विज्ञान अब हमारे घर की दहलीज को पार कर हमारी रसोई तक पहुंच गया है। क्या हमने कभी अपनी थाली में रखी रोटी या सब्जी को देख कर यह सोचा है कि उसका ‘डीएनए’ क्या है? निश्चित रूप से इस पर किसी ने नहीं सोचा होगा। आनुवांशिक रूप से परिवर्तित (जीएम) फसलों का मुद्दा अब महज प्रयोगशालाओं का विमर्श नहीं रहा, बल्कि यह हमारी थाली की सुरक्षा और देश के कानून के लिए एक द्वंद्व बन गया है। एक तरफ भूख मिटाने के लिए विज्ञान वरदान की तरह है, तो दूसरी तरफ स्वास्थ्य और पर्यावरण के अनसुलझे जोखिम। यह विषय केवल कृषि का नहीं, बल्कि नीति-निर्माण और भविष्य की सुरक्षा का भी है।
जीएम फसलों का अर्थ समझना सरल है, मगर इसका निहितार्थ अत्यंत जटिल। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। जैसे हम ‘फोटो एडिटिंग ऐप’ से किसी तस्वीर में ‘फिल्टर’ लगाते हैं, वैसे ही वैज्ञानिक किसी फसल के बीज में कोई दूसरा ‘वांछित जीन’ डाल देते हैं, ताकि वह अधिक पैदावार दे सके, सूखे को झेल सके या कीटों से लड़ सके। विज्ञान की भाषा में इसे ‘ट्रांसजेनिक’ कहते हैं, लेकिन आम आदमी के लिए यह अपनी थाली में किसी ‘अपरिचित’ मेहमान के आने जैसा है। हम नहीं जानते कि यह मेहमान हमारा मित्र है या शत्रु?
जब हम एक पौधे के प्राकृतिक गुणों के साथ छेड़छाड़ करते हैं, तो केवल एक जीन नहीं बदलते, बल्कि उस पूरी खाद्य शृंखला को प्रभावित करते हैं, जिसका हिस्सा वह पौधा है। जैव-प्रौद्योगिकी समर्थकों का तर्क है कि बढ़ती आबादी के लिए यह अनिवार्य है, जबकि आलोचकों का मानना है कि ‘प्राकृतिक क्रम’ में हस्तक्षेप के परिणाम नकारात्मक एवं दीर्घकालिक हो सकते हैं।
भारत में जीएम फसलों की कानूनी स्थिति बेहद सतर्क रही है। हमारे यहां विनियमन का ढांचा मुख्य रूप से ‘पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986’ के तहत गठित ‘जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति’ के कंधे पर है। यह समिति तय करती है कि कौन-सी फसल देश में उगाई जा सकती है और उसके परीक्षण के मानक क्या होंगे।
भारत में अभी तक केवल ‘बीटी कपास (Bt Cotton)’ को व्यावसायिक खेती की अनुमति मिली है, जो एक गैर-खाद्य फसल है। खाद्य फसलों के मामले में, जैसे कि जीएम सरसों का मामला लंबे समय से विवादों में रहा है। यह दर्शाता है कि नियामक संस्थाओं और जनहित के बीच एक गहरी खाई है। तकनीकी मंजूरी मिल जाना एक बात है, लेकिन सामाजिक स्वीकृति और कानूनी वैधता प्राप्त करना दूसरी बड़ी बात है।
कानूनी परिप्रेक्ष्य में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका निर्णायक रही है। अरुणा रोड्रिग्स बनाम भारत संघ (2005) का मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि जीएम फसलों के परीक्षण में जैव-सुरक्षा का ध्यान नहीं रखा गया है। अदालत ने बार-बार ‘एहतियाती सिद्धांत’ को रेखांकित किया है। इसका अर्थ यह है कि यदि किसी तकनीक से पर्यावरण या सेहत को नुकसान होने की थोड़ी भी संभावना हो, तो उसे लागू करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। यह सिद्धांत ही हमारी थाली की सुरक्षा का सबसे बड़ा कानूनी कवच है।
इसी तरह, आर्यावर्त बनाम भारत संघ (2023) जैसे मामलों में अदालतों ने जोर दिया है कि जैव-सुरक्षा से समझौता करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त ‘जीवन के अधिकार’ और ‘स्वस्थ भोजन के अधिकार’ का उल्लंघन हो सकता है। अदालतें यहां केवल कानून की व्याख्या नहीं कर रही हैं, बल्कि वे एक ‘अभिभावक’ की भूमिका निभा रही हैं, जो विज्ञान की चकाचौंध में जन-स्वास्थ्य को ओझल नहीं होने देना चाहतीं।
दुनिया भर में जीएम फसलों को लेकर तस्वीर अलग है। अमेरिका में जीएम सोयाबीन और मक्का बड़े पैमाने पर खाया जाता है। वहां की सरकार और कंपनियां इसे ‘नवाचार’ मानती हैं और इसे अर्थव्यवस्था का आधार बताती हैं। वहीं, यूरोपीय संघ ने अत्यंत कड़े नियम अपनाए हैं। वहां उत्पादों पर ‘अनिवार्य लेबलिंग’ का पालन होता है, ताकि उपभोक्ता को पता हो कि वह ‘प्राकृतिक’ खा रहा है या ‘जीएम’। यह बताता है कि यह केवल भारत का डर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया इस तकनीक को ‘परखने’ के दौर में है।
यह वैश्विक मतभेद भी दर्शाता है कि जीएम फसलों का मुद्दा केवल विज्ञान पर नहीं, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण पर भी टिका है। यूरोपीय संघ की सावधानी यह सिखाती है कि उपभोक्ता की ‘जानने की इच्छा’ और ‘पसंद की स्वतंत्रता’ को तकनीक के ऊपर प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इस विषय का एक अत्यंत अनूठा और कम चर्चित पहलू ‘बौद्धिक संपदा अधिकार’ और ‘खाद्य संप्रभुता’ है। कानून की नजर में यह कंपनियों के पेटेंट और किसानों के परंपरागत अधिकारों के बीच का युद्ध है। जब कोई कंपनी बीज का पेटेंट ले लेती है, तो किसानों को हर साल नया बीज खरीदना पड़ता है। यह परंपरा के विपरीत है, जहां किसान खुद बीज सुरक्षित रखता था।
भारत में ‘पादप किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001’ मौजूद तो है, लेकिन बड़ी कंपनियों के पेटेंट के सामने गरीब किसानों की आवाज प्रायः दब जाती है। अगर बीज पर नियंत्रण विदेशी कंपनियों का होगा, तो हमारी कृषि नीति कहां जाएगी? हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक के साथ-साथ किसानों के अधिकार भी सुरक्षित रहें।
खाद्य सुरक्षा के लिए सरकार को पूर्ण पारदर्शिता को अनिवार्य बनाना चाहिए, ताकि जीएम उत्पादों का उपयोग करने वाले उपभोक्ताओं को यह जानने का अधिकार हो कि वे क्या उपभोग कर रहे हैं। यह सूचना के अधिकार का ही एक तार्किक विस्तार है। इस पारदर्शिता के साथ-साथ, सुरक्षा जांचों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए कंपनियों द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के बजाय सरकार की ओर से अधिकृत स्वतंत्र प्रयोगशालाओं से गहन जांच कराई जानी चाहिए।
इसके अतिरिक्त, एक सख्त कानून का होना अत्यंत आवश्यक है, जिसमें यह स्पष्ट प्रावधान हो कि मिट्टी की उर्वरता, भूजल प्रदूषण या जन-स्वास्थ्य पर पड़ने वाले किसी भी नकारात्मक प्रभाव के लिए संबंधित कंपनियां आर्थिक रूप से उत्तरदायी होंगी। नीति-निर्धारण की प्रक्रिया को लोकतांत्रिक बनाने के लिए किसी भी नई जैव-प्रौद्योगिकी के व्यापक कार्यान्वयन से पहले स्थानीय स्तर पर सार्वजनिक सुनवाई अनिवार्य की जानी चाहिए, ताकि किसान और आम जनता इस प्रक्रिया का अभिन्न अंग बन सकें।
इन सभी पहलुओं की प्रभावी निगरानी के लिए ‘जीएम निगरानी बोर्ड’ का गठन जरूरी है। साथ ही यह समझना आवश्यक है कि विज्ञान दुश्मन नहीं है, लेकिन तकनीक और प्रकृति के बीच का संतुलन ही जीवन की कुंजी है। हमें जीएम फसलों के एकतरफा विरोध और आंख मूंदकर समर्थन करने से बचना होगा।
कानून का काम है कि वह नवाचार को रोके नहीं, बल्कि उसे सुरक्षा के दायरे में रखे। क्या तकनीक के नाम पर हम अपनी पारंपरिक खेती को दांव पर लगा रहे हैं? यह प्रश्न आज हर नीति-निर्माता की मेज पर होना चाहिए। सतर्कता ही वह सुरक्षा है, जो हमारे भोजन और जीवन को सार्थक बनाती है।
