संतोष और प्रतिरोध समाज में स्वत: साथ चलने वाला अयाचित भाव है। ऐसे में भावनाओं का आहत होना भी एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। भावनात्मक अनुपस्थिति हमेशा शारीरिक अनुपस्थिति नहीं होती, लेकिन वह शारीरिक से कहीं अधिक गहरी और निपुण होती है। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में कई बार ऐसे क्षण आते हैं, जब हम बिना किसी रिश्ते, परिचय या पहचान के भी कुछ दृश्य देखकर भावुक हो जाते हैं।
वे दृश्य भले ही सड़क पर निकलती किसी की शव यात्रा का हो, किसी बच्चे का गुब्बारा न खरीद पाने का रुदन या चिलचिलाती धूप में सड़क किनारे नंगे पैर घूमते मासूम बच्चे, जो किसी चमचमाती कार का कांच अचानक साफ करने लगते हैं। भावुक व्यक्ति कभी सुविधा से चयन करने वाला नहीं होता, वह सूखी नदी या बंजर खेत देखकर भी उतना ही दुखी हो सकता है, जितना गर्मी के दिनों में दो-दिन घर में पानी न आने पर। भावनात्मक होना एक शुद्ध व्यक्ति की पहचान है, इसलिए भावना के हर शब्द नवजात होते हैं। नवजात का हृदय निश्छल पवित्र होता है।
बात छोटी-बड़ी नहीं होती हैं, भावनाएं छोटी-बड़ी होती हैं
हमारे सामूहिक मानस में स्वीकार्य यथार्थ होना तो भावनात्मक स्तर का होना चाहिए, लेकिन इसके उलट अब स्वीकार्य यथार्थ से भावनाओं का दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं होता। कहने का आशय यह कि बात छोटी या बड़ी नहीं होती। छोटी या बड़ी होती है भावना। शब्द सामने आ जाते हैं, भावना पीछे रह जाती है। इसीलिए दुनिया में शब्दों की लड़ाई चलती है। याद रखना होगा कि भावना का हर तत्त्व नवजात है। वह कभी पुनरावृत्ति में जन्म नहीं लेती। भाव एक अचेतन तीव्रता का अनुभव है। हालांकि भावना और प्रभाव का प्रयोग अक्सर एक-दूसरे के स्थान पर किया जाता है, लेकिन प्रभाव को भावनाओं और संवेगों से भ्रमित न करना महत्त्वपूर्ण है।
आज लोगों की भावना सुविधा के मुताबिक हो गई है। वे सड़क पर घुमाते अपने कुत्ते के लिए तो संवेदनशील होते हैं, भावनात्मक भी, लेकिन दूसरों के बच्चों या सड़क के अन्य जीव के प्रति उनकी कोई प्रतिक्रिया भावनात्मक स्तर पर सतही नजर आती है। हम बात भावनाओं की कर रहे हैं, लेकिन अब जो शब्द खबरों और बातचीत में गूंजते हैं- बलात्कार, हत्या, जनसंहार, आत्महत्या, भीड़-हत्या, दहेज हत्या, बाल शोषण, मानव तस्करी, आतंकवाद, अपहरण आदि, वे हमारी भावनाओं को कितना आहत करते हैं? घटनाओं का अतिरेक हमारी भावनाओं को शोर में तब्दील कर रहा है, इसलिए हम दोनों के अंतर को समझना भी भूल रहे।
बातों के सफर में बदलते अर्थ और रिश्तों के बीच बढ़ती खामोशियों में उलझे लोग | दुनिया मेरे आगे
हम अपने मानस में बहुत कुछ ऐसा स्वीकारने के आदी हो चले हैं, जो मनुष्य होने पर भी संशय करता है। स्वीकार्यता में भावनात्मक अभिव्यक्ति कितनी होगी, यह विचारणीय है। भावना किसी अनुभूति का प्रकटीकरण या प्रदर्शन है। हम अपनी भावनाओं को दुनिया के सामने प्रकट करते हैं। कभी-कभी यह प्रकटीकरण हमारी आंतरिक स्थिति की अभिव्यक्ति होती है और कभी-कभी सामाजिक अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए बनावटी होती है। भाव की संप्रेषणीयता ही इसे एक शक्तिशाली सामाजिक शक्ति बनाती है। एक व्यक्ति की भावनाएं दूसरे की भावनाएं बन जाए, यह बहुत हद तक संभव नहीं, लेकिन एक की भावनाएं दूसरे तक पहुंचती जरूर हैं। समाज इसी समझ से संवेदन-तत्त्व को स्पर्श करता है।
जीवन में बढ़ते हुए दो शब्द और जुड़ते हैं। आशावाद कह लें या आदर्शीकरण- यही वह प्राणतत्त्व है, जो मनुष्य के स्थिर यथार्थ के भीतर रोम छिद्रों की तरह मौजूद गतिशील, परिवर्तनशील स्वरूप से जोड़ता है और इस प्रकार उसके उन्नत पक्ष को विस्तार देता है। मगर इसके केंद्र में उसकी भावनाएं निहित हैं। संवेदना, कल्पना, दृष्टि, बोध, तड़प, बेचैनी, निराशा-उम्मीद और व्यग्रता- ये सभी भावनाओं को आकार देने वाले संसाधन हैं। वयस्क लोगों के जीवन में भावनाएं कितने सार्थक रूप से काम करती रहती हैं! यहां तक कि उनके द्वारा अपनी भावनाओं पर कुछ हद तक सचेत नियंत्रण का प्रभाव भी रहता है। एक शिशु में संवेदनाओं को समझने के लिए भाषा कौशल नहीं होते, न ही उसके पास पिछले अनुभवों का कोई इतिहास होता है, फिर भी वह भावनाएं अभिव्यक्त करता है और उसकी भावनाएं पहुंचती हैं।
क्रोध बन जाता है विनाश की आग, मन की गहराइयों में छिपे भाव को समझने की जरूरत है | दुनिया मेरे आगे
सच तो यह है कि शब्द जब मुड़कर अपनी तरफ देखता है, तो विचार बन जाता है। उस विचार की भावनाओं को हम उसकी नैसर्गिक क्रांति में देख पाते हैं। साहित्य सृजन की किसी भी विधा में उसकी नैसर्गिक क्रांति में देख पाते हैं। भावनाएं या तो नैतिक तनाव में आकार लेती हैं या बहुत संवेदनशील क्षण में, जहां व्यक्ति अपनी चुप्पी और बोलने की विवशता के बीच खड़ा दिखाई देता है। भावनाओं के निश्छल प्रवाह में आवेग हो, तो धाराओं का और संयम हो, तो तटों का। व्यक्ति की पीड़ा और आकांक्षा, किसी भी सर्जक की निजी न होकर एक बड़े सांस्कृतिक आख्यान का हिस्सा बन जाती है। व्यक्ति किसी भव्य अतीत को स्मृति में स्वयं को बसाए या अपने विराट वर्तमान की खोह में, बिना भावनाओं के वह मनुष्य नहीं है।
जीवन की विफलताएं, कमजोरियां संघर्ष हमारी साधना का रहस्य हैं। व्यक्ति इनसे आहत भी होता है, लेकिन उस आहत होने का केंद्रीय भाव भावनात्मक ही है। बस वे भावनाएं इनके घटित होने पर कौन-सी दिशा की लय पकड़ती है, यह समय पर निर्भर है। कुछ लोग आहत होने पर अपराध की दुनिया चुनते हैं, कुछ दूसरों के साथ ऐसा न हो, ऐसा कुछ करते हैं। दोनों के केंद्र में भावनाएं ही हैं। वक्त के साथ वक्त की अंगुली पकड़ कर वक्त की तरह चाल चलने की बाध्यता निरंतर इसकी गति-दिशा-लक्ष्य निर्धारित करती चलती है और इससे जुड़ी उसकी कोई भी नियति व्यक्तियों के सचेष्ट प्रयासों का परिणाम है।
