संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट ने ऐसी वैश्विक समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया है, जो तेजी से आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संकट का रूप लेती जा रही है। इसके अनुसार विश्व की लगभग 40 फीसद आबादी, यानी लगभग 3.4 अरब लोग सुरक्षित, पर्याप्त और किफायती आवास से वंचित हैं। इनमें से एक अरब से अधिक लोग कच्ची बस्तियों, झुग्गी-झोपड़ियों अथवा अत्यंत खराब आवासीय परिस्थितियों में जीवनयापन के लिए विवश हैं। यह स्थिति तब है जब दुनिया तकनीकी प्रगति, आर्थिक विकास और शहरी विस्तार का दावा कर रही है। स्पष्ट है कि विकास की चमक के पीछे एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जिसके सिर पर छत तक नहीं है।

संयुक्त राष्ट्र की ‘विश्व शहर रिपोर्ट 2026’ का विषय ‘वैश्विक आवास संकट- कार्रवाई के मार्ग’ है। यह विषय केवल शहरी नियोजन का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता, पर्यावरणीय स्थिरता और मानवीय गरिमा से जुड़ा हुआ है। आवास का संकट अब केवल गरीब देशों तक सीमित नहीं है। विकसित देशों में भी घरों की कीमतों, बढ़ते किराए और सीमित आवास उपलब्धता ने लाखों लोगों को प्रभावित किया है। इसलिए आज आवास को केवल एक संपत्ति या आर्थिक वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि एक बुनियादी मानव अधिकार के रूप में देखने की जरूरत है।

तेज शहरीकरण, लेकिन आवास की बढ़ती चुनौती

भारत के संदर्भ में यह रिपोर्ट विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। भारत विश्व की सबसे तेजी से शहरीकरण करने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार 2050 तक भारत की लगभग आधी आबादी शहरों में निवास करेगी। वर्तमान में भी करोड़ों लोग बेहतर रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन की संभावनाओं की तलाश में गांवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। मगर शहरी अवसंरचना और आवासीय योजनाएं तेजी से बढ़ती आबादी की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित नहीं हो पाई हैं। ऐसे में एक ओर गगनचुंबी इमारतें खड़ी हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर लाखों लोग झुग्गी-झोपड़ियों और अस्थायी बस्तियों में रहने के लिए मजबूर हैं।

एक सच यह भी है कि कई लोग अपने लिए घर खरीदने की स्थिति में भी नहीं हैं। वैश्विक स्तर पर मकान की कीमत और आय का अनुपात लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2010 में जहां यह अनुपात 9.3 था, वहीं 2023 में यह बढ़कर 11.2 हो गया। मध्य और दक्षिण एशिया में यह आंकड़ा 16.8 तक पहुंच चुका है। इसका अर्थ यह है कि औसत आय वाले व्यक्ति के लिए घर खरीदना पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो गया है। भारतीय महानगरों में स्थिति और भी गंभीर है।

मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में संपत्ति की कीमतें सामान्य आय वाले परिवारों की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। जमीन की बढ़ती कीमतों, निर्माण लागत और निवेश आधारित ‘रियल एस्टेट मॉडल’ ने आवास को बुनियादी आवश्यकता से अधिक निवेश का माध्यम बना दिया है। आवासीय असमानता का प्रभाव केवल घर खरीदने तक सीमित नहीं है। विश्व के लगभग 44 फीसद परिवार अपनी आय का 30 फीसद से अधिक हिस्सा आवास पर खर्च कर रहे हैं। यह स्थिति परिवारों की वित्तीय स्थिरता को प्रभावित करती है।

जब आय का बड़ा हिस्सा किराये या गृह ऋण की किस्तों में खर्च हो जाता है, तब शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और अन्य आवश्यक जरूरतों पर खर्च सीमित हो जाता है। इससे गरीबी का दुश्चक्र और मजबूत होता है। भारत में भी महानगरों में रहने वाले लाखों निम्न और मध्यवर्गीय परिवार इसी समस्या का सामना कर रहे हैं। भारतीय शहरों में किफायती आवास की उपलब्धता तेजी से घट रही है।

किफायती घरों का घटता दायरा और बढ़ती असमानता

गौरतलब है कि देश के आठ प्रमुख शहरों में किफायती आवास परियोजनाओं की हिस्सेदारी 2018 में 52 फीसद थी, जो 2025 तक घटकर केवल 17 फीसद रह गई। इसके पीछे मुख्य कारण जमीन-जायदाद बाजार का उच्च आय वर्ग की ओर झुकाव है। निजी भवन निर्माता अधिक लाभ कमाने के लिए महंगी आवास परियोजनाओं को प्राथमिकता देते हैं। नतीजा, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और निम्न आय समूहों के लिए आवास विकल्प सीमित होते जा रहे हैं। यह स्थिति सामाजिक असमानता को और गहरा करती है।

भारत के अधिकांश बड़े शहरों में लाखों लोग अनौपचारिक बस्तियों में रहते हैं। इनमें स्वच्छ पेयजल, शौचालय, सीवर, स्वास्थ्य सेवाएं और भूमि स्वामित्व का अभाव होता है। यहां रहने वाले लोग लगातार बेदखली, बीमारी और प्राकृतिक आपदाओं के खतरे का सामना करते हैं। शहरी अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण हिस्सा होने के बावजूद ये नागरिक अक्सर नीतिगत प्राथमिकताओं से बाहर रह जाते हैं।

प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) ‘सभी के लिए आवास’ के लक्ष्य के साथ शुरू की गई थी। इसके अलावा, ‘क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी’ योजना ने मध्य और निम्न आय वर्ग को गृह ऋण प्राप्त करने में सहायता प्रदान की है। किफायती किराए वाले आवास परिसर, स्मार्ट सिटी मिशन, अमृत योजना तथा विभिन्न राज्य स्तरीय योजनाएं भी आवासीय सुविधाओं के विस्तार में योगदान दे रही हैं। हालांकि कई चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं। कई बार आवास निर्माण तो हो जाता है, लेकिन रोजगार केंद्रों से दूरी, परिवहन सुविधाओं की कमी और सामाजिक अवसंरचना के अभाव के कारण लोग वहां बसना नहीं चाहते। इसलिए आवास नीति को केवल घर निर्माण तक सीमित न रखकर समग्र शहरी विकास से जोड़ना आवश्यक है। आवास वित्त की समस्या भी गंभीर है।

यथास्थान उन्नयन, सामुदायिक भागीदारी, भूमि अधिकारों की सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार अधिक प्रभावी रणनीति सिद्ध हो सकती है। अहमदाबाद की स्लम नेटवर्किंग परियोजना जैसे उदाहरण बताते हैं कि समुदाय की भागीदारी से बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। भविष्य की आवास नीति में जलवायु परिवर्तन को केंद्रीय स्थान देना होगा। ऊर्जा-कुशल भवन, हरित निर्माण सामग्री, वर्षा जल संचयन, सौर ऊर्जा और आपदा-प्रतिरोधी निर्माण तकनीकों को बढ़ावा देना समय की मांग है। इससे न केवल पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित होगी, बल्कि दीर्घकाल में आवास की लागत भी कम हो सकती है।

आवास का प्रश्न केवल ईंट, सीमेंट और भूमि का प्रश्न नहीं है। यह मानव गरिमा और सामाजिक समानता का प्रश्न है। एक सुरक्षित और सम्मानजनक घर व्यक्ति को केवल आश्रय ही नहीं देता, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के अवसरों तक पहुंच भी सुनिश्चित करता है। यदि किसी समाज में करोड़ों लोग आवासीय असुरक्षा में जीवन बिताने को विवश हैं, तो उस समाज के विकास को पूर्ण नहीं कहा जा सकता।

शहरीकरण को केवल आर्थिक विकास के दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। यदि शहरों को भविष्य के विकास इंजन के रूप में स्थापित करना है, तो उन्हें अधिक समावेशी, न्यायसंगत और रहने योग्य बनाना होगा। भारत के लिए भी यह समय है कि वह आवास को कल्याणकारी कार्यक्रम की सीमा से बाहर निकालकर विकास नीति के केंद्र में स्थापित करे, क्योंकि किसी भी आधुनिक और विकसित राष्ट्र की पहचान केवल ऊंची इमारतों से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि उसके प्रत्येक नागरिक के सिर पर सुरक्षित, सम्मानजनक और किफायती छत उपलब्ध है।