आर्थिक रूप से कमजोर और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे अपनों की देखभाल करने वाले परिवारों के प्रति सहानुभूति तो हर कोई जताता है, लेकिन उनकी समस्याओं के समाधान को लेकर कहीं कोई गंभीरता नजर नहीं आती। इस कारण कई बार अप्रिय घटनाएं भी सामने आ जाती हैं। मानसिक या दूसरी गंभीर बीमारियों से ग्रस्त व्यक्ति की देखभाल और इलाज में हो रही कठिनाई के कारण परिवार के सदस्य कई बार इतने हताश और निराश हो जाते हैं कि वे इससे छुटकारा पाने के लिए आपराधिक कदम तक उठा लेते हैं। मानसिक रोगी, गंभीर बीमार या शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों की देखभाल की जिम्मेदारी अक्सर पूरे परिवार को तोड़ देती है। यह परेशानी सिर्फ आर्थिक ही नहीं, बल्कि भावनात्मक, शारीरिक, सामाजिक और मानसिक भी होती है। कई बार इसी दबाव से हत्या और आत्महत्या जैसी घटनाएं भी सामने आती हैं। यह महज निजी त्रासदी नहीं है, बल्कि सामाजिक और नीतिगत चुनौती भी है। ऐसे परिवारों की मदद के लिए सरकार के साथ समाज को भी आगे आना होगा।

कुछ माह पहले राजस्थान के चुरू जिले में एक व्यक्ति ने मानसिक रूप से अस्वस्थ अपने बड़े भाई की हत्या कर दी। पुलिस की जांच में पता चला कि आरोपी आर्थिक दिक्कतों के कारण अपने बड़े भाई की देखभाल करने में खुद को असहाय महसूस कर रहा था। इसी तरह पिछले वर्ष सितंबर की खबर के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के नोएडा पश्चिम के एक रिहायशी परिसर में एक मां ने मानसिक रूप से बीमार अपने बेटे को इमारत की तेरहवीं मंजिल से धक्का दे दिया और फिर खुद भी कूद गई। यह महिला अपने बेटे की लगातार देखभाल से टूट चुकी थी। अपने पीछे छोड़े एक पत्र में उसने लिखा- ‘अब सहन नहीं होता’। इस तरह की घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं, लेकिन ऐसे परिवारों की दास्तान पर न तो सरकार गंभीर दिखाई देती है और न ही सामाजिक तौर पर संवेदनशीलता नजर आती है।

जब कोई परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हो और घर का कोई सदस्य किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित होता है, मानसिक रूप से अस्वस्थ या शारीरिक रूप से अक्षम हो जाए, तो उसे संभालना मुश्किल हो जाता है। ऐसे मरीजों को दवा देने के साथ नहलाना-धुलाना, खाना खिलाना और रात भर निगरानी रखने का काम करना होता है। चलने-फिरने में असमर्थ मरीज की देखभाल तो और भी मुश्किल हो जाती है। चिकित्सा जांच, दवाइयां और अस्पताल के खर्च के लिए कई बार संबंधित परिवार को कर्ज तक लेना पड़ता है। आर्थिक तंगहाली में महीनों और वर्षों तक मरीज की देखभाल करते-करते परिवार के लोग कई दफा अवसाद में आ जाते हैं। इस मानसिक अवस्था में वे कभी-कभी ऐसा कुछ कर बैठते हैं, जो अपराध और क्रूरता की श्रेणी में आता है। ऐसे मरीजों और परिवारों को लेकर समाज का रवैया भी संवेदनहीन होता है। पड़ोसी दूरी बना लेते हैं और रिश्तेदार उन्हें भूल जाते हैं। अगर इन परिवारों को सरकार और समाज का संवेदनशील साथ मिले तो ऐसी घटनाओं को काफी हद तक रोका जा सकता है।

सरकारी स्तर पर अगर इच्छाशक्ति दिखाई जाए, तो इस समस्या को कम किया जा सकता है। इसके लिए कई स्तरों पर काम करना होगा। लंबे समय से बीमार या दिव्यांग व्यक्तियों की देखभाल करने वाले परिजनों को अनौपचारिक ‘केयर गिवर’ के रूप में मान्यता दी जा सकती है। ऐसे परिवारों को मासिक भत्ता, कर छूट या विशेष सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ा जाना चाहिए, ताकि वे आर्थिक रूप से टूटे नहीं। सभी शहरों और जिलों में सरकारी सहायता प्राप्त ‘डे केयर सेंटर’ शुरू किए जाएं, जहां दिन के कुछ घंटे या कुछ दिन के लिए मरीजों को सुरक्षित वातावरण में रखा जा सके। इससे संबंधित परिवार के सदस्य को काम पर जाने, खुद की सेहत और मानसिक स्थिति संभालने का मौका मिल सकता है। जिला अस्पताल स्तर पर मनोचिकित्सक, काउंसलर और अन्य विशेषज्ञों की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। आत्महत्या रोकथाम हेल्पलाइन, आनलाइन काउंसलिंग और सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों को मजबूत करने की जरूरत है, ताकि मरीज की देखभाल करने वाले परिवारों को भी मदद मिल सके।

इसके अलावा, गंभीर रूप से बीमार और बुजुर्ग मरीजों को सरकारी स्तर पर घर में स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने की व्यवस्था की जानी चाहिए। आयुष्मान जैसी स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में ‘होम केयर’ को भी शामिल किया जा सकता है। मानसिक रूप से अस्वस्थ या गंभीर रोगियों के अधिकारों की रक्षा के लिए बने कानूनों को सख्ती से लागू करने की जरूरत है। इसके साथ ही सामाजिक तौर पर जागरूकता लाना भी आवश्यक है। आज भी मानसिक रोगियों और गंभीर रूप से बीमार लोगों के परिवारों की सामाजिक तौर पर उपेक्षा की जाती है, उनसे दूरी बनाई जाती है। अगर समाज की ओर से संवेदनशीलता दिखाई जाए, तो मरीज के परिजनों का बोझ हल्का हो सकता है। पड़ोसी, रिश्तेदार और मित्र दिखावटी हमदर्दी दिखाने के बजाय वास्तविक रूप से मदद करने को आगे आएं, तो प्रभावित परिवारों को काफी राहत मिल सकती है।

धार्मिक, सामाजिक और युवा संगठनों को ऐसे परिवारों के लिए ‘सहायता समूह’ बनाकर नियमित मुलाकात, काउंसलिंग और व्यावहारिक मदद जैसे दवा, राशन या वीलचेयर जैसी चीजें उपलब्ध करानी चाहिए। धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों पर खर्च होने वाली भारी राशि का कुछ हिस्सा इस तरह के मरीजों की देखभाल के लिए खर्च किया जा सकता है। साथ ही इन आयोजनों में उमड़ने वाली भीड़ को मरीजों की देखभाल में सहयोग के लिए प्रेरित किया जा सकता है। मानसिक रोग और दिव्यांगता से जुड़े मिथक के भाव को खत्म करने के लिए मीडिया, स्कूल और समुदाय स्तर पर जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए, ताकि संबंधित परिवार समस्या छिपाने के बजाय मदद मांगने में संकोच न करें। संचार माध्यमों को भी इस तरह के विषयों को संवेदनशीलता और प्रमुखता से उठाना होगा। ऐसे मामलों में पुनर्वास और नीतिगत सुधार की दिशा में भी गहराई से विचार करने की जरूरत है।

वास्तविक समाधान तभी संभव है, जब यह समझ लिया जाए कि मानसिक रोगी, गंभीर बीमार या चलने-फिरने में असमर्थ व्यक्ति की देखभाल सिर्फ उस एक परिवार की निजी समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज और सरकार की सामूहिक जिम्मेदारी है। ऐसे मामलों में आर्थिक और चिकित्सा सहायता मुहैया कराना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। समाज भी सहानुभूति और सहयोग की संस्कृति विकसित करे, तो ऐसे लाखों परिवारों को टूटने से बचाया जा सकता है और पीड़ित लोगों के जीवन को सुरक्षित किया जा सकता है। किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और असहाय नागरिकों के साथ किस तरह का व्यवहार करता है। सामाजिक स्तर पर इस सोच को स्थापित करने के नियमित प्रयास किए जाने चाहिए। मानसिक रोगियों तथा अन्य गंभीर बीमारियों से पीड़ित और उनके परिवारों को सहारा देना सिर्फ दया नहीं, सामाजिक न्याय और मानवाधिकार से जुड़ा मामला भी है। सरकार की नीतियों और समाज की प्राथमिकताओं में इन संवेदनाओं का होना बेहद जरूरी है। इस मामले में महज खानापूर्ति की बजाय ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।