सामाजिक ताने-बाने के संजाल में मानवीय आचरण के कई आयाम हैं, जिसके आलोक में व्यक्ति के अंतर्निहित गुण-अवगुण परखे जाते रहे हैं। बाल्यकाल की प्राकृतिक अवस्था में सबसे मुख्य प्राथमिक पाठशाला घर-आंगन को माना गया है। इस दौर में पारिवारिक वातावरण की छाप और छांव व्यक्तित्व के गढ़ने में मूल भूमिका निभाते हैं।

मान्यता यह भी है कि माता-पिता के मूल स्वभाव के अधिकांश अंश बच्चे नैसर्गिक रूप में ग्रहण करते हैं। जीवन यात्रा के पथ में सकारात्मक और नकारात्मक व्यवहार हर व्यक्ति में किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ है, जो व्यक्ति की दिनचर्या या कर्तव्य पालन के समय देखे जाते रहे हैं।

व्यक्ति के स्वभाव में अगर दया, करुणा, सहयोग, विनम्रता और सहजता का मिश्रण है, तो समाज उसका सम्मान की दृष्टि से आकलन करता है, लेकिन जब इसके प्रतिकूल आचरण व्यक्ति में परिलक्षित होते हैं, तो सामाजिक दृष्टि एक द्वंद्व द्वार पर ठिठक कर रह जाती है कि कहीं अमुक व्यक्ति के किसी कृत्य से परिवार या समाज को अनिष्ट का सामना तो नहीं करना पड़ रहा है।

व्यक्ति के प्रतिकूल आचरण की कई श्रेणियां हैं, जिसमें ‘ईर्ष्या’ एक ऐसी मनोदशा है, जिसकी उत्पत्ति अनायास नहीं होती, बल्कि अचेतन प्रवाह में कई घटित परिस्थितियों के कारण इसका प्रादुर्भाव होता है। बाल मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि कभी-कभी ईर्ष्या का जन्म बच्चों के कोमल मन को अपने घेरे में भी ले लेता है। चूंकि इस अवस्था में उनके मस्तिष्क अत्यंत सरल और तरल होते हैं, इसलिए उनमें प्रतियोगिता, बाल हठ या अंतर्मुखी स्वभाव के लिए घरेलू गतिविधियां उत्तरदायी होती हैं।

ऐसा माना गया है कि ईर्ष्या का बीजारोपण बचपन के आंगन में तब होता है, जब दो बच्चों के बीच अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा पनपने लगती है। अभिभावक द्वारा कुछ बच्चों को अधिक दुलार या उनकी गलतियों की अनदेखी कर उनके सभी कार्यों पर सही की मुहर लगा दी जाती है। इससे बच्चों की प्रवृत्ति आत्मकेंद्रित होकर एकपक्षीय हो जाती है। वे अपने सामने वाले बच्चे को कमतर आंकना शुरू कर देते हैं, नतीजतन, दोनों के बीच अस्वस्थ प्रतियोगिता की लहरें उठने लगती हैं। बढ़ती उम्र के दौर में यह आचरण उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है और अभिभावक यह समझ नहीं पाते कि उन्होंने अपने बच्चे की कुशल और सकारात्मक परवरिश में चूक कहां कर दी थी।

मूल रूप से ईर्ष्या प्राय: तनाव, क्रोध, आक्रोश, अपर्याप्तता, लाचारी और घृणा रूपी भावनाओं का एक प्रतिकूल संयोजन है। यह मानवीय रिश्तों में एक ऐसा विशिष्ट अनुभव अंश है, जिसमें ईर्ष्या धारक अपने व्यक्तित्व के समग्र विकास में स्वयं अवरोध उत्पन्न करते हैं। मिथ्या मर्यादा के पालन में वे सही और गलत में भेद करने से चूक जाते हैं। असफल व्यक्ति के कारणों में यह पाया गया है कि उसकी मजबूत भावनाओं की शृंखला, जो उसे ऊंचाई देने को उत्सुक थीं, कृत्रिम तामझाम और ईर्ष्या भाव ने उसे प्रगति पथ से दूर कर दिया। ईर्ष्यालु व्यक्ति अपने भीतर छिपे गुणों को पहचान नहीं पाते और अपने जटिल एवं आत्ममुग्ध स्वभाव के कारण सदा दूसरों की हानि की मौन कामना में लीन रहते हैं।

प्राय: जीवन में सुरक्षा की कमी के कारण भी ईर्ष्या अपना प्रभाव पैदा करके सृजन के सेतु को कमजोर कर देती है। ईर्ष्या की आम धारणा के निहितार्थ हैं कि यह सदा नकारात्मक स्थिति का संवाहक बनकर अपने आभासी आनंद के हिलोरे लेने का आदी बना देती है। यह भाव उसके आंतरिक मनोभाव को किस स्तर तक चोट पहुंचाता है, उसे तब तक पता नहीं चलता जब तक कि वह अपने ईर्ष्यालु आचरण के गुण-दोष का नीर-क्षीर विवेचन नहीं कर पाता। जब यह घड़ी आती है, उस व्यक्ति विशेष की जीवन यात्रा का प्रमुख पल हाथ से निकल जाता है।

हालांकि व्यक्ति में ईर्ष्या अल्पकालिक होती है और वह बिना कुछ नुकसान किए अपना रास्ता नाप भी लेती है। चूंकि हम मानव हैं, इसलिए अपनी मानसिक चिंतन धारा के निरंतर प्रवाह में आत्मावलोकन विधा से इसके विसर्जन का मार्ग तलाशते हैं, जिसमें प्रबल इच्छाशक्ति हमें विजय प्राप्त कराती है और स्वत: स्फूर्त ईर्ष्या अतिथि की भांति जीवन पथ से बिना देर किए प्रस्थान कर जाती है। समस्या विकट तब होती है, जब ईर्ष्या में बढ़ोतरी के मद्देनजर हम अपने विवेक को जागृत नहीं करते। मानसिक तरंग के साक्ष्य बताते हैं कि व्यक्ति द्वारा महसूस की गई कोई मजबूत भावना जब नकारात्मक नभ में विचरण करने को बेताब हो जाए, तो ईर्ष्या के पांव बढ़ने लगते हैं।

प्रश्न है कि ईर्ष्या के घनत्व को कैसे कम किया जाए या इसे किस तरह अपने जीवन से विसर्जित किया जाए। जन्म लेने के बाद बच्चे सब कुछ अपने घर-आंगन के परिवेश में ही सीखते हैं। यानी अभिभावकों के अधिक चिंतनशील होने से ही इस दुर्गुण को दूर किया जा सकता है। ईर्ष्यालु होने पर विवश बच्चों के आत्मविश्वास के केंद्र को मृदुल स्पर्श देते हुए उन्हें उन सभी प्रतिकूल स्थितियों से विलग रखा जाए। सकारात्मक ऊर्जा ही हमारी मानसिक दुर्बलताओं पर विजय पाने का अवसर प्रदान करती है, बशर्ते आत्मचिंतन से व्यक्ति अपने भीतर जमा ऊर्जा का भरपूर उपयोग करने में तत्पर हो जाए। विभिन्न स्तर पर प्रतियोगी परीक्षाओं की जटिल प्रक्रिया में जब युवा पीढ़ी को सफलता और असफलता के बीच आज संघर्षरत होना पड़ रहा है तो, यहां भी ईर्ष्या अपने प्रभुत्व में प्रतिबिंबित हो रही है, लेकिन जब संकल्पित प्रतियोगी अपने लक्ष्य बिंदु पर अर्जुन दृष्टि बनाए रखते हैं, तो ईर्ष्या स्वयं अपना बोरिया बिस्तर समेट लेती है। निश्चय ही जीवन चक्र से ईर्ष्या की इतिश्री व्यक्ति के समावेशी विकास के लिए संजीवनी बूटी की तरह है।