वर्तमान में पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने कई लोगों को हैरान किया है कि भारत एक पक्ष की ओर झुकता हुआ दिखाई दे रहा है। बुद्धिजीवियों का एक तबका आज भी मानता है कि संघर्ष और युद्ध के समय भारत की एक ही नीति रही है- खुलकर किसी का पक्ष न लिया जाए।

लेकिन हमेशा से भारत की स्थिति ऐसी नहीं रही है। आज़ादी के बाद दिल्ली का तर्क न्यूट्रैलिटी से ज्यादा इस बात पर रहता था कि वह मुद्दे के आधार पर अपना स्टैंड तय करेगा। कहा जरूर यही जाता रहा, लेकिन अगर इतिहास के पन्ने टटोले जाएं और ट्रैक रिकॉर्ड की समीक्षा की जाए तो कहानी इतनी भी सरल नहीं है।

भारत ने अक्सर पक्ष लिया है- कभी बहुत जोरदार तरीके से, कभी बचाव की स्थिति में और कभी परोक्ष रूप से। कई बार यह भी देखा गया कि सरकार बदलने के साथ ही भारत की विदेश नीति भी कुछ मुद्दों पर बदल गई।

अमेरिका को लेकर भारत का रुख

यह भी देखा गया है कि जब अमेरिका या पश्चिमी देशों पर कोई आरोप लगा, तब भारत अपेक्षाकृत सहज तरीके से स्पष्ट स्टैंड ले पाया। भारत का पश्चिम विरोध कोई अचानक पैदा हुई भावना नहीं है। चाहे बात एंटी-कॉलोनियल भावना की हो, या पाकिस्तान, कश्मीर और न्यूक्लियर प्रोलिफरेशन जैसे मुद्दों की,इन सब पर भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय तक मतभेद रहे हैं।

लेकिन भारत की विदेश नीति में एक और पैटर्न भी दिखाई देता है। जब भी मॉस्को की ओर से अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन हुआ, भारत खुलकर कुछ कहने से बचता रहा। इसके कई उदाहरण मिलते हैं-चाहे 1956 में हंगरी में सोवियत हस्तक्षेप हो, 1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत आक्रमण हो, या फिर 2014 में रूस द्वारा क्रीमिया पर कब्जा। इन मामलों में भी भारत ने बहुत स्पष्ट रुख नहीं अपनाया।

कई लोग इसे “डबल स्टैंडर्ड” कहते हैं, लेकिन सच्चाई यह भी है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसा व्यवहार अक्सर रणनीति का हिस्सा होता है। मॉस्को की आलोचना करने से भारत का हिचकना इसलिए भी समझा जा सकता है क्योंकि रणनीतिक रूप से रूस भारत के लिए लंबे समय से महत्वपूर्ण साझेदार रहा है।

रूस को लेकर भारत की नीति

फिर भी कुछ ऐसे मौके भी आए जब भारत ने रूस के खिलाफ रुख अपनाया। उदाहरण के तौर पर, जब सोवियत फोर्सेज ने अफगानिस्तान में हस्तक्षेप किया, तब चरण सिंह की सरकार ने अपेक्षाकृत सख्त रुख अपनाया। उस समय जनता पार्टी की विचारधारा के प्रभाव की भी चर्चा हुई। लेकिन जैसे ही इंदिरा गांधी सत्ता में लौटीं, भारत का रुख बदल गया। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि बृजेश मिश्रा को निर्देश दिए गए कि सोवियत संघ की निंदा से जुड़े वोटिंग प्रोसेस से दूरी बनाए रखें।

आगे चलकर भारतीय कूटनीति ने यह तर्क देना शुरू कर दिया कि अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप वहां की कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ बाहरी दखल के कारण हुआ।

इसी तरह कंबोडिया के मुद्दे पर भी भारत की नीति बदली। 1978 में जनता सरकार ने वियतनाम द्वारा कंबोडिया पर किए गए आक्रमण की आलोचना की थी और वहां स्थापित सरकार को मान्यता देने से परहेज किया था। लेकिन 1980 में कांग्रेस सरकार ने अपना रुख बदलते हुए उस सरकार को मान्यता दे दी। उस समय तर्क दिया गया कि दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन के प्रभाव को संतुलित करने के लिए वियतनाम का समर्थन जरूरी है। विडंबना यह है कि आज कंबोडिया ही चीन के सबसे मजबूत एशियाई साझेदारों में से एक बन चुका है।

1950 में भी भारत ने ऐसी कूटनीति दिखाई थी, जब कोरियाई युद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्र में चीन की निंदा को रोकने की कोशिश की गई। उस समय जवाहरलाल नेहरू बीजिंग के साथ मजबूत रिश्ते बनाने में लगे थे और एशिया में एक नई व्यवस्था की कल्पना कर रहे थे।

1990 में जब सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर हमला किया, तब भी भारत खुलकर इराक की कार्रवाई की निंदा नहीं कर पाया। उस समय सद्दाम हुसैन को एक सेक्युलर नेता के तौर पर देखा जाता था और माना जाता था कि कई मुद्दों पर उन्होंने भारत का समर्थन किया है, खासकर पाकिस्तान से जुड़े मामलों में। इसके अलावा इराक तेल के क्षेत्र में भारत का एक अहम साझेदार भी था।

पश्चिम-एशिया को लेकर भारत की नीति

अब अगर वर्तमान स्थिति की बात करें और मिडिल ईस्ट को देखें, तो यहां भारत की विदेश नीति स्पष्ट रूप से अपने हितों के आधार पर तय हो रही है। इस समय खाड़ी देशों के साथ भारत का लगभग 200 अरब डॉलर का व्यापार है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भी बड़े पैमाने पर इसी क्षेत्र पर निर्भर है। इसके अलावा लगभग 90 लाख भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में रहकर काम कर रहे हैं। ऐसे में अपने हितों की सुरक्षा करना ही दिल्ली की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गया है।

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