Duniya Mere Aage: मनुष्य अपने जीवन को अपनी इच्छाशक्ति की विजय मानकर चलता है। उसे विश्वास होता है कि उसने जो पाया, अपनी मेहनत से पाया और जो खोया, वह भी उसके अपने निर्णयों का परिणाम था। वह स्वयं को अपने जीवन का निर्माता समझता है, लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, अनुभव गहराते हैं और पीछे मुड़कर देखने की दृष्टि विकसित होती है, वैसे-वैसे एक असहज सत्य सामने आने लगता है- ‘जीवन की सबसे बड़ी घटनाओं का निर्णय हमने कभी किया ही नहीं।

हम केवल उन निर्णयों के सहभागी बने और समय आने पर उन पर अपने हस्ताक्षर करते चले गए।’ शायद इसी अर्थ में कहा जा सकता है कि मनुष्य का पूरा जीवन दरअसल इस्तीफों का इतिहास है। हम इस्तीफे को केवल नौकरी छोड़ने से जोड़कर देखते हैं। हमें लगता है कि इस्तीफा एक कागज पर लिखा जाने वाला औपचारिक पत्र है, लेकिन अगर जीवन को ध्यान से पढ़ा जाए तो पता चलता है कि हम जन्म से लेकर मृत्यु तक अनगिनत बार इस्तीफा देते हैं।

अंतर केवल इतना है कि उन इस्तीफों पर कागज नहीं होते, केवल समय की मुहर होती है। अपने बचपन को याद किया जा सकता है। मिट्टी के खिलौने, बारिश में भीगना, बिना कारण हंस देना, मां की गोद में सो जाना, छोटी-छोटी बातों पर रूठ जाना। क्या किसी बच्चे ने कभी तय किया था कि अब उसे इन सब बातों से विदा लेनी है? नहीं, एक दिन स्कूल की किताबें भारी होने लगीं, जिम्मेदारियां बढ़ गर्इं और बचपन बिना अनुमति लिए चला गया। हमें उससे इस्तीफा देना पड़ा।

फिर यौवन आया… सपनों से भरा हुआ, ऊर्जा से लबालब। लगता था कि शरीर कभी थकेगा नहीं और समय कभी बदलेगा नहीं, लेकिन समय ने वहां भी हमारी राय नहीं पूछी। चेहरे पर झुर्रियों की पहली रेखा खिंची, बालों का रंग बदलने लगा, आंखों पर चश्मा चढ़ गया और हमें अपनी ही जवानी से इस्तीफा देना पड़ा।

यह संसार का शायद सबसे मौन इस्तीफा है, जिसके बारे में कोई घोषणा नहीं होती, लेकिन जिससे कोई बच भी नहीं सकता। हम रिश्तों में प्रवेश करते हैं और मान लेते हैं कि अब यह साथ हमेशा रहेगा। मित्र, प्रेम, विवाह, परिवार… सब हमें स्थायी लगने लगते हैं, लेकिन जीवन का नियम स्थायित्व नहीं, परिवर्तन है। कोई दूर चला जाता है, कोई बिछड़ जाता है, कोई बदल जाता है और कई बार हम स्वयं बदल जाते हैं। तब भी हमें एक रिश्ते से इस्तीफा देना पड़ता है।

यह इस्तीफा सबसे अधिक पीड़ा देता है, क्योंकि इसमें दस्तखत हाथ नहीं, हृदय करता है। नौकरी का उदाहरण तो हर व्यक्ति के सामने है। कोई अपनी पूरी जवानी किसी संस्था को दे देता है। अपनी प्रतिभा, अपना समय, अपनी ऊर्जा, यहां तक कि अपना स्वास्थ्य भी। उसे लगता है कि यही उसकी पहचान है। फिर एक दिन सेवानिवृत्ति का आदेश आता है। कोई पूछता नहीं कि अभी मन है या नहीं। बस एक हस्ताक्षर होते हैं और दशकों का साथ समाप्त हो जाता है। जिस कुर्सी को हम अपना समझ बैठे थे, वह अगले दिन किसी और की हो जाती है।

क्या इन घटनाओं का निर्णय हमने किया था? क्या हमने तय किया था कि किस घर में जन्म लेना है? क्या हमने अपने माता-पिता चुने थे? क्या हमने अपनी पहली सांस का समय निश्चित किया था? क्या हमने तय किया कि हमारा बचपन कब समाप्त होगा, यौवन कब ढलेगा या बुढ़ापा कब आएगा? अगर उत्तर ‘नहीं’ है, तो फिर यह स्वीकार करना भी पड़ेगा कि जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा हमारी इच्छा से नहीं, समय के विधान से चलता है। यहीं से एक अत्यंत सुंदर प्रतीक जन्म लेता है ‘हस्ताक्षर’।

किसी सरकारी फाइल में आदेश ऊपर लिखा जाता है। नीचे केवल हस्ताक्षर करने होते हैं। हस्ताक्षर करने वाला आदेश का लेखक नहीं होता, केवल उसका स्वीकारकर्ता होता है। शायद मनुष्य की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। समय आदेश लिखता है, प्रकृति उसे लागू करती है और मनुष्य केवल उसके नीचे अपना नाम लिख देता है।

यह विचार पहली दृष्टि में मनुष्य को असहाय बना सकता है, पर वास्तव में ऐसा नहीं है। भारतीय दर्शन कभी भी भाग्यवाद का समर्थन नहीं करता। वह कहता है कि कर्म तुम्हारे हाथ में है, लेकिन फल का विधान व्यापक है। अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम है। पद मिलने पर वह स्वयं को अजेय समझने लगता है। सौंदर्य मिलने पर उसे लगता है कि यह हमेशा रहेगा।

धन मिलने पर उसे विश्वास हो जाता है कि दुनिया उसकी मुट्ठी में है, लेकिन समय किसी परिचय का मोहताज नहीं होता। वह राजा और रंक, दोनों से एक ही दिन इस्तीफा लेता है। संसार के महानतम सम्राट भी अपने सिंहासन बचाकर नहीं रख सके। सबसे बड़े कलाकार अपनी तालियां साथ नहीं ले गए। तब हम किस बात का अभिमान करें? शेक्सपियर ने लिखा था, ‘सारा संसार एक रंगमंच है और हम सब अभिनेता हैं।’

आज का मनुष्य इसलिए बेचैन है कि वह हर उस चीज को स्थायी बनाना चाहता है, जो स्वभाव से अस्थायी है। वह चाहता है कि उसका यौवन कभी समाप्त न हो, उसके प्रियजन कभी दूर न जाएं, उसकी नौकरी कभी न छूटे, उसकी सफलता हमेशा बनी रहे, लेकिन जीवन का पूरा सौंदर्य ही परिवर्तन में छिपा है। अगर ऋतुएं न बदलें, तो प्रकृति मर जाए, समय ठहर जाए तो जीवन भी ठहर जाएगा।

मनुष्य अपने साथ कुछ भी लेकर नहीं जाता। न पद, न प्रतिष्ठा, न संपत्ति, न पहचान अगर कुछ बचता है, तो केवल उसके कर्मों की सुगंध और लोगों के मन में छोड़ी गई उसकी स्मृतियां। इसलिए शायद जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि हमने कितनी संपत्ति अर्जित की या कितनी प्रसिद्धि पाई। असली प्रश्न यह है कि जिन भूमिकाओं के लिए हमें इस धरती पर भेजा गया, क्या हमने उन्हें पूरी ईमानदारी से निभाया!

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