राजधानी दिल्ली के जिमखाना क्लब का अभिप्राय क्या है? इस प्रश्न का जन्म उस विवाद के गर्भ से हुआ है, जो केंद्र सरकार द्वारा जमीन खाली करने के आदेश से उपजा है। इसका निर्माण 1913 में अंग्रेजों ने किया था। उपनिवेश के संसाधनों को लूटना और यहां के लोगों के श्रम और संसाधनों से अपनी विलासिता के लिए क्लबों और भवनों का निर्माण करना वे अपना नैसर्गिक अधिकार मानते थे।

अंग्रेज अपनी प्रकृति से क्रूर और विलासी थे। जनरल डायर और लुटियंस जैसे दोनों ही प्रकार के लोग उपनिवेश को अपने तरीके से नियंत्रित और विकसित कर रहे थे। सत्ताईस एकड़ भूमि में खाने-पीने-खेलने का क्लब लुटियंस ने बनाया, तो छह साल बाद जनरल डायर ने गोलियों से सैकड़ों लोगों को अमृतसर के जलियांवाला बाग में भून डाला था।

स्वतंत्र भारत के लिए नैतिक धर्म था एक को (जलियांवाला बाग) स्मृति का हिस्सा बना लेना तो दूसरे (जिमखाना क्लब) को विस्मृत कर देना। पर ऐसा हुआ नहीं। आखिर सौ साल बाद राजग सरकार ने 2019 में जलियांवाला बाग को अपेक्षित स्वरूप दिया और साथ में लुटियंस की विरासत को विस्मृत करने का उपक्रम शुरू किया। जिमखाना क्लब धरोहर नहीं है, न हो सकता है। उपनिवेशवाद की हर कृति को धरोहर मानकर पूजा करना मानसिक गुलामी को बनाए रखना है।

फ्रैंज फैनन एक बड़े विचारक हैं। उन्होंने औपनिवेशिक संरचनाओं को गुलामी का जीवंत प्रतीक माना था। उन संरचनाओं को विस्मृत कर स्वदेशी योजना, मन और संदर्भ से नई रचना बनाना उपनिवेशवाद को पूरी तरह दफनाने के लिए आवश्यक है। नेहरूवादी व्यवस्था को क्वीन विक्टोरिया, किंग एडवर्ड जैसों की मूर्तियों को हटाने में डेढ़ दशक लग गए, तो वे जिमखाना पर क्यों गौर करते!

जिमखाना क्लब ने सांकेतिक तौर पर भी लोकहित में ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे इसको नैतिक सरोकारों से जोड़ा जा सके। क्लब ने स्वैच्छिक रूप से ऐसा करना मुनासिब नहीं समझा, क्योंकि इससे ‘खास’ और ‘आम’ के बीच का अंतर मिटने लगता है। लोकतंत्र को व्यक्तियों और संस्थाओं की नैतिक भागीदारी से स्थायित्व मिलता है। उसके अभाव में यह सिर्फ संरचनात्मक व्यवस्था बनकर रह जाती है।

क्लब को करोड़ों रुपए की वार्षिक आमदनी सदस्यों की विलासितापूर्ण गतिविधियों और सदस्यता शुल्क से होती है। पर इसी राजधानी में साढ़े सात सौ से अधिक झुग्गी-झोपड़ी इलाकों में रह रहे लगभग अस्सी लाख गरीब और मेहनतकश की जरूरतों पर क्लब का ध्यान तक नहीं गया। वे संविधान के प्रावधानों के तहत विलासिता के विशेषाधिकार को बनाए रखना चाहते हैं।

मगर इसी संविधान की प्रस्तावना में ‘समानता’ का भी उल्लेख है। यह बात और है कि दशकों से ढोल की तरह इसका उपयोग शोर मचाने के लिए होता रहा है। ‘समाजवादी प्रकार के समाज’, ‘गरीबी हटाओ’ और ‘लोकतांत्रिक समाजवाद’ के नारों के बीच विलासिता और धन के विषम वितरण की संस्कृति फलती-फूलती रही। आम लोग न्यूनतम संसाधनों के मोहताज बने रहे और विशिष्ट लोग विलासिता को बनाए रखने के लिए व्यवस्था का उपयोग करते रहे। नवउदारवाद की जमीन ऐसे ही क्लबों और भोगवाद की संस्कृति से बनती है। कुछ भोगते हैं, शेष भुगतते हैं।

वर्ष 1991 से 2014 के बीच देश के बड़े शहरों में अनौपचारिक बैठकों के सार्वजनिक स्थानों को समाप्त कर दिया गया। वे सूक्ष्म और अनौपचारिक क्लब के ही रूप थे। जमीन पर खुले आसमान के नीचे लोग मिलते-जुलते थे। वहां विद्यार्थी, नौजवान, कर्मचारी या फिर सामान्य लोग एकत्रित होकर अपनी समझ और जानकारियों का आदान-प्रदान करते थे। दिल्ली विश्वविद्यालय में ऐसे आधा दर्जन स्थान थे, तो कोलकाता में सैकड़ों की संख्या में। सभी व्यवसायीकरण की भेंट चढ़ गए। ऐसे अनौपचारिक सार्वजनिक स्थानों का लुप्त होना चेतना के प्रवाह में अवरोध पैदा करने जैसा है। अकेले व्यवसायीकरण को आधुनिकता मान लेना बड़ी भूल साबित होगी।

जिमखाना क्लब के बहाने समानता और गैर-कुलीनीकरण की प्रक्रिया पर बहस फलदायी सिद्ध होगी। विषमता से उत्पन्न सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को हमने कभी भूदान, तो कभी स्वयंसेवी संस्थाओं के परोपकारी कार्यों के हवाले छोड़ दिया। स्वतंत्र भारत में दो अवसरों पर खास और आम के अंतर पर राज्य ने अपनी स्थिरता की चिंता में कदम उठाया था।

पहला जमींदारी उन्मूलन था। यह कठिन और दुष्कर था। पर 1950 के दशक में यह संभव हो पाया। बिहार में इस पर पहला कानून बना था। इसके पक्ष में 1949 में विधानसभा में राज्य के राजस्व मंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय के भाषण में समानता के भाव को नई पीढ़ी में स्थापित करने के लिए पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहिए था, पर वह अभिलेखागार में कैद है।

दूसरा अवसर था प्रिवी पर्स समाप्त करने का। राजा-महाराजाओं को कई विशेषाधिकार प्राप्त थे। राज्यसभा में 1969 में इस पर बहस हुई और उसके बाद लगभग छह सौ राजा-महाराजाओं के विशेषाधिकार समाप्त किए गए।

स्वतंत्र भारत में भुखमरी, सम्मानपूर्वक जीवन जीने के साधनों से वंचित लोगों की बड़ी संख्या रही है। इसीलिए स्वतंत्रता के कई दशकों बाद दस करोड़ शौचालयों का निर्माण कराना पड़ा और भुखमरी की आशंका तथा संभावनाओं से निपटने के लिए इक्यासी करोड़ लोगों को सरकार निःशुल्क खाद्यान्न दे रही है।

विषमता और विलासिता, दोनों के पास अपने तर्क होते हैं। उसमें संवेदनशीलता और सरोकार दोनों का कोई स्थान नहीं होता है। यह स्वकेंद्रित होता है, समाज-केंद्रित नहीं बन पाता है। जिस देश में जनजातीय समाज, ग्रामीण और शहरी गरीब परिश्रम से अपना अस्तित्व बचाए हुए हों, उसमें सार्वजनिक संपत्तियों का उपयोग खास बने रहने के लिए हो, यह अनैतिक और असंवैधानिक दोनों है।

इसकी अनुभूति जिमखाना क्लब को जितनी जल्दी होगी, भारत की समृद्धि उतनी ही अधिक होगी। एक समृद्ध चेतना के लिए समृद्ध भवन और क्लब शायद आवश्यक नहीं होता है।

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जिमखाना क्लब को बंद करने की कोशिश ने एक ऐसा पिटारा खोल दिया है, जिसमें से निकल रहे हैं कई अहम सवाल। जिनको अभी तक इस विवाद के बारे में पूरी जानकारी नहीं है, उनके लिए संक्षेप में पहले बता दूं कि मुद्दा क्या है। नरेंद्र मोदी जब से प्रधानमंत्री बनकर लुटियंस दिल्ली में रहने लगे हैं, उन्होंने दिल लगाकर कोशिश की इस संभ्रांत रिहायशी इलाके की शक्ल बदलने की। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक