वर्तमान में दुनिया एक बड़े ऊर्जा बदलाव के दौर से गुजर रही है। जलवायु परिवर्तन की चुनौती, बढ़ता प्रदूषण और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पुराने रास्ते अब टिकाऊ नहीं रहे। मगर इस पूरी बहस के बीच एक बुनियादी सवाल अक्सर छूट जाता है- क्या हरित भविष्य सचमुच सबके लिए होगा, या फिर यह भी उस विकास की तरह होगा, जो कुछ लोगों तक सीमित रह जाता है?
ऊर्जा संक्रमण को आमतौर पर तकनीकी बदलाव के रूप में देखा जाता है। जैसे- कोयले और तेल से हटकर सौर, पवन, बैटरी और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ना। मगर असल में यह केवल तकनीक का सवाल नहीं है, यह समाज, अर्थव्यवस्था और बराबरी का भी प्रश्न है। ऊर्जा का अर्थ केवल बिजली या ईंधन की उपलब्धता नहीं है, बल्कि इससे तय होता है कि जीवन कितना आसान होगा, अवसर किसे मिलेंगे और विकास से कौन लाभान्वित होगा। भारत के परिप्रेक्ष्य में यह सवाल और जटिल हो जाता है। एक तरफ तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, उद्योगों और शहरों में ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है। दूसरी तरफ ऐसे करोड़ों लोग हैं, जिनके लिए ऊर्जा आज भी अनिश्चित और महंगी है।
इसमें दोराय नहीं कि भारत ने ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। करोड़ों घरों तक बिजली पहुंची है और प्रति व्यक्ति वार्षिक बिजली खपत औसतन 1,400-1,500 यूनिट के आसपास हो गई है। मगर इस प्रगति के बावजूद उपयोग और पहुंच के बीच का अंतर आज भी बना हुआ है। यही अंतर भेदभाव की असली परिभाषा तय करता है। शहरों में जहां बिजली की घरेलू खपत कई सौ यूनिट तक पहुंच चुकी है, वहीं ग्रामीण इलाकों में स्थिति अब भी दयनीय है। इस बात को समझना होगा कि बिजली का कनेक्शन होना और निर्बाध आपूर्ति, दो अलग-अलग पहलू हैं। घरों में सिर्फ मीटर लगा देना को बिजली आपूर्ति से जोड़ देने के रूप में नहीं देखा जा सकता, निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना भी जरूरी है। यानी ऊर्जा की उपलब्धता और उसकी गुणवत्ता का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। कई ग्रामीण और छोटे कस्बों में बिजली का कनेक्शन तो है, लेकिन आपूर्ति की निरंतरता, असमय कटौती और वोल्टेज की स्थिरता चुनौती बनी हुई है।
आने वाले वर्षों में देश में बिजली की मांग तेजी से बढ़ने वाली है। इस मांग का बड़ा हिस्सा उद्योगों, डेटा केंद्रों, वातानुकूलन और शहरी खपत से आएगा। अगर यही प्रवृत्ति जारी रही, तो ऊर्जा परिवर्तन उपभोक्ताओं की गैर-बराबरी को कम करने के बजाय और गहरा करेगा। अगर ऊर्जा का वितरण बाजार के तर्क पर ही चलता रहा, तो स्वाभाविक है कि वह उन्हीं तक पहले पहुंचेगी, जो अधिक भुगतान कर सकते हैं। ऐसे में ऊर्जा एक बुनियादी सेवा से धीरे-धीरे ‘उच्च स्तरीय सुविधा’ में बदल सकती है, जो सबके लिए समान रूप से उपलब्ध नहीं होगी।
सौर ऊर्जा के तेज विस्तार का लाभ भी मुख्यत: उन्हीं वर्गों तक पहुंचा है, जिनके पास निवेश करने की क्षमता है। बड़े शहरों में छत पर सौर ऊर्जा उपकरण लगाने वाले उपभोक्ताओं की संख्या तेजी से बढ़ी है, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा नाममात्र है। जिनके पास छत, पूंजी और तकनीकी जानकारी है, वे इससे सीधे लाभ उठा रहे हैं। इसके विपरीत जिनके पास ये साधन नहीं हैं, वे इस बदलाव के दायरे से बाहर हैं।
विद्युत चालित वाहनों का विस्तार भी इसी तर्ज पर हो रहा है। यह बदलाव अभी उन वर्गों में ठहरा हुआ है, जो नई तकनीक अपनाने की लागत वहन करने में सक्षम हैं। इससे साफ संकेत मिलते हैं कि स्वच्छ ऊर्जा का लाभ समान रूप से नहीं बंट रहा। ग्रीन या हरित हाइड्रोजन जैसी उभरती तकनीक इस प्रवृत्ति को और स्पष्ट करती है। इसे भविष्य का ईंधन कहा जा रहा है, लेकिन इसका उपयोग मुख्य रूप से बड़े औद्योगिक क्षेत्रों में होता है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या नई ऊर्जा तकनीक समाज के व्यापक हिस्से तक पहुंचेगी या केवल उत्पादन और निर्यात के ढांचे तक सीमित रह जाएगी।
इतिहास बताता है कि तकनीकी प्रगति अपने आप समानता नहीं लाती। औद्योगिक और डिजिटल क्रांति में भी यही हुआ- पहले लाभ उन्हीं को मिला, जिनके पास संसाधन थे। बाकी समाज को उस लाभ तक पहुंचने में लंबा समय लगा। स्पष्ट है कि ऊर्जा में परिवर्तन को केवल उत्पादन बढ़ाने की नजर से नहीं देखा जा सकता, बल्कि सवाल वितरण के स्वरूप का भी है। अगर नई ऊर्जा का बड़ा हिस्सा उन्हीं क्षेत्रों में केंद्रित रहता है, जहां पहले से विकल्प मौजूद हैं, तो असमानता ही नहीं बढ़ेगी, बल्कि कमजोर और कम पहुंच वाले क्षेत्रों का आर्थिक एवं सामाजिक सशक्तीकरण भी पीछे छूट जाएगा।
ऊर्जा परिवर्तन को समावेशी बनाने के लिए केवल बड़ी परियोजनाएं पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए विकेंद्रीकृत ऊर्जा प्रणालियों की जरूरत है। मसलन- छोटे सौर ऊर्जा संयंत्र, माइक्रो-ग्रिड और सामुदायिक ऊर्जा मॉडल तैयार किए जाने चाहिए, जो ऊर्जा को सीधे उन क्षेत्रों तक पहुंचा सकते हैं, जहां इसकी सबसे अधिक जरूरत है। ये मॉडल ऊर्जा को केवल उपभोग का साधन नहीं, बल्कि स्थानीय विकास का आधार बना सकते हैं।
वित्तीय ढांचे को भी इसी दृष्टि से देखना होगा। अभी तक प्रोत्साहन और निवेश का बड़ा हिस्सा उन क्षेत्रों में जाता है, जहां वापसी की संभावना अधिक है। मगर समान वितरण के लिए वहां निवेश करना होगा, जहां जरूरत अधिक है, भले ही उसमें तुरंत आर्थिक लाभ दिखाई न दे। हरित ऊर्जा के लिए जमीन, पानी और खनिजों की आवश्यकता होती है। अगर इनका उपयोग स्थानीय समुदायों के हितों की कीमत पर होता है, तो यह एक नए प्रकार का असंतुलन पैदा करेगा। इसलिए विकास और पर्यावरण के साथ-साथ सामाजिक संतुलन भी जरूरी है।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि देश में अक्षय ऊर्जा की बढ़ी क्षमता का लाभ सभी क्षेत्रों तक समान रूप से नहीं पहुंचा है। राज्यों के बीच ऊर्जा उपयोग का अंतर इस बात को और स्पष्ट करता है। उदाहरण के तौर पर गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों में प्रति व्यक्ति बिजली खपत 2000 यूनिट से अधिक है, जबकि बिहार में यह लगभग 300 यूनिट और उत्तर प्रदेश में 700 यूनिट के आसपास है। यह अंतर केवल आर्थिक नहीं, बल्कि बुनियादी ढांचे, औद्योगिक विकास और नीतिगत प्राथमिकताओं का भी है। कहीं ऊर्जा विकास का आधार बन रही है, तो कहीं बुनियादी जरूरत के स्तर पर ही सिमटी हुई है। भारत के पास यह अवसर है कि वह ऊर्जा परिवर्तन को एक व्यापक सामाजिक बदलाव का रूप दे सके।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत हरित ऊर्जा की दिशा में कितनी तेजी से बढ़ रहा है, बल्कि यह है कि बदलाव किसके पक्ष में जा रहा है। अगर नीतियां केवल निवेश, निर्यात और बड़े उपभोक्ताओं के इर्द-गिर्द घूमती रहीं, तो हरित ऊर्जा भी सामाजिक स्तर पर खाई को गहरा करेगी। और यदि प्राथमिकता उन लोगों को दी गई, जिनके लिए ऊर्जा आज भी एक बुनियादी जरूरत है, तो यही बदलाव सामाजिक संतुलन का आधार बन सकता है। ऊर्जा का भविष्य केवल हरित होने से तय नहीं होगा, बल्कि इससे निर्धारित होगा कि वह कितना न्यायपूर्ण और समावेशी है। अगर ऊर्जा परिवर्तन सबको साथ लेकर नहीं चला, तो यह न तो टिकाऊ होगा और न ही समान विकास का वाहक बन पाएगा।
