इस समय उत्तर और मध्य भारत का एक बड़ा हिस्सा भीषण लू की चपेट में है। कई जगहों पर तापमान 44-46 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है। भारत जैसे देश के लिए गर्मी कोई नई बात नहीं है, लेकिन इसके साथ हमारा रिश्ता अब बदल रहा है। ऐसा इसलिए है कि इंसानों ने वैश्विक जलवायु को बदल दिया है। बीते दस साल पूरी दुनिया में अब तक के सबसे गर्म साल रहे हैं। हमने अपने आसपास की जलवायु को भी बदल दिया है। हमने अपने घर और शहर बनाने का तरीका, अपनी जीवनशैली और प्रकृति के साथ अपने रिश्ते को भी बदल दिया है। इसकी वजह से बढ़ती गर्मी के हिसाब से खुद को ढालना अब हमारे लिए और भी मुश्किल हो गया है।
असल में गर्मी कितनी बढ़ी है, यह जानने के लिए 1981-2024 के जलवायु आंकड़ों का अध्ययन किया गया, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता मंच ‘क्रेविस’ पर उपलब्ध है। इसमें कुछ चौंकाने वाले नतीजे सामने आए। पहला, प्रत्येक चार में से तीन भारतीय ऐसे राज्यों में रहते हैं, जहां हर साल भीषण गर्मी का खतरा बना रहता है। दूसरा, बहुत अधिक गर्म दिनों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन बहुत अधिक गर्म रातों की संख्या इससे भी अधिक तेजी से बढ़ रही है। यह खासतौर पर घनी आबादी वाले जिलों और शहरी क्षेत्रों में देखा जा रहा है।
वर्ष 2010 में दिल्ली में जहां हर साल सोलह बहुत गर्म रातें होती थीं, वहीं उच्च उत्सर्जन की स्थिति में वर्ष 2050 तक इनकी संख्या बढ़कर प्रतिवर्ष इक्यावन हो सकती है। इसका इंसान के स्वास्थ्य पर बहुत गंभीर प्रभाव पड़ता है। शरीर और शहर, दोनों को रात के वक्त दिन की गर्मी से राहत नहीं मिल पाती है। इससे वातानुकूलन या ठंडक देने वाली सुविधाओं के बगैर कम हवादार इमारतों में रहने या इनमें काम करने वाले लोगों पर सबसे ज्यादा असर डालता है। तीसरा, गर्मी के मौसम में उमस (आर्द्रता) बढ़ रही है। ऐसा उत्तर भारत और सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों में विशेष रूप से देखा जा रहा है।
ग्यारह से अधिक राज्य इसे राज्य आपदा घोषित कर चुके हैं
गर्मी लोगों के जीवन, आजीविका और बुनियादी ढांचे के सभी पहलुओं को प्रभावित कर रही है। अब तक ग्यारह से अधिक राज्य इसे राज्य आपदा घोषित कर चुके हैं। सोलहवें वित्त आयोग ने भी लू को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने का सुझाव दिया है। इस ‘मूक आपदा’ का प्रभावी तरीके से सामना करने में चार कदम उपयोगी साबित हो सकते हैं। सबसे पहले, शहरी प्रशासकों को गर्मी का सामना करने के लिए स्थानीय स्तर पर योजनाएं बनानी होंगी। गर्मी का असर सभी जगहों पर एक जैसा नहीं होता है। यह स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों और सामाजिक-आर्थिक और बुनियादी ढांचे की स्थितियों के अनुसार अलग-अलग होता है। इसलिए स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर योजना बनाना बहुत जरूरी है। इसका उदाहरण महाराष्ट्र का ठाणे नगर निगम है, जहां पिछले दो वर्षों से ‘हीट एक्शन प्लान’ लागू है।
यह योजना बताती है कि गर्मी से बचाव के लिए कब, कहां और किसे कदम उठाना है। इसके तहत ऐतिहासिक जलवायु आंकड़ों का अध्ययन करके गर्मी के जोखिम का पता लगाया गया और फिर उसके आधार पर अलग-अलग वार्डों को चिह्नित किया गया। इसके अलावा, महसूस होने वाली गर्मी और रात्रिकालीन तापमान के आधार पर प्रत्येक वार्ड में स्थानीय स्तर पर प्रारंभिक चेतावनी जारी करने के लिए तापमान की सीमा भी तय की गई।
ठाणे शहर में इस योजना को लागू करने के लिए विभिन्न विभागों का एक संयुक्त कार्यबल बनाया गया है। इसके पास अलग से बजट भी है। लू चलने पर यह कार्यबल सुनिश्चित करता है कि ठाणे शहर में निशुल्क प्याऊ लगाए जाएं, अधिक भीड़-भाड़ वाले चौराहों, जहां पर लोगों को यातायात संकेतकों की वजह से देर तक रुकना पड़ता है, वहां ‘हरित छांव’ की व्यवस्था की जाए। इसके अलावा, प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों के जरिए वार्ड स्तर पर गर्मी से बचाव के उपायों पर जन-जागरूकता अभियान भी चलाया जा सकता है। ऐसी कार्ययोजना को भीषण गर्मी की चुनौती से जूझ रहे सभी शहरों में लागू करने की जरूरत है।
दूसरा, सभी कारोबारों को अपने व्यवसाय से जुड़ी योजनाओं में गर्मी से बचाव को शामिल करना होगा। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, 2030 तक गर्मी और उमस के कारण लोग ठीक से काम नहीं कर पाएंगे, यानी कामकाजी घंटों का नुकसान होगा। इससे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.5 फीसद के बराबर नुकसान हो सकता है। वर्ष 2025 में श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने सभी राज्यों और नियोक्ताओं को परामर्श जारी किया था। इसमें श्रमिकों, खासतौर पर खुले स्थान पर और कठिन परिश्रम करने वालों को गर्मी से बचाने वाले उपायों को लागू करने के लिए कहा गया था।
गर्मी से न केवल श्रमिकों की सेहत, बल्कि मशीनों की कार्यक्षमता, आपूर्ति श्रृंखला और पानी तथा ऊर्जा का बजट भी प्रभावित होता है। कई भारतीय कंपनियों ने इस दिशा में प्रयास शुरू कर दिए हैं। इसमें गर्मी के खतरे से ज्यादा प्रभावित लोगों की पहचान की गई है। आराम के लिए छायादार जगह बनाने, लगातार पानी पीते रहने का नियम और काम करने की पालियों में बदलाव लागू किए गए हैं। ऐसे प्रयासों को तत्काल बड़े पैमाने पर लागू करने की जरूरत है।
तीसरा, बिजली कंपनियों को अपने बिजली संयंत्र और नेटवर्क को गर्मी से सुरक्षित बनाना होगा। भीषण गर्मी से बचाव में भरोसेमंद और किफायती बिजली आपूर्ति की अहम भूमिका है। हर साल लू चलने के साथ लोग बड़ी संख्या में एसी और कूलर खरीदते हैं। गर्मी, उमस और बिजली में नई मांग आने के कारण विद्युत वितरण नेटवर्क और ट्रांसफार्मर पर अचानक बोझ बढ़ जाता है। वर्ष 2025 में अत्यधिक बोझ और नमी आने के कारण लगभग दस फीसद, यानी तेरह लाख ट्रांसफार्मर खराब हो गए थे। इसके समाधान के लिए ये कदम उठाए जा सकते हैं- पहला, बिजली कंपनियों को अत्यधिक गर्मी वाले क्षेत्रों में अपने नेटवर्क को पहले से मजबूत करना चाहिए।
दूसरा, बिजली कंपनियों को बिजली की मांग का आकलन करते समय रात के समय के अधिक तापमान और एसी के अधिक इस्तेमाल को भी ध्यान में रखना चाहिए। तीसरा, बिजली की बहुत अधिक मांग एक साथ न आए, इसके लिए अलग-अलग समय के लिए अलग-अलग बिजली दरों की व्यवस्था को लागू करने जैसे सुधार करने चाहिए। चौथा, सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने से भी बिजली की अतिरिक्त मांग को पूरा करने में मदद मिलेगी।
सरकारों को सार्वजनिक और निजी निवेशों को गर्मी से बचाव के उपायों की दिशा में ले जाना होगा। साथ ही, गरीब और कमजोर वर्गों, फसलों, पशुओं, जंगलों और घरों, स्कूलों व अस्पतालों को लंबी गर्मी से बचाने के उपाय भी खोजने होंगे। प्रत्येक सरकारी योजना में गर्मी से बचाव की रणनीति को शामिल कर इसकी शुरुआत की जा सकती है, लेकिन व्यापक समाधानों को पाने के लिए निजी निवेश को शोध और विकास के साथ-साथ तापरोधी फसलों, निर्माण सामग्री और ऊर्जा कुशल शीतलन तकनीकों के व्यवसायीकरण की दिशा में मोड़ना होगा। हर साल भारत का गर्मी के साथ रिश्ता बदल रहा है, लेकिन गर्मी का सामना करने की क्षमता विकसित करना न तो आसान होगा, न ही सस्ता। ऐसे में अगर राष्ट्रीय स्तर पर जनभागीदारी आए, तो यह इसका सामना करने के लिए अच्छी तरह तैयार होने में मदद कर सकता है।
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देश में भीषण गर्मी के बीच मॉनसून को लेकर बड़ी अपडेट सामने आई है। मौसम विभाग (IMD) ने अपने नए अनुमान में कहा है कि इस साल भारत में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के दौरान लंबी अवधि की औसत बारिश (LPA) का करीब 90 फीसदी बारिश हो सकती है। यानी इस बार मॉनसून सामान्य से थोड़ा कमजोर रह सकता है। मौसम विभाग ने शुक्रवार को जारी अपने दूसरे मॉनसून पूर्वानुमान में बताया कि पूर्वोत्तर भारत में सामान्य बारिश होने की संभावना है, लेकिन देश के बाकी हिस्सों में बारिश सामान्य से कम रह सकती है। इससे पहले 13 अप्रैल को जारी पहले अनुमान में मौसम विभाग ने 92 फीसदी बारिश का अनुमान जताया था, जिसे अब घटाकर 90 फीसदी कर दिया गया है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
