कथाकार ओ हेनरी की एक लोकप्रिय लघुकथा है- ‘द लास्ट लीफ’। इसे कई जगहों पर अंग्रेजी स्कूलों के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया है। यह दरअसल, उम्मीद को पकड़ कर मौत के मुंह से बच निकलने की सबसे प्रेरक कहानियों में से एक है। इसकी कहानी यह है कि कड़ाके की ठंड के दिनों में शहर में जानलेवा निमोनिया फैला था। एक लड़की इसकी चपेट में आ गई। रोग इतना गंभीर हुआ कि दवाइयों का असर होना बंद हो गया।
लड़की बिस्तर से खिड़की के बाहर झांकती रहती और सोचती रहती कि सामने की बेल का जब आखिरी पत्ता गिर जाएगा, तो वह भी नहीं बचेगी। मगर इसी के समांतर एक विचित्र अनहोनी हो गई! आखिरी पत्ता सही-सलामत रहा- न गिरा, न मुरझाया। बावजूद इसके कि इस दौरान तेज आंधी भी चली और पानी भी खूब बरसा। देख-देख लड़की एकदम चंगी हो गई। बाद में यह जाहिर हुआ कि दीवार पर चढ़ी बेल का आखिरी पत्ता एक माहिर चित्रकार ने अपने रंगों की कूची से बनाया था। यानी आखिरी पत्ता बेशक नकली था, लेकिन उससे बच्ची के भीतर उपजी जीने की उम्मीद असली थी, जिसने रंग दिखा दिया।
इसी प्रकार, गुलजार की कविता ‘एक अकेला पत्ता’ में एक पेड़ बाढ़ के पानी में आधा डूबा हुआ है, लेकिन पानी से बाहर निकली पेड़ की टहनी से जुड़ा एक अकेला पत्ता उससे धीरे से कहता है, ‘डरो मत, मैं हूं न!’ डूबते व्यक्ति के मन की यही भावना कमाल कर दिखाती है। किसी शायर ने हर हाल में उम्मीद का दामन थामे रखने पर फरमाया है कि ‘उम्मीद कीजिए, अगर उम्मीद कुछ नहीं…’, बेशक जिंदगी में दुश्वारियां कम नहीं हैं। इसीलिए जिंदगी और मौत में से जिंदगी को ही चुना जाता है, या हर व्यक्ति को यही चुनना चाहिए।
दुखों के बीच भी आशा की किरण टिमटिमाती रहती है कि एक दिन दुख खत्म होगा और सुख की सुबह आएगी। यही उम्मीद है कि सबसे गहरे दुख से गुजरते व्यक्ति के भीतर भी जीने के बहाने लाखों हैं। उम्मीद की डोर थामने से इंसान अंदरूनी ताकत से लबालब हो उठता है। मुश्किल से मुश्किल दौर में भी अपने भीतर की शक्ति के दम पर इंसान जीवन के उतार-चढ़ाव में डांवाडोल नहीं होता, बल्कि डटा रहता है और इसी से मिले हौसले की वजह से आखिर जीत कर निकलता है। बेहतर जीवन जीने में भी लोग महारत हासिल करते हैं। परिवार, किताबें, प्रवचन, सिनेमा, कला- कृतियां, दोस्त- गुरु वगैरह ही नहीं, दिलोदिमाग को खोल कर घूमने से अपने भीतर बखूबी उम्मीद के बीज बोए जा सकते हैं।
सच यह है कि उम्मीद के साथ जीने से नामुमकिन भी मुमकिन हो जाता है। महात्मा बुद्ध इसे यों समझाते हैं कि अगर हम मान लें कि कल ज्यादा बेहतर होगा, तो आज हम ज्यादा शक्तिपूर्वक और प्रभावी ढंग से विपदाओं को सह सकते हैं। नाउम्मीदी से मनोबल घटता है, जबकि उम्मीद को जिंदा रखने से बढ़ता है। उम्मीद कमजोर हो, तो कई बार जीती जाने वाली लड़ाई भी हार जाई जाती है और उम्मीद कायम हो, तो हारी हुई लड़ाई भी इंसान जीत सकता है। विकट से विकट परिस्थिति कभी पूरी तरह खराब नहीं होती, केवल हमें उनसे निपटना नहीं आता। तो उम्मीद, कोशिश और प्रार्थना में से पहले क्या चुना जाए? सयाने बताते हैं कि पहले उम्मीद पैदा कीजिए, फिर कोशिश में जुटिए और आखिर में प्रार्थना कीजिए।
उम्मीद के साथ बचाव में किए छोटे-छोटे प्रयास भी वाकई बड़े साबित होते हैं। एक कहानी है कि एक दफा जंगल धू-धू कर जलने लगा। कुछ भयभीत जानवर जंगल से निकल कर भागने लगे। ज्यादातर गहरे सदमे और अफसोस में डूबे मूकदर्शक बन कर ताकने लगे। मगर एक नन्ही-सी गौरैया जुट गई। वह उड़ती, नदी किनारे जाती और पानी की चंद बूंदें अपनी चोंच में भर कर ले आती। फिर ऊपर आकाश से अपनी चोंच खोल कर जलते पेड़ों पर उड़ेल देती। वह चक्कर पर चक्कर लगातार घंटों ऐसा करती रही। कोई जानवर या पक्षी उसके साथ नहीं लगा, उल्टा कई नाउम्मीदी के भाव से उसे ताने कसने लगे कि ‘इतना विशाल जंगल और तुम नन्ही-सी?’ दूसरा कहता, ‘अरे! बचना। कहीं तुम्हारे पंख ही न जल जाएं।’ तीसरे ने चेताया, ‘पगली, तेरी बूंदों से आग की लपटें कहां शांत होने वाली हैं?’ गौरैया जान गई कि उसके सभी साथी पूरे निराशावादी हैं। पानी की बूंदें ले जाने के लिए उड़ान भरते-भरते गौरैया ने पीछे मुड़Þकर कर दोटूक जवाब दिया- ‘मैं जो कर सकती हूं, वह कर रही हूं।’
हर हाल में मिजाज ठंडा रख कर हर संभव प्रयास करते जाना ही निराशा की काट का जरिया बनता है। निराशा के भाव को घेरने नहीं देना चाहिए। आशा करते-करते ही निराशा छंटती है। वैज्ञानिक तथ्य है कि उम्मीदी की प्रबल सोच से दो-तिहाई समस्याओं के समाधान खुद-ब-खुद निकलते जाते हैं। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि कोई विपदा इतनी बड़ी नहीं होती, जितनी विपरीत सोच है कि अब कुछ नहीं हो सकता। इसलिए सदा सुलझाने की उम्मीद जगाना लाजमी है। उम्मीद की मलहम लगाते रहने के दौरान समस्या का कोई न कोई कारगर इलाज या हल निकल ही आता है। ‘जीवन चलने का नाम’ का भाव हमेशा दिलोदिमाग में संजोए रखने से उम्मीद बंधी रहती है, आस नहीं टूटती। पीपल के पेड़ से बखूबी सीख मिलती है कि मरुभूमि हो या बंजर स्थान, दलदल हो या दीवार, पीपल कहीं भी अपनी जड़ें जमा लेता है। वह नाउम्मीदी को भी उम्मीद से पार ले जाता है। यानी हर इंसान में पीपल जैसी जिजीविषा होनी चाहिए।
