महिलाएं कामकाजी हों या गृहिणी, उनके श्रम का सम्मान उनके अस्तित्व की सहज स्वीकार्यता से जुड़ा है। हाल के वर्षों में कामकाजी स्त्रियों की उपस्थिति और आर्थिक भूमिका की स्वीकार्यता बढ़ी है। उनकी समस्याओं को समझने की सोच को बल मिला है। वहीं गृहिणियों के श्रम की अनदेखी से जुड़ी पारंपरिक सोच आज भी कायम है। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में कई न्यायिक निर्णयों में घरेलू महिलाओं की भूमिका को समझने और सम्मान देने की बात कही गई।
हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की कि गृहिणी को निष्क्रिय मानना घरेलू योगदान की गलत समझ को दर्शाता है। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि घरेलू संबंधों में पत्नी के योगदान के आर्थिक मूल्य को कानून में मान्यता दी जानी चाहिए। वर्ष 2012 में हुए विवाह से जुड़े मामले में पत्नी का आरोप था कि 2020 में पति ने उसे और नाबालिग बेटे को छोड़ दिया।
हाईकोर्ट ने कहा- कमाने की क्षमता और वास्तविक कमाई दो अलग बातें हैं
निचली अदालत ने यह कहते हुए राहत देने से इनकार कर दिया था कि पत्नी शिक्षित और सक्षम है, लेकिन उसने नौकरी नहीं की। मगर इस मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि कमाने की क्षमता और वास्तविक कमाई दो अलग बातें हैं। साथ ही भरण-पोषण के आवेदन पर सुनवाई करते हुए यह भी जोड़ा कि ‘गृहिणी’ या ‘होममेकर’ का श्रम कमाने वाले जीवनसाथी को प्रभावी ढंग से काम करने में सक्षम बनाता है, इसलिए उसकी बेरोजगारी को आलस्य के बराबर मानना अन्यायपूर्ण है।
ये टिप्पणियां स्त्री जीवन के उस आधारभूत पक्ष को संबोधित करती हैं, जिसकी अनदेखी की गई। जबकि स्त्रियों की इस भागीदारी में शारीरिक-मानसिक श्रम ही नहीं, भावनात्मक मोर्चे पर की गई मशक्कत भी होती है। बच्चों के पालन-पोषण से लेकर बुजुर्गों की संभाल तक संवेदना और संयम का यह परिश्रम हमारी पारिवारिक व्यवस्था को थामे हुए है। गृहिणी के रूप में अपने दायित्वों को संभालने वाली एक पूरी पीढ़ी आज की कामकाजी बहू-बेटियों के जीवन की बुनियाद बनाने वाली रही हैं।
वैवाहिक जीवन में भी घरेलू जिम्मेदारियां उठाने वाली महिलाएं जीवनसाथी का जीवन आसान बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। विचारणीय है कि मौद्रिक मूल्य न आंके जाने की वजह से महिलाओं की भूमिका के प्रति भेदभाव होता आया है। अपने घर की खेती-किसानी में हाथ बंटाने वाली महिला कृषक हो या सामाजिक-पारिवारिक रिश्तों को सहेजने में जीवन खपा देने वाली आम स्त्रियां, उनके योगदान की उपेक्षा का रवैया देश के हर हिस्से में रहा है।
ऐसे में अदालत की यह टिप्पणी अहम हो जाती है कि कानून को केवल आय को ही नहीं, बल्कि विवाह के दौरान घर और पारिवारिक संबंधों में पत्नी के घरेलू श्रम के योगदान के आर्थिक मूल्य को भी मान्यता देनी चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि घरेलू कार्य, बच्चों की देखभाल और परिवार के समर्थन का भी आर्थिक मूल्य है, भले ही वह आयकर या बैंक विवरण में दर्ज न हो।
इसीलिए कानून यह सुनिश्चित करे कि परिवार निर्माण में समय और श्रम का निवेश करने वाला जीवनसाथी असहाय न रह जाए। विडंबना है कि स्त्रियों की इस श्रमशील भूमिका के प्रति सम्मान का भाव आज भी नदारद है। यहां तक कि उनके अस्तित्व को ही नकार देने का भाव दिखता है।
कुछ समय पहले उच्चतम न्यायालय ने भी कहा था कि गृहिणी का काम वेतन घर लाने वाली महिला से कम नहीं होता। परिवार में भले ही उसके योगदान का मौद्रिक आकलन नहीं किया जा सकता, पर अपनों की देखभाल करने वाली इस भूमिका का विशेष महत्त्व है।
गौरतलब है कि 2006 में उत्तराखंड में हुई एक दुर्घटना में महिला की मौत हो गई थी। महिला जिस वाहन से यात्रा कर रही थी, उसका बीमा न होने की वजह से न्यायाधिकरण ने महिला के परिवार को ढाई लाख रुपए की क्षतिपूर्ति देने का फैसला किया था। दुखद पक्ष यह रहा कि महिला को मिलने वाली बीमा राशि को न्यायाधिकरण ने कम आंका, क्योंकि महिला गृहिणी थी। इसलिए मुआवजा जीवन प्रत्याशा और न्यूनतम अनुमानित आय पर तय किया गया था।
केरल उच्च न्यायालय द्वारा भी केरल राज्य सड़क परिवहन निगम को एक सड़क हादसे में पीड़िता को इस आधार पर मुआवजा देने से इनकार करने पर फटकार लगाई जा चुकी है कि पीड़िता एक गृहिणी है। गृहिणी होने की वजह मुआवजे का पात्र नहीं माने जाने के तर्क को अदालत ने अपमानजनक और समझ के परे बताते हुए कहा था कि हादसे के लिए मुआवजा एक गृहिणी और कामकाजी महिला के लिए समान होना चाहिए।
सशक्त और सजग स्त्रियों का समाज बनाने वाले दावों और वादों के बीच घर-परिवार में स्त्री के परिश्रम की अनदेखी का बर्ताव दुखद है। जबकि गृहिणी या घर को घर बनाने वाली स्त्री की भागदौड़ से ही स्वजनों-परिजनों के जीवन की गति जुड़ी है। उनसे मिली देखभाल नई पीढ़ी को सपने साधने का धरातल देती है। उनकी मौजूदगी से वरिष्ठजनों को सुरक्षा-संभाल का भरोसा मिलता है।
बावजूद इसके आर्थिक उपार्जन का आकलन करने वाला समाज यह समझने का प्रयास नहीं करता कि यह भागीदारी अनमोल है। अफसोस कि सरकारी नीतियों और योजनाओं में भी गृहिणियों के लिए कहीं कोई विशेष प्रावधान नजर नहीं आता। जबकि वेतन चुकाकर न तो ऐसी जिम्मेदारियां किसी को दी जा सकती है और न ही कोई आत्मीय भाव संग ऐसे दायित्वों का निर्वहन कर सकता है।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की 2021 की रपट बताती है कि विश्व में महिलाएं अवैतनिक घरेलू कार्यों के लिए कुल घंटों का छिहत्तर फीसद समय देती हैं। एशियाई देशों में यह आंकड़ा अस्सी फीसद से भी ज्यादा है। जरूरी है कि गृहिणियों को दूसरों पर निर्भर व्यक्तित्व के रूप में देखने के बजाय उनके श्रम के सम्मान का भाव आए। घर तक सिमटी जिंदगी जी रही महिलाओं को समझने का परिवेश बनाया जाए। उनकी भूमिका के प्रति उपेक्षा का व्यवहार उनका मनोबल तोड़ता है। ऐसे में अपनों की भावनात्मक समस्याओं को समझने वाली घरेलू स्त्रियों को भी समाज और परिवार का संबल मिले।
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अर्थव्यवस्था के मुख्य रूप से तीन क्षेत्र होते हैं। पहला प्राथमिक क्षेत्र, जिसके अंतर्गत प्राकृतिक संसाधनों के निष्कर्षण और उत्पादन से संबंधित क्रियाएं होती हैं। जैसे कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, वनस्पति और वन उत्पाद और खनन। दूसरा क्षेत्र है जिसमें प्राथमिक क्षेत्र से प्राप्त कच्चे माल से विभिन्न उत्पादों का निर्माण किया जाता है। इसमें विनिर्माण उद्योग, निर्माण कार्य और बिजली उत्पादन जैसी गतिविधियों को सम्मिलित किया जाता है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
