देश में आज भी जरूरत के मुकाबले पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। यही वजह है कि आबादी का बड़ा हिस्सा अब भी स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित है। अस्पतालों और चिकित्सकों की उपलब्धता भी जनसंख्या घनत्व के हिसाब से बहुत कम है। सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाओं, आधारभूत संरचना, चिकित्सकों, कमरों, दवाइयों, कुशल और प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ तथा दूसरी सुविधाओं की कमी है।
इन्हीं अभावों के बीच निजी स्वास्थ्य क्षेत्र को विस्तार करने का मौका मिल गया, जिसका गरीब लोगों से कोई वास्ता नहीं। स्वास्थ्य सेवा किसी भी देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति का महत्त्वपूर्ण मापदंड है, क्योंकि बिना स्वस्थ समाज के किसी भी देश का आर्थिक, औद्योगिक और सांस्कृतिक विकास संभव नहीं है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में स्वास्थ्य सेवाओं का क्षेत्र लगातार सुधार और विस्तार का केंद्र रहा है। आज इसे मजबूत बनाने की जरूरत है।
हालांकि, अभी भी हमें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इन चुनौतियों के समाधान के लिए सरकार काम तो कर रही है, फिर भी स्वास्थ्य क्षेत्र में स्थिति दयनीय बनी हुई है। यही वजह है कि हर साल करोड़ों भारतीय इलाज पर बेतहाशा खर्च के कारण आर्थिक रूप से बर्बादी के कगार पर पहुंच जाते हैं।
अस्पताल के बिल लोगों को बना रहे गरीब?
एक रिपोर्ट के मुताबिक, अस्पतालों के भारी-भरकम बिल भरने की वजह से भारत में हर साल करीब छह करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। ऐसे लोग इलाज के लिए भारी कर्ज लेते हैं। इसका प्रमुख कारण सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच नहीं होना है।
असली भारत गांव में बसता है, लेकिन यह दुखद ही है कि गांव के लोगों की सेहत का खयाल रखने वाले चिकित्सा केंद्र आज भी बदतर हैं। शहरों में निजी अस्पतालों की भरमार है। ये महंगे जरूर हैं, लेकिन आधुनिक सुविधाओं से लैस हैं। वहीं गांवों में सरकारी अस्पताल भी दूरदराज स्थित हैं और वहां योग्य चिकित्सकों की भी कमी है। ग्रामीण भारत की लगभग 70 फीसद आबादी केवल 30 फीसद चिकित्सकों पर निर्भर है।
एक हजार लोगों पर केवल आठ चिकित्सक
भारत में प्रति एक हजार लोगों पर केवल आठ चिकित्सक उपलब्ध हैं। स्वास्थ्य सेवाएं कितनी सुलभ हैं, इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि भारत में केवल 30 फीसद लोग ही किसी न किसी प्रकार के स्वास्थ्य बीमा से सुरक्षित हैं।
बाकी लोग बीमारी की स्थिति में जेब से खर्च करने पर मजबूर होते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में चलने वाले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में विशेषज्ञों की काफी कमी देखी जाती है। ऐसे में शहर और गांव के बीच एक ऐसी खाई बन गई है, जिसका परिणाम भविष्य में काफी भयावह हो सकता है।
भले ही देश में तरक्की के कितनी भी दावे किए जाएं, पर गांव में करीब 60 से 70 फीसद चिकित्सा विशेषज्ञों की कमी होना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। ऐसे में भारत स्वस्थ कैसे बनेगा? यह एक बड़ा सवाल है। भले ही सरकार हर साल स्वास्थ्य सेवाओं पर करोड़ों रुपए का बजट पेश करती है, लेकिन आज भी देश की स्वास्थ्य सेवाएं सवालों के घेरे में हैं। जबकि शिक्षा और स्वास्थ्य दो ऐसे क्षेत्र हैं, जिससे मानव संसाधन को बेहतर बनाया जा सकता है।
‘शिक्षा और स्वास्थ्य हर हाल में सरकारी क्षेत्र में ही होने चाहिए’
अमर्त्य सेन का कहना है कि उदारीकरण के लिए चाहे जितने भी क्षेत्र खोल दें, शिक्षा और स्वास्थ्य दो ऐसे क्षेत्र हैं जिसे हर हाल में सरकारी क्षेत्र में ही होने चाहिए। मगर इस सलाह पर कभी ध्यान नहीं दिया गया। कनाडा, डेनमार्क, स्वीडन, नार्वे, जर्मनी, ब्रिटेन, जापान और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में दुनिया की सबसे अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जा रही हैं।
दूसरी ओर, भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश में बिना ज्यादा पैसे खर्च किए अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिल पाती हैं। जाहिर है, आबादी लगातार बढ़ने के बावजूद आधारभूत ढांचे में सुधार पर अब तक जितना ध्यान देना चाहिए था, उतना नहीं दिया गया।
विचित्र बात है कि जब देश में इन समस्याओं से निपटने के लिए सभी जरूरी संसाधन मौजूद हैं, तो व्यवस्था दुरुस्त क्यों नहीं की जा रही है। हालांकि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की घोषणा और क्रियान्वयन से यह उम्मीद जगी थी कि भारत की तस्वीर बदल जाएगी, परंतु ऐसा नहीं हुआ।
जीडीपी का करीब दो फीसद भी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च नहीं करता भारत
भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। मगर आश्चर्य है कि यह अपनी कुल जीडीपी का करीब दो फीसद हिस्सा भी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च नहीं करता है। यह इतनी बड़ी आबादी वाले देश के लिए ऊंट के मुंह में जीरे के सामान है। यह ठीक है कि आयुष्मान भारत योजना जैसे सरकारी कार्यक्रमों ने करोड़ों लोगों को स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान की है, मगर आज भी इसका आधा-अधूरा फायदा ही आम लोगों को मिल पाता है।
साफ है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में दूसरे विकासशील देशों की बराबरी के लिए हमें काफी कुछ करना होगा। अमर्त्य सेन भी लगातार जोर देते रहे हैं कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए किसी एकीकृत कार्ययोजना की सख्त जरूरत है। उनका मानना है कि आर्थिक प्रगति के साथ-साथ सामाजिक प्रगति भी उतनी ही जरूरी है। यदि हम चीन के साथ आर्थिक विकास की तुलना करें, तो उसके आर्थिक विकास का बहुत बड़ा कारण उसका स्वास्थ्य एवं शिक्षा में निवेश करना रहा है।
अपने नागरिकों को विश्व की स्पर्धा में आगे लाने के लिए भारत को आगे बढ़ना होगा। फिक्की के एक सर्वे के मुताबिक 65 फीसद भारतीय महंगे इलाज के कारण कर्ज के जाल में फंस जाते हैं। इनमें से तीन फीसद तो ऐसे हैं, जो बीमारी पर खर्च की वजह से गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं।
बीमारी पर होने वाला 61 फीसद खर्च जेब से दिया जाता है
इतना ही नहीं देश में बीमारी पर होने वाला 61 फीसद खर्च जेब से दिया जाता है। यानी इसके लिए न तो कोई बीमा होता है और न कोई दूसरी लोक कल्याणकारी योजना। वहीं हमारा देश दिल, गुर्दे और श्वास रोगों का घर बनता जा रहा है। मधुमेह के लिए तो उसे विश्व की राजधानी ही कहा जाने लगा है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वे में यह बात सामने आई है कि 15 से 49 वर्ष आयु के पुरुषों में दिल की बीमारी मौत का प्रमुख कारण बन रही है। यह ठीक है कि देश में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं और केंद्र सरकार द्वारा स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च की जाने वाली राशि का बजट में लगातार प्रावधान बढ़ाया जा रहा है, लेकिन स्वास्थ्य के क्षेत्र में जितनी उपलब्धता होनी चाहिए, उतनी अभी भी नहीं हो पाई है।
दरअसल, किसी भी देश के लिए उसके नागरिकों का स्वास्थ्य एक बड़ी पूंजी होता है। यदि देश के निवासी स्वस्थ हैं, तो वहां की सरकार राष्ट्र की सुरक्षा और शिक्षा सहित अन्य महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में निवेश एवं प्रगति पर ध्यान दे सकती है। देश में स्वास्थ्य संरचना, उपचार, परीक्षण और शोध पर निरंतर कार्य करने की आवश्यकता है, ताकि सबके स्वास्थ्य का सपना साकार हो सके और हमारे देश को इस मानव पूंजी का सार्वभौमिक लाभ प्राप्त हो सके।
