‘बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं है इंसां होना

यूं तो गालिब के इस शेर में प्रत्यक्ष रूप से शिक्षा का शब्द नहीं है, लेकिन मनुष्य बनने की जो मुश्किल वह बयान करते हैं, उसके केंद्र में शिक्षा भी है। अभी तक विश्वविद्यालयों को विद्यार्थी राजनीति की पौधशाला माना जाता रहा है। इसलिए सरकारों ने विश्वविद्यालयों का माहौल ऐसा बनाने की कोशिश की जहां राजनीतिक चेतना पैदा नहीं हो सके। इतिहास गवाह है कि अगर आप बाएं से चेतना को खत्म कर रहे हैं तो वह दाएं से उग आएगी। विश्वविद्यालयों में प्रतिरोध की आवाज खत्म कर रही सरकारों के सामने स्कूल आ गए हैं। स्कूली बच्चे कह रहे हैं कि हमारे सरकारी स्कूल वापस कीजिए। स्कूलों को बेहतर बनाइए। बच्चे उस सत्ता से जवाब मांग रहे हैं, जो उनसे हर साल प्रतियोगिता, अनुशासन और मेहनत की मांग करती है, लेकिन बदले में उन्हें एक भरोसेमंद व्यवस्था तक नहीं दे पाती। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की मांग करती जनता पर बेबाक बोल।

‘मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए’

इन दिनों हर प्रदर्शन में मंजर भोपाली का गूंजता यह गीत बदलते ‘मंजर’ का गवाह बन रहा है। ‘टीना’ (कोई विकल्प नहीं) के आगे इतने इना, मीना, डीका आ गए हैं कि जनतंत्र की धुन में विपक्ष के ‘रम पम पोश’ के लिए जगह बन गई है। ‘काजपा’ सरकारी नारे को चुरा कर कह रहे हैं- स्कूल चलें हम। सरकार अपने स्कूलों को प्रदर्शनकारियों की नजरों में आने से बचाने के लिए नियमों-कानूनों के जरिए वैसे ही ढक रही है, जैसे दिल्ली में जी-20 शिखर सम्मेलन के पहले झुग्गी बस्तियों को ढका गया था।

जयपुर में स्कूलों का निरीक्षण करने गए काजपा के कार्यकर्ताओं पर हमले कर भगा दिया गया तो सूबे के शिक्षा मंत्री ने स्कूल की सुरक्षा करने वाले ग्रामीणों को बधाई दी। मंत्री जी की उस जनता के बारे में हम नहीं जानते जो स्कूलों की हकीकत छुपाना चाहती है। लेकिन देश में जनता का एक ऐसा बड़ा वर्ग उठ खड़ा हुआ है जिसके लिए स्कूल अब बुनियादी मुद्दा बन गया है। स्कूली बच्चे अपने शिक्षा-संसाधनों की तबाही का हिसाब मांग रहे हैं।

बात करते हैं पटना में दिखे मंजर की। कथित तौर पर छह साल का आदित्य कुमार कई कैमरों और अपने मुंह में ठुंसते से माइकों के बीच बोल रहा है, ‘हमको जवाब चाहिए कि ये आदेश किसने दिया था। आंदोलन हो रहा था छात्र का तो माथा फट गया था। क्या सातवीं फेल मुख्यमंत्री से बच्चा-वच्चा भी नहीं संभलता? तो इस्तीफा दे दीजिए न… आज हम पूछना चाहते हैं एसपी साहब से कि ये आदेश किसने दिया था। एसपी साहब ने सीधा अपनी पुलिस से मुझको पकड़वा दिया।’

पटना में बीपीएससी अभ्यर्थियों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस आदित्य कुमार को ले जाती हुई दिखी। विद्यार्थी शिक्षक भर्ती परीक्षा और अन्य मांगों को लेकर विरोध कर रहे थे। आदित्य भी अपने मां-बाप के साथ इस प्रदर्शन में था। आदित्य से पत्रकारों ने कहा कि तुम्हें तो स्कूल जाना चाहिए, प्रदर्शन क्यों कर रहे हो? उसने कहा- अभी मैं बच्चा हूं। बड़ा होकर भ्रष्टाचारी सब हमारा भी पेपर लीक कर देगा। यह सब उस बिहार में हुआ है जहां कुछ समय पहले बहुमत से राजग की सरकार चुनी गई। लेकिन चुनाव के बाद भी सत्ता की भूख खत्म नहीं हुई और पहली प्राथमिकता बिहार की सत्ता में भाजपा का वनवास तोड़ना था। इतिहास रचते हुए बिहार में भाजपा की सरकार बन भी गई।

बिहार विधानसभा चुनाव में कई तरह के आदर्श को त्याग कर महिलाओं के खाते में दस हजार रुपए डाले गए। ऐन चुनाव के वक्त भी धन का प्रलोभन दिया गया। टीवी एंकरों ने एलान कर दिया कि भाजपा को हराना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। सत्ता पक्ष जिस तरह से महिलाओं के खाते में रेवड़ियां डाल रहा है, लगने लगा कि भारतीय राजनीति की तस्वीर में विकल्प दूर की चिड़िया हो गई है। सांप्रदायिकता, हिंदुत्व, जातिवाद और आरक्षण पर ही भारतीय राजनीति आगे बढ़नी है।

सत्ता पक्ष के इस ‘भौकाल’ के आगे सबसे पहले काजपा आकर खड़े हो गए। वैसे काजपा, जिनका भारतीय राजनीति में कोई अस्तित्व नहीं है और इनकी पार्टी के साथ व्यंग्यात्मक शब्द जोड़ा गया। लेकिन पर्चा लीक से शुरू हुआ यह व्यंग्य सत्ता के लिए जल्दी ही गंभीर मसला हो गया। जंतर मंतर पर हिंदू-मुसलमान, जॉर्ज सोरोस और देशद्रोही वाले जुमले हीन भावना से ग्रसित हो गए कि कोई इन्हें तवज्जो नहीं दे रहा। सबको स्कूल और शिक्षा पर बात करनी है। जो माता-पिता अभी तक हिंदू-मुसलमान, मंदिर-मस्जिद पर अटके हैं, वे घर में भी सवाल कर रहे हैं कि मेरे बच्चे का स्कूल भैंस के तबेले जैसी जगह में क्यों चल रहा है? स्कूल में शिक्षक क्यों नहीं हैं? स्कूल जाने के लिए सड़क क्यों नहीं है? लगातार स्कूलों को बंद क्यों किया जा रहा है?

ये सवाल उन महिलाओं के सामने भी हैं जिन्हें राजनीतिक विश्लेषकों ने सत्ता की सबसे बड़ी लाभार्थी घोषित कर दिया। उनके खाते में जा रहे पैसों को देख कर अनुमान लगा लिया गया कि सत्ता सुरक्षित है। लेकिन ये महिलाएं किसी मंगल ग्रह से वोट देने के लिए नहीं उतरी हैं। इनमें से किसी का पति बेरोजगार है तो किसी का बेटा और किसी का बच्चा ऐसे स्कूल में जा रहा है जहां भैंस भी बैठना पसंद नहीं करे। इन्हें खुद के लिए भी अच्छे कॉलेज और रोजगार चाहिए। इन्हें भी लग रहा है कि सत्ता ने अम्मा, बहन, लाडकी, महतारी का रिश्ता जोड़ कर इनका नागरिक बोध छीन लिया है। ‘दस हजारी मतदाता’ का तमगा हटा कर ये भी नागरिकों की तरह शिक्षा व्यवस्था की बदहाली पर सवाल उठा रही हैं।

नब्बे के दशक के बाद जब देश को संसाधनों के संदर्भ में आगे की ओर ले जाना था, राजनीति ने कई विभाजनकारी पेच-ओ-खम खोज लिए। जनता ने मांगा स्कूल तो कहा गया वो देखो मंडल, जनता ने मांगा रोजगार तो कहा गया वो देखो कमंडल। इसके बाद सभी राजनीतिक दलों ने एक हाथ में मंडल तो दूसरे हाथ में कमंडल थाम लिया। सरकारी नौकरियों का रास्ता बंद कर चुनाव दर चुनाव जनता को आरक्षण की सड़क पर चलने को कहा गया। एक ने आरक्षण को कारण बताया तो दूसरे ने समाधान। इस आरक्षण की सड़क पर चल रही जनता के लिए कहीं पर भी मील का वह पत्थर नहीं था, जिस पर रोजगार लिखा हुआ हो। हर मोड़ पर यह जरूर लिखा था कि आपका धर्म खतरे में है। आप फलां जाति के हैं तो गर्व कीजिए।

नई आर्थिक नीति विकास का वह राजमार्ग थी जहां आम जनता के हितों के लिए कोई सहायक गली नहीं थी। इस राजमार्ग पर घनघोर निजीकरण के भारी वाहनों ने सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को कुचल डाला। साढ़े तीन दशक बाद भी राजनीति इस सड़क पर धर्म, जाति और आरक्षण के तिहरे इंजन से काम चला लेना चाहती है। लेकिन जनता को अहसास हो चुका है कि उसके बच्चों के लिए सरकारी स्कूल कितने जरूरी हैं। परीक्षा में भ्रष्टाचार उनके बच्चों की हत्या कर रहा है।

बच्चों की प्रारंभिक भाषा उनका परिवार ही गढ़ता है। एक समय परिवार ने धर्म, जाति को ही अपना अस्तित्व मान लिया और उसी की चर्चा करता था। अब अगर सड़क पर बच्चों की भाषा बदली है तो यह समझ लीजिए कि आम घरों में परिवार की भाषा बदल रही है। मां-बाप, दादा-दादी ढहती शिक्षा व्यवस्था पर चिंता जता रहे हैं। पेपर लीक से परेशान भइया और दीदी को देख कर बच्चों को अपने भविष्य की चिंता हो रही है। बच्चे जंतर मंतर पर जा रहे हैं, डाक बंगला चौराहे पर जा रहे हैं। कैमरा, माइक पर सरकार से सवाल करते बच्चे बता रहे हैं कि अब स्कूल और शिक्षा मुख्य मुद्दा बन चुके हैं। बच्चे मुख्यमंत्री की शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष ‘छात्रों की गूंज’ सुन चुका है। जंतर मंतर से उठी यह गूंज देश के कोने-कोने तक फैली हुई है। वैसे भी राजा के लिए बच्चे हमेशा खतरे की घंटी रहे हैं। वे बेखौफ होकर सच्चाई कह देते हैं। किसने सोचा था कि इतनी जल्दी धर्म और जाति से निकल कर जनता स्कूल मांगने लगेगी। जनता ने सत्ता का दाखिला स्कूल में करवा दिया है। देखते हैं वह अब स्कूली परीक्षा में कैसे पास होती है।