एक कचौड़ी दो समोसा, ज्ञानेश कुमार पर नहीं भरोसा
चुनाव आयोग के तीनों सदस्यों के सामने बंगाल के उन 27 लाख मतदाताओं को यही नारा लगाने का मन कर रहा होगा, जिनके वोट काट दिए गए। दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं की नारेबाजी की तर्ज परविपक्ष को नारा लगाना चाहिए, ‘ज्ञानेश कुमार जिंदाबाद, उनकी कुर्सी रहे आबाद।’ सत्ता पक्ष के पक्षकार अभी तक जितनी गलतियां कर चुके हैं, उनमें से एक है कुमार के लिए भारत रत्न की मांग करना। असल में कुमार अनमोल रतन तो विपक्ष के लिए साबित हुए हैं। बीते दशक में विपक्ष को एक मंच पर लाना झरने के नीचे पोछा लगाना सरीखा था। वोट चोरी ऐसा मुद्दा बनी, जिसे लेकर आज सारा विपक्ष एकजुट है। विपक्ष की एकता बनी रहे, इसके लिए जरूरी है कि ज्ञानेश कुमार पदमुक्त न हों। कुमार का पद छूटा तो विपक्षी एकता का घड़ा फूटा। राजनीति में ऐसा मौका ऐतिहासिक है जब ज्ञानेश कुमार और सच के साथ खड़ा होना एक नहीं है। विपक्ष की ओर से ज्ञानेश कुमार के लिए भारत रत्नकी पुरजोर वकालत करता बेबाक बोल।

‘बहुत जहीन था, वो खेल जीत सकता था
मगर वो खेल का नक्शा बदल कर बैठ गया’

टीवी पत्रकारों की तरह इस बार हमें भी विपक्ष से एक बड़ी शिकायत है। हमारी भी शिकायत यही है कि विपक्ष ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और उन पर कार्रवाई के पीछे क्यों पड़ा है? विपक्ष से हमारा नम्र अनुरोध है कि वह भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त के लिए वही मांग करे जो डबल इंजन वाले मुख्यमंत्री कर चुके हैं। जो मांग जंतर मंतर पर पिछले दिनों गूंजी है। विपक्ष को सलाह है, मुख्य चुनाव आयुक्त को भारत रत्न देने की मांग पुरजोर तरीके से करे।

पिछले लंबे समय से विपक्ष आरोप लगा रहा था कि भारत में सभी संस्थाएं सत्ता के साथ अनुबंध कर रही हैं। संस्थाओं ने अपनी स्वायत्तता का प्रमाणपत्र सत्ता-पक्ष के ‘अमानत-घर’ में जमा कर दिया है। अभी तक यह सब आरोप था। लोकतंत्र में इस तरह के आरोप लगते रहते हैं। लेकिन ज्ञानेश कुमार के रूप में देश को पहली बार इस आरोप का पुख्ता सबूत मिला कि देश की संस्थाएं, सत्ता के साथ समझौता कर रही हैं।

आजादी के बाद से ही देश की कई संस्थाओं पर कई तरह के आरोप लगे। संस्थाओं पर लगे इन आरोपों पर सत्ता की वैसी ही चुप्पी हुआ करती थी, जैसे विपक्ष का कोई दल यह देख कर चुप्पी साध लेता है कि अन्य दल को महज इसलिए परेशान किया जा रहा है कि वह विपक्ष है। अखिलेश यादव पर कोई आरोप लगता है तो मायावती चुप रहती हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो कांग्रेस से लेकर वाम दलों ने आंखें फेर लीं। केरल में माकपा नेतृत्व पर आरोप लगे तो कांग्रेस का भाव था-हम आपके हैं कौन!

इस संदर्भ में तो आम आदमी पार्टी विडंबना का प्रतीक ही बन गई। आम आदमी पार्टी कहीं जीतती है तो उसे सत्ता-पक्ष की ‘ब’ पार्टी बता दिया जाता है। वहीं सत्ता-पक्ष ने आम आदमी पार्टी के पूरे नेतृत्व को ही जेल पहुंचा दिया। आम आदमी पार्टी के पक्ष में बोलना तो दूर विपक्ष ने अजीब सी चुप्पी साध रखी थी। राहुल गांधी से लेकर सोनिया गांधी की सरकारी एजंसियों के सामने पेशी हो रही थी तो अन्य विपक्षी दलों में सुई पटक सन्नाटा था। राजद और जद (एकी) एक-दूसरे की मुसीबत में ‘मैं न बोलूंगा’ वाला राग अलाप चुके हैं। ममता बनर्जी आज इंडिया गठबंधन में इसलिए बोल रही हैं क्योंकि फिलहाल उनकी पार्टी का निशान भी उनके पास नहीं है। नीतीश कुमार पर वैसी बहस चल रही है, जो बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री के कानों में भी नहीं पड़ रही है।

ज्ञानेश कुमार वो वाहिद कारण हैं जब विपक्ष एक मंच पर आया है। सभी विपक्षी दलों को अपने साझा दर्द का एक ही कारण समझ में आ रहा है-ज्ञानेश कुमार। यह एकता इसलिए नहीं बनी कि ज्ञानेश कुमार के कारण कोई सौहार्दपूर्ण माहौल बना। यह बिहार और बंगाल के मतदाताओं के दर्द की साझेदारी थी। इसके पीछे बंगाल के वे 27 लाख मतदाता हैं, जिनका वोट काट दिया गया। इसके पीछे दिल्ली का वह बेला एस्टेट है जहां पिछले चुनाव में 729 मतदाताओं के नाम दर्ज थे, लेकिन मसविदा सूची में इनमें से केवल एक व्यक्ति का नाम शामिल है। जिन लोगों ने 2025 में मतदान किया था, वे भी अब चुनाव आयोग के लिए भूत बन चुके हैं।

इसके पीछे अदालत की वे टिप्पणियां हैं जब कहा गया, एक चुनाव में वोट नहीं देंगे तो क्या हो जाएगा…उपचुनाव ही तो है…। इसके पीछे वे बीएलओ हैं जिन्होंने अति सख्ती और कम समयसीमा से मिले दबाव के कारण कथित रूप से जान दे दी और उनकी जान जाने के बाद एसआइआर की समयसीमा बढ़ा दी गई। भारत जैसे बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक और विशाल भौगोलिक स्थिति वाले देश में ज्ञानेश कुमार एक ऐसे नाम बन चुके हैं जो कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक की जनता के लिए प्रात: स्मरणीय हैं। जहां-जहां एसआइआर के लिए ज्ञानेश कुमार की अगुआई वालीटोली पहुंची वहां-वहां की जनता अपने अस्तित्व को लेकर कांप गई।

आज भारत में दो तरह के राजनीतिक दल हैं। जो सत्ता पक्ष के साथ हैं उन्हें किसी तरह की कोई शिकायत नहीं है। जो विपक्ष में हैं उनके लिए हर कदम मुश्किल है। विपक्षी दलों की मुश्किलों का विरोधाभास उन्हें एक होने भी नहीं दे रहा है। इसलिए विपक्ष को कोशिश करनी चाहिए कि ज्ञानेश कुमार कुर्सी पर बने रहें, ताकि उनकी एकता बनी रहे।

आगामी चुनावों का राजनीतिक माहौल और ज्यादा नाजुक होगा। समझौते के दाग वाले ज्ञानेश कुमार अब सत्ता-पक्ष के लिए बोझ बन चुके हैं। कुमार सत्ता-पक्ष के लिए मुलायम मक्खन नहीं रहे जो आराम से गले के नीचे उतर जाए। अब वे गले की हड्डी हैं, जिसे न तो उगलते बनता है और न निगलते। यह हड्डी इतनी बुरी तरह फंस गई है कि निगलेंगे तो सत्ता पक्ष गलत और उगलेंगे तो ज्ञानेश कुमार गलत। हर स्थिति में गलत साबित होने के संकट में भी सत्ता-पक्ष ने विपक्ष वाली रणनीति पर ध्यान नहीं दिया। रणनीति चुप्पी की। जब मायावती फंसें तो अखिलेश चुप और जब ममता बनर्जी फंसें तो कांग्रेस और वाम चुप।

सत्ता-पक्ष को इन आरोपों से चुप्पी ही बचा सकती थी। लेकिन जब साख की सफेदी का बुरा वक्त आता है तो उसके बगल से कोई गाड़ी कीचड़ उछालती हुई निकल जाती है। बाढ़ प्रभावित कीचड़ वाले इलाके में सत्ता का सलाहकार लाल कालीन बिछा जाता है ताकि आपके दागी कदमों के निशान जनता देख ले।

यह न्यायशास्त्र के लिए भी कालजयी मामला होगा, जहां आरोपी चोरी नहीं करने की दलील पर चुप है। लेकिन उसके पड़ोसी जाकर गवाही दे रहे हैंं कि महाशय कभी चोरी कर ही नहीं सकते हैं। सत्ता पक्ष के प्रवक्ता से लेकर टीवी पत्रकार कह रहे हैं कि चोरी नहीं हुई है, चोर तो बस सोशल मीडिया के लिए रील बनाने के लिए आया था ताकि जागरूकता फैला सके, चोरों से बचने के तरीकों पर।

यहीं पर शामत आती है ‘सच’ की। राजनीति में आरोपों से घिरने के बाद पक्ष-विपक्ष का पसंदीदा वाक्य है-सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं। सत्ता-पक्ष से लेकर टीवी चैनल पर बैठे उनके ‘प्रबक्ता’ बार-बार कह रहे हैं कि वे ज्ञानेश कुमार के नहीं, सच के साथ हैं। एसआइआर एक जरूरी प्रक्रिया है और हम इसके साथ हैं। जरूरी प्रक्रिया पर गैरजरूरी इरादों को वाजिब ठहराने के शोर में इस बार ‘सत्य’ वाकई परेशान हो चुका है और हाथ जोड़ कर स से सत्य और अ से असत्य के फर्क को समझने की विनती कर रहा है। इसलिए विपक्ष के पास सुनहरा मौका है कि वह सत्य के बचाव दस्ते के रूप में दिखे और कोशिश करे कि बतौर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार दिखते रहें।

हालात इस मोड़ पर आ चुके हैं कि सत्य और ज्ञानेश कुमार के बीच अक्षांश और देशांतर का फर्क दिख रहा है। दोनों के साथ खड़े होकर 36 का आंकड़ा ही बन सकता है। राजनीतिक इतिहास में ऐसा समय अपवाद स्वरूप ही आता है जब सत्य की पहचान दूर से की जा सकती है। यह ऐतिहासिक राजनीतिक मौका प्रदान करने के लिए विपक्ष को ज्ञानेश कुमार के लिए भारत रत्न देने की अखिल भारतीय मुहिम शुरू करनी ही चाहिए।

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अगर साहित्य का इतिहास वर्तमान के साथ सतत संवाद करता तो इस स्तंभ का शीर्षक होता, ‘आह अखलाक!’ अखालक याद है आप लोगों को…वो दादरी, वो बाबरी…पुरस्कार वापसी…। वो बहस इस स्तंभ का भी मील का पत्थर बनी थी। वह सितंबर 2015 था…संयोग, ग्यारह साल बाद भी सितंबरी सितम ही हुआ। तारीख का संयोग तारीखी हो जाता है। 28 सितंबर 2015 की रात उत्तर प्रदेश के दादरी के एक गांव में 52 साल के मोहम्मद अखलाक की भीड़ ने हत्या कर दी। इस ‘भीड़’ शब्द को याद रखिएगा। उससे पहले एमएम कलबुर्गी की हत्या हो चुकी थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक