देश में ऊर्जा के वैकल्पिक उपायों के रूप में हरित हाइड्रोजन को भी शामिल किया गया है। हाल में आयोजित ‘इंडिया एनर्जी वीक 2026’ के मंच पर सरकार की ओर से यह संकेत दिया गया कि हरित हाइड्रोजन की लागत अब चार डालर प्रति किलोग्राम से नीचे आ चुकी है, हालांकि दो डालर प्रति किलोग्राम का लक्ष्य अभी भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। ऐसे में अहम सवाल यह है कि क्या यह मौजूदा उत्साह जमीनी हकीकत में तब्दील हो पाएगा या फिर तय लक्ष्य कागजों पर ही रह जाएंगे? ऐसा इसलिए, क्योंकि इस बदलाव में उत्साह और संकोच दोनों साथ-साथ चल रहे हैं।
भारत की ऊर्जा व्यवस्था अभी भी काफी हद तक जीवाश्म ईंधन पर टिकी हुई है। देश अपनी तेल जरूरतों का 85-88 फीसद आयात करता है। रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर मध्य-पूर्व और पश्चिमी यूरोप के तनावों तक, वैश्विक हालात लगातार अस्थिर बने हुए हैं। यह स्थिति हमें ऊर्जा सुरक्षा के सवाल पर ला खड़ा करती है। विदेशी मुद्रा पर जब दबाव बढ़ता है, तो अर्थव्यवस्था भी इससे अछूती नहीं रहती। ऐसे में हरित हाइड्रोजन को ऊर्जा के क्षेत्र में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जाना स्वाभाविक है।
राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन-2023 इस दिशा में एक बड़ा कदम है। मगर ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक जितनी सरल दिखती है, उसे पूरी तरह जमीन पर उतारना उतना ही कठिन है। वर्ष 2030 तक पांच मिलियन टन उत्पादन का लक्ष्य, 19,744 करोड़ रुपए का निवेश और 125 गीगावाट अतिरिक्त नवीकरणीय क्षमता- ये लक्ष्य इस बात के संकेत हैं कि सरकार इस क्षेत्र को लेकर गंभीर है। फरवरी, 2026 तक 18-19 कंपनियों को हरित हाइड्रोजन का करीब 8.62 लाख टन सालाना उत्पादन क्षमता का आबंटन किया जा चुका है। कांडला, तूतीकोरिन और परादीप जैसे बंदरगाहों को हाइड्रोजन हब के रूप में विकसित किया जा रहा है। कागजों पर यह पूरी योजना मजबूत और सोच-समझकर बनाई गई लगती है। मगर ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि लक्ष्य तय करना आसान है, पर उन्हें टिकाए रखना ही असली चुनौती है।
इस मिशन में लागत का सवाल अभी भी सबसे अहम है। आखिर हरित हाइड्रोजन कितने समय तक महंगी रहेगी। उद्योग जगत इसे अपनाने में पूरे उत्साह से आगे नहीं बढ़ पा रहा है। स्पष्ट है कि जब तक लागत भरोसे के साथ नीचे नहीं आती, तब तक बड़े स्तर पर निवेश आसान नहीं होगा। सीधे शब्दों में कहें तो फिलहाल हरित हाइड्रोजन को अपनाना पर्यावरण की चिंता से जुड़ा फैसला है, न कि आर्थिक मजबूरी।
बुनियादी ढांचे की कमी इस चुनौती को और बढ़ा देती है। हाइड्रोजन को सुरक्षित तरीके से जमा करना और एक जगह से दूसरी जगह ले जाना आसान नहीं है। इसके लिए खास पाइपलाइन, टैंक और सुरक्षा इंतजाम चाहिए। हाल में भारत और ब्रिटेन के बीच ऊर्जा सहयोग को लेकर बातचीत जरूर हुई है, लेकिन जमीन पर इसका ढांचा बनने में समय लगेगा। यहां संसाधनों के सवाल पर भी ध्यान देना जरूरी है। एक किलोग्राम हरित हाइड्रोजन बनाने के लिए करीब नौ लीटर पानी चाहिए। ऐसे में राजस्थान के पश्चिमी हिस्सों, महाराष्ट्र के मराठवाड़ा या दक्षिण भारत के सूखा-प्रभावित इलाकों में बड़े संयंत्र लगाना आसान नहीं होगा।
इसी तरह, बड़ी सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण को लेकर गुजरात के कच्छ, राजस्थान के जैसलमेर-बाड़मेर और कर्नाटक के कुछ इलाकों में किसानों तथा चरवाहा समुदायों के बीच चिंता एवं विरोध भी देखा गया है।
इस सबके बीच असली सवाल सोच का है। अभी हरित हाइड्रोजन की ज्यादातर योजनाएं बड़े उद्योगों के इर्द-गिर्द केंद्रित हैं। यह ऊपर से नीचे की ओर जाने वाला माडल है, जिसमें बड़े निवेश और वैश्विक बाजार पर ध्यान है। इन क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल जरूरी है, लेकिन क्या ऊर्जा बदलाव का मकसद सिर्फ इतना ही है?
दरअसल, यहां ऊर्जा नीति निर्माण और ऊर्जा से चलने वाली जिंदगी के बीच की खाई साफ दिखाई देती है। ऊपर की दुनिया में लक्ष्य, निवेश और निर्यात की बातें हैं, जबकि नीचे की दुनिया में रोजमर्रा की जरूरतें, अनिश्चित आपूर्ति और सीमित साधन। जब तक यह अंतर बना रहेगा, कोई भी बड़ा ऊर्जा बदलाव अधूरा ही रहेगा। यही वजह है कि ऊर्जा के सवाल को केवल उत्पादन और आपूर्ति के ढांचे में नहीं, बल्कि उसके सामाजिक असर के साथ जोड़कर देखना होगा।
अगर कोई तकनीक केवल बड़े उद्योगों या शहरी केंद्रों तक सीमित रह जाती है, तो उसका असर भी सीमित हो जाता है। भारत जैसे देश में जहां ऊर्जा की असमानता पहले से मौजूद है, वहां जोखिम और गहरा हो जाता है। इसलिए हरित हाइड्रोजन की चर्चा केवल उत्पादन के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि यह भी देखना होगा कि यह किसके जीवन में बदलाव ला रही है और कौन इसके दायरे से बाहर है।
यह सवाल भी महत्त्वपूर्ण है कि क्या हम दुनिया के ऊर्जा बाजार में अपनी जगह बनाने की जल्दी में हैं, या अपने देश के भीतर की ऊर्जा असमानताओं को दूर करने के लिए भी उतने ही गंभीर हैं? भारत में ऊर्जा केवल उत्पादन का मामला नहीं, बल्कि यह भी है कि किसे कितनी और कैसी ऊर्जा मिलती है- इसी से तय होता है कि विकास किसके हिस्से आता है और किसके नहीं।
भारत की असली ऊर्जा जरूरतें जमीनी स्तर पर हैं। गांवों में बिजली की किल्लत, किसानों की सिंचाई, लघु उद्योग और शहरों में गरीब तबके की रोजमर्रा की खपत- यहीं ऊर्जा की जरूरत के महत्त्व का पता चलता है। अगर हरित हाइड्रोजन इन जरूरतों से जुड़ती है, तो यह वास्तविक बदलाव की दिशा तय कर सकती है और अगर नहीं, तो यह सिर्फ एक नीतिगत उपलब्धि बनकर रह जाएगी।
अगर हरित हाइड्रोजन बड़े उद्योगों तक ही सीमित रही, तो यह दिखने में अच्छी, लेकिन अधूरी पहल बनकर रह जाएगी। यदि इसे छोटे स्तर पर स्थानीय जरूरतों के हिसाब से विकसित किया जाए, तो यह लोगों के जीवन में असली बदलाव ला सकती है। ऐसे माडल ऊर्जा को केवल आपूर्ति नहीं, बल्कि सशक्तीकरण का साधन भी बना सकते हैं।
हाल में बायोमास आधारित छोटे प्रयोग और ‘आफ-ग्रिड’ उपयोग की कोशिशें शुरू हुई हैं। अभी ये प्रयास छोटे हैं, लेकिन आगे का रास्ता दिखाते हैं। हरित हाइड्रोजन का विकल्प भारत के लिए एक बड़ा मौका भी है। इससे देश वैश्विक हरित ऊर्जा बाजार में अपनी जगह बना सकता है, रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं और वर्ष 2070 के शून्य कार्बन लक्ष्य की दिशा में मदद मिल सकती है।
मगर सच यही है कि इसे आम और सुलभ ऊर्जा विकल्प बनने में अभी दस से पंद्रह साल का वक्त लग सकता है। इस दौरान लागत घटानी होगी, तकनीक को बेहतर बनाना होगा और जरूरी ढांचा तैयार करना होगा। अब सवाल यह नहीं है कि हरित हाइड्रोजन संभव है या नहीं, बल्कि यह है कि हम उसे किस दिशा में ले जाते हैं। वही दिशा तय करेगी कि यह भारत की ऊर्जा जरूरतों का अहम अध्याय बनेगी, या फिर एक अधूरी संभावना बनकर रह जाएगी।
