जिमखाना क्लब को बंद करने की कोशिश ने एक ऐसा पिटारा खोल दिया है, जिसमें से निकल रहे हैं कई अहम सवाल। जिनको अभी तक इस विवाद के बारे में पूरी जानकारी नहीं है, उनके लिए संक्षेप में पहले बता दूं कि मुद्दा क्या है। नरेंद्र मोदी जब से प्रधानमंत्री बनकर लुटियंस दिल्ली में रहने लगे हैं, उन्होंने दिल लगाकर कोशिश की इस संभ्रांत रिहायशी इलाके की शक्ल बदलने की।

इस प्रयास में उन्होंने नया संसद भवन बनाया है रायसीना पहाड़ी पर, और जो सरकारी दफ्तर बने थे अंग्रेजों के जमाने में, उनको खाली कर नए आधुनिक भवनों में भेज दिया है। इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन की ओर जो सड़क जाती है, उसका नाम राजपथ से बदलकर कर्तव्यपथ रखा है और अपने नए कार्यालय को ‘सेवा तीर्थ’ का नाम दिया है।

कुछ वर्ष पहले जब जिमखाना क्लब की कार्यसमिति में उन्होंने कुछ सरकारी अफसर नियुक्त किए थे, तो ऐसा लगा था इस क्लब के सदस्यों को कि यह पहला कदम है उस सरकारी जमीन को वापस लेने के लिए, जिस पर यह क्लब बना था 113 साल पहले। ऐसा ही हुआ पिछले सप्ताह, जब क्लब को सूचना भेजी गई कि जून के पहले सप्ताह तक क्लब सरकार को जमीन वापस करे, जिसके लिए सालाना सिर्फ हजार रुपए का किराया सरकार को मिलता रहा है।

क्लब ने इस सूचना को अदालत में चुनौती दी है और ऐसा हो सकता है कि उसको थोड़ी-बहुत मोहलत मिल जाए, लेकिन दिल्ली में अफवाहें अब यह भी उड़ रही हैं कि सरकार का इरादा है प्रधानमंत्री आवास के पास रेसकोर्स और पोलो ग्राउंड की जमीन भी वापस लेने का। यहां याद दिलाना चाहती हूं कि लुटियंस दिल्ली की सारी जमीन सरकारी है, जो लोगों को सौ साल या 99 साल की लीज पर दी गई है।

तो अगर इस एक क्लब की जमीन सरकार वापस लेने को तैयार है, इस आधार पर कि सार्वजनिक जमीन का निजी इस्तेमाल नहीं होना चाहिए, तो क्यों नहीं पूछते हैं हम कि इस आधार पर सरकारी अशोक होटल और सम्राट होटल भी बंद किए जाएं? ये भी तो प्रधानमंत्री के आवास के कुछ ज्यादा नजदीक हैं और उनकी ऊंची छतों से कोई प्रधानमंत्री के आवास पर हमला करना चाहे, तो जिमखाना क्लब से कहीं ज्यादा आसान है। प्रधानमंत्री आवास के पीछे कई कोठियां हैं, जिनमें मंत्री और सांसद रहते हैं और जिमखाना क्लब के सामने है इंदिरा गांधी का पुराना घर, जो उनके बेटे ने स्मारक बना दिया था और खुद उस घर में रहने लगे, जो आज प्रधानमंत्री आवास कहलाता है। देश के पहले प्रधानमंत्री रहा करते थे तीनमूर्ति भवन में, जिसको उनकी बेटी ने स्मारक बना दिया था अपने पिता की याद में।

सच तो यह है कि इस पहले घर को स्मारक न बनाया होता, तो प्रधानमंत्री का स्थायी और सुरक्षित आवास आज भी होता। स्मारक और समाधियां इतनी हैं दिल्ली में कि कई लोग दिल्ली को मुर्दों का शहर कहते हैं मजाक में, लेकिन जिस तरह सरकारी जमीन का फिजूल इस्तेमाल हो रहा है देश की राजधानी में, वह मजाक नहीं, गंभीर मसला है। मंत्रियों और सांसदों को हमने बसाया है ऐसी कोठियों में, जिनकी कीमत बाजार में कम से कम पांच सौ करोड़ रुपए है। ऊपर से यह भी ध्यान में रखिए कि राष्ट्रपति भवन के बाग-बगीचे 300 एकड़ जमीन पर हैं। क्या राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए 300 एकड़ जरूरी हैं?

सवाल और भी निकल रहे हैं उस पिटारे से। मंत्रियों को अगर इस देश की गरीब जनता के पैसों से बसाना ठीक समझती है भारत सरकार, तो क्यों नहीं इनको राष्ट्रपति भवन की 300 एकड़ जमीन पर कोठियां बनाकर बसाया जाए? रही बात सांसदों की, तो उनके लिए कई सरकारी होटल हैं संसद के आसपास, जिनमें इतने कम ग्राहक आते हैं कि आधे खाली रहते हैं साल भर। इनमें सांसदों के लिए जगह बन सकती है उन महीनों के लिए जब संसद का सत्र चल रहा होता है। उनको क्यों बड़ी-बड़ी कोठियों की जरूरत है?

अब बात करते हैं प्रधानमंत्री की सुरक्षा की। इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रधानमंत्री आवास स्थायी और सुरक्षित होना चाहिए। न कि ऐसा घर, जिसको जब किसी के मन में आए स्मारक बना दिया जाए। विनम्रता से प्रधानमंत्री को सुझाव देना चाहती हूं कि जब तक उनकी नई कोठी तैयार नहीं होती है इंडिया गेट के पास, वे क्यों नहीं तीनमूर्ति भवन में रहना शुरू करें, नेहरू स्मारक को कहीं और बनवाकर। तीनमूर्ति भवन शानदार भी है और सुरक्षित भी।

युद्ध के इस दौर में जब प्रधानमंत्री ने गरीबों को खर्चा कम करने के लिए कहा है, तो क्यों नहीं अपनी सरकार को ऐसा करने का आदेश देते हैं? जितनी फिजूलखर्ची हम करते हैं मंत्रियों के काफिलों और कोठियों पर, इसको बंद करना क्या ‘देशभक्ति’ नहीं होगी मुसीबत के इस दौर में? लुटियंस दिल्ली की जमीन भारत में सबसे महंगी मानी जाती है, तो क्यों नहीं इसका व्यावसायिक इस्तेमाल हो? इस तरह की शुरुआत अगर दिल्ली में होगी, तो राज्यों में भी होने लगेगी और खूब पैसा बचेगा देश का।

फिलहाल प्रधानमंत्री के कहने पर सिर्फ दिखावा कर रहे हैं उनके मुख्यमंत्री और मंत्री। कभी किसी मुख्यमंत्री की पत्नी साइकिल पर सवार होकर निकलती है टीवी पत्रकारों के सामने, तो कभी कोई मुख्यमंत्री स्कूटर पर सवार होकर निकलते हैं पत्रकारों को दिखाने के लिए। जब आर्थिक संकट पूरे देश में आया है, तो इस तरह के तमाशे बंद होने चाहिए और सरकारी अफसरों और राजनेताओं को दिल लगाकर देश का पैसा बचाने की कोशिश करनी चाहिए। यही होगी असली देशभक्ति। कहा था न मैंने कि जिमखाना क्लब बंद होने से खुल गया है सवालों का बहुत बड़ा पिटारा।

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राजधानी दिल्ली के जिमखाना क्लब का अभिप्राय क्या है? इस प्रश्न का जन्म उस विवाद के गर्भ से हुआ है, जो केंद्र सरकार द्वारा जमीन खाली करने के आदेश से उपजा है। इसका निर्माण 1913 में अंग्रेजों ने किया था। उपनिवेश के संसाधनों को लूटना और यहां के लोगों के श्रम और संसाधनों से अपनी विलासिता के लिए क्लबों और भवनों का निर्माण करना वे अपना नैसर्गिक अधिकार मानते थे। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक