किसी भी देश के आर्थिक विकास में केवल प्राकृतिक संसाधनों, पूंजी या तकनीक का योगदान नहीं होता, बल्कि इसमें मानव संसाधन का भी अहम स्थान होता है। इसकी गुणवत्ता और उत्पादकता की विकास में बड़ी भूमिका होती है। मानव संसाधन में उन लोगों को सम्मिलित किया जाता है, जो अपनी शारीरिक, बौद्धिक, तकनीकी तथा प्रबंधकीय क्षमता से उत्पादन और विकास की प्रक्रिया में अमूल्य योगदान करते हैं।

भारत दुनिया की सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों में से एक है। इसकी लगभग पैंसठ फीसद जनसंख्या पैंतीस वर्ष से कम आयु के युवाओं की है। यह युवा शक्ति देश की अमूल्य संपत्ति है। यदि युवाओं में बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल का विकास किया जाए, तो वे देश की आर्थिक वृद्धि को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकते हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था के तीनों महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों—प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्र – में रोजगार तथा मानव संसाधन की स्थिति अलग-अलग है। कृषि प्राथमिक क्षेत्र है, जो किसी भी देश में बहुत बड़े कार्यबल को रोजगार देती है। निर्माण वाले द्वितीयक क्षेत्र की उत्पादन में और सेवाओं वाले तृतीयक क्षेत्र की सकल घरेलू उत्पाद में अहम भूमिका होती है।

नवीनतम आर्थिक सर्वेक्षण और सांख्यिकी मंत्रालय के श्रमबल सर्वेक्षण के अनुसार, तीनों क्षेत्रों में प्राथमिक क्षेत्र कृषि, वानिकी, मत्स्य पालन और खनन जैसी गतिविधियों से जुड़ा है। रोजगार के लिहाज से देखें, तो भारत के कुल मानव संसाधन का लगभग चालीस फीसद हिस्सा आज भी प्राथमिक क्षेत्र में कार्यरत है।

भारत की जनसंख्या वर्ष 2025-26 में लगभग 143 करोड़ से अधिक आंकी जाती है। इसमें कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या कुल आबादी का लगभग 67 फीसद है। यह स्थिति भारत के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है। मानव संसाधन उत्पादन का सबसे अहम घटक है। कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र, सभी में प्रशिक्षित और कुशल श्रमिक उत्पादन क्षमता को बढ़ाते हैं।

देश की जीडीपी में सेवा क्षेत्र का योगदान लगभग 55 फीसद से अधिक है। इसका भी प्रमुख आधार प्रशिक्षित मानव संसाधन है। सूचना प्रौद्योगिकी, बैंकिंग, स्वास्थ्य, शिक्षा और संचार जैसे क्षेत्रों में लाखों भारतीय पेशेवर देश की आय और विदेशी मुद्रा अर्जन में योगदान दे रहे हैं।

कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों, उन्नत बीजों, सिंचाई और वैज्ञानिक खेती के प्रसार में प्रशिक्षित मानव संसाधन की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। हरित क्रांति के बाद कृषि उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। यह वृद्धि केवल तकनीक के कारण नहीं, बल्कि किसानों के प्रशिक्षण के कारण संभव हुई।

मानव संसाधनों की जरूरत उद्योगों के विकास के लिए भी होती है। वहां कुशल श्रमिक, इंजीनियर, प्रबंधक और तकनीशियन आवश्यक होते हैं। ऑटोमोबाइल, दवा उद्योग, इस्पात और इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों की सफलता के पीछे प्रशिक्षित मानव शक्ति की बड़ी भूमिका है। विशेष रूप से भारतीय औषधि उद्योग विश्व के सबसे बड़े जेनेरिक दवा उत्पादकों में गिना जाता है। इसमें लाखों वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों का योगदान है।

भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग में लगभग पचास लाख से अधिक पेशेवर कार्यरत हैं। सॉफ्टवेयर निर्यात, डिजिटल सेवाएं और बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग के माध्यम से भारत को अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। प्रमुख सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियां मानव संसाधन आधारित विकास के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

शिक्षा मानव संसाधन विकास का आधार है। शिक्षा व्यक्ति की उत्पादकता, नवाचार क्षमता और आय अर्जित करने की योग्यता को बढ़ाती है। भारत में साक्षरता दर स्वतंत्रता के समय लगभग 18 फीसद थी, जो अब 77 फीसद से अधिक हो चुकी है। उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। भारत में 1,100 से अधिक विश्वविद्यालय, 45 हजार से अधिक महाविद्यालय, हजारों तकनीकी और व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थान कार्यरत हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं की बढ़ती संख्या देश को ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ा रही है।

मगर अर्थव्यवस्था में केवल शिक्षा ही पर्याप्त नहीं है, कौशल भी बहुत जरूरी है। इसी उद्देश्य से भारत सरकार ने विभिन्न कौशल विकास कार्यक्रम प्रारंभ किए हैं। इसके अंतर्गत ‘स्किल इंडिया मिशन’ और प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना इत्यादि प्रमुख हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य युवाओं को उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षित करना है।

स्वस्थ मानव संसाधन ही देश का उत्पादक मानव संसाधन होता है। बीमारी और कुपोषण श्रम उत्पादकता को कम कर देते हैं। भारत में औसत जीवन प्रत्याशा लगभग 70 वर्ष से अधिक हो चुकी है, जबकि शिशु मृत्यु दर में भी निरंतर कमी आई है। स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार, टीकाकरण कार्यक्रमों और पोषण योजनाओं ने मानव संसाधन की गुणवत्ता को बेहतर बनाया है।

मानव संसाधन में महिलाओं की भूमिका भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। वे भारतीय अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। शिक्षा और रोजगार के अवसरों में वृद्धि से महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है। कृषि, सूक्ष्म एवं लघु उद्योग, सूचना प्रौद्योगिकी, बैंकिंग, स्वास्थ्य सेवाएं और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में यदि महिला श्रम भागीदारी दर में और वृद्धि की जाए, तो भारत के सकल घरेलू उत्पाद में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो सकती है।

मानव संसाधन केवल रोजगार प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। यह रोजगार सृजन भी करता है। भारत विश्व के सबसे बड़े नवउद्यम पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक है। नवाचार, तकनीकी ज्ञान और उद्यमशीलता के कारण बड़ी संख्या में नए उद्यम स्थापित हुए हैं, जिन्होंने लाखों रोजगार सृजित किए हैं। युवा उद्यमी डिजिटल अर्थव्यवस्था, फिनटेक, ई-कॉमर्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में नई संभावनाएं पैदा कर रहे हैं।

इतना सब कुछ होते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था में मानव संसाधनों से जुड़ी चुनौतियां भी कम नहीं हैं। इनमें बेरोजगारी बड़ी समस्या है। अधिकांश मामलों में उद्योगों की आवश्यकता और युवाओं के कौशल के बीच काफी अंतर पाया जाता है। इस कारण शिक्षित होकर भी वे उद्योगों के लिए अधिक उपयोगी नहीं रह पाते। शिक्षा की गुणवत्ता के मामले में भी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में काफी असमानता है। इस कारण शिक्षित होते हुए भी वे अर्थव्यवस्था के अनेक क्षेत्रों में उपयोगी साबित नहीं हो पाते।

देश में महिला कार्यबल की भागीदारी अभी भी कई विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। जबकि भारत की युवा आबादी आगामी दशकों में आर्थिक विकास का सबसे बड़ा आधार बन सकती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल प्रौद्योगिकी, हरित ऊर्जा, जैव प्रौद्योगिकी और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित मानव संसाधन की मांग तेजी से बढ़ रही है।

यदि भारत शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुसंधान और कौशल विकास में निरंतर निवेश करता है, तो वह विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकता है। मानव संसाधन भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे मूल्यवान संपत्ति है। शिक्षा, कौशल विकास, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में प्रभावी नीतियों के माध्यम से मानव संसाधन को उत्पादक मानव पूंजी में परिवर्तित किया जा सकता है।