इंतजार करते हुए अन्य संस्थानों में अस्थायी रूप से सीट स्वीकार करता है और शुल्क राशि जमा कर देता है। इससे बड़ी धनराशि महीनों तक फंसी रहती है। जब छात्र अंतिम निर्णय लेता है, तो दूसरी जगह जहां उसने शुल्क राशि जमा की है, वहां सीटें खाली हो जाती हैं और प्रतीक्षा सूची को फिर से अद्यतन करना पड़ता है। पूरी प्रक्रिया लंबी और अनिश्चित बन जाती है, जिससे प्रशासनिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

हालांकि हाल के वर्षों में कुछ नए IIM ने कॉमन एडमिशन प्रोसेस (CAP) जैसी पहल शुरू की है, जहां साझा साक्षात्कार आयोजित किए जाते हैं। कुछ अन्य ने संयुक्त प्रवेश प्रक्रिया जैसी व्यवस्थाओं का प्रयोग किया है, मगर ये व्यवस्थाएं स्थायी और सार्वभौमिक नहीं हैं। सभी IIM इनमें शामिल नहीं होते और समूहों की संरचना बदलती रहती है। इससे आंशिक समन्वय तो दिखता है, मगर मूल समस्या का समाधान नहीं होता।

देखा जाए तो आज लगभग हर राज्य में कोई न कोई केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थान (IIM, IIT, NIT) मौजूद हैं, जोकि अपने आप में एक अवसर है। यदि CAT के बाद एक मानकीकृत साझा साक्षात्कार प्रक्रिया इन क्षेत्रीय केंद्रों पर आयोजित की जाए, तो छात्र अपने निकटतम शहर में इस प्रवेश प्रक्रिया में आसानी से उपस्थित हो सकते हैं। जिसके बाद एक पारदर्शी केंद्रीय काउंसलिंग प्रणाली के माध्यम से सीट आवंटन किया जा सकता है, जिसमें संस्थानों की प्राथमिकता, विद्यार्थियों की रैंक और आरक्षण नीति का संतुलित समावेश हो।

इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश प्रणाली में इस प्रकार की केंद्रीकृत व्यवस्था पहले से लागू है। हर संस्थान अपने चयन मानदंड और शैक्षणिक मानकों के अनुरूप एकीकृत साक्षात्कार प्रक्रिया को अमल में ला सकता है। यह प्रक्रिया के दोहराव को समाप्त करने की दिशा में एक अहम पहल हो सकती है, जिससे संचालन तंत्र की दक्षता और पारदर्शिता बढ़ेगी, साथ ही CAT के मूल उद्देश्य तक पहुंचना भी संभव हो जाएगा।

यानी एक ऐसी प्रवेश प्रक्रिया, जिसमें सभी प्रबंधन संस्थानों की एक ही मंच के माध्यम से लिखित परीक्षा, साक्षात्कार, काउंसलिंग और शुल्क जमा करने की व्यवस्था हो। भारत आज वैश्विक शिक्षा केंद्र बनने की आकांक्षा रखता है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केवल उत्कृष्ट संस्थान ही नहीं, बल्कि निष्पक्ष और सुव्यवस्थित प्रवेश प्रणाली का होना भी आवश्यक है। यहां प्रश्न क्षमता का नहीं, इच्छाशक्ति का है। क्या हम ऐसी व्यवस्था बनाने पर गंभीरता से विचार करेंगे, जो विद्यार्थियों के साथ-साथ उनके समय, धन और ऊर्जा का सम्मान एवं संरक्षण करे? क्या हम यह सुनिश्चित करेंगे कि उत्कृष्टता तक पहुंच केवल प्रतिभा पर निर्भर हो, साधनों पर नहीं? अगर योग्यता को अवसर का आधार बनाना है, तो प्रवेश प्रक्रिया को भी उतना ही सुगम और सरल बनाना होगा।

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भारत में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को लेकर लंबे समय से विचार-विमर्श होता रहा है। आर्थिक उदारीकरण के बाद, गुणवत्ता की परिभाषा आर्थिक कारकों और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के प्रभाव से परिवर्तित हुई है। पारंपरिक रूप से, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को आवश्यक ज्ञान और कौशल प्रदान करना तथा उन्हें आजीवन सीखने के लिए तैयार करना रहा है। हालांकि, वर्तमान सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में इस अवधारणा को स्पष्ट करना तथा उसे प्राप्त करना और जटिल होता जा रहा है। यह एक चुनौती है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक