अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता की विफलता से वैश्विक स्तर पर राहत मिलने की संभावनाएं भी क्षीण होती दिख रही हैं। अब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से होर्मुज जलमार्ग को खोलने संबंधी एलान और इस पर ईरान के भारी विरोध से युद्ध की चुनौतियां बढ़ गई हैं। इससे दुनिया भर में खाद्य संकट बढ़ने की आशंका है। चूंकि इस युद्ध के कारण वैश्विक आपूर्ति शृंखला को नुकसान पहुंचा है, जिससे तेल एवं गैस समेत उर्वरकों की भी भारी कमी हो गई है और उसे ठीक होने में महीनों लग सकते हैं, इसलिए जरूरी वस्तुओं के दाम ऊंचे बने रहने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
हाल में विश्व खाद्य कार्यक्रम की ओर से जारी रपट के मुताबिक, इस समय दुनिया में 31.9 करोड़ लोग भूख से पीड़ित हैं। अब पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण यह आंकड़ा और बढ़ने के आसार हैं। इस वैश्विक चुनौती के बीच भारत खाद्यान्न सुरक्षा के मामले में अनुकूल स्थिति में नजर आता है। भारत के पास 31 मार्च 2026 तक 6.02 करोड़ टन गेहूं और चावल का सुरक्षित भंडार (बफर स्टाक) मौजूद है, जो देश की आर्थिक ताकत बन गया है। इस खाद्यान्न भंडार से भारत एक साल तक की अपनी खाद्यान्न जरूरत को आसानी से पूरा कर सकता है। यह भी उल्लेखनीय है कि देश के अस्सी करोड़ से अधिक कमजोर वर्ग के लोगों को निशुल्क खाद्यान्न वितरित किया जा रहा है।
भारत का रिकार्ड खाद्यान्न उत्पादन जहां देश के आम आदमी के लिए भोजन की गारंटी है, वहीं दुनिया के कई जरूरतमंद देशों के करोड़ों लोगों के लिए खाद्यान्न आपूर्ति का आधार भी है। भारत ‘खाद्य सुरक्षा’ के मामले में न केवल आत्मनिर्भर है, बल्कि मजबूत स्थिति में है। सरकार तकनीक और कृषि हितप्रद नीति के माध्यम से किसानों को केवल ‘अन्नदाता’ ही नहीं, बल्कि ‘निर्यातक’ बनाने की दिशा में भी काम कर रही है। खाद्य तेल और दलहन पर राष्ट्रीय मिशन तथा प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन सहित सभी कृषि क्षेत्रों को मजबूत किया जा रहा है। देश का लक्ष्य गेहूं और चावल के अलावा दलहन एवं तिलहन में आत्मनिर्भर होना है।
वर्ष 2025-26 के लिए मुख्य फसलों के उत्पादन के दूसरे अग्रिम अनुमान के मुताबिक, इस बार खाद्यान्न उत्पादन का परिदृश्य ऐतिहासिक स्तर पर है। खरीफ खाद्यान्न उत्पादन 17.41 करोड़ टन और रबी खाद्यान्न उत्पादन 17.45 करोड़ टन रहने का अनुमान है। यह पिछले वर्ष 2024-25 की तुलना में एक बड़ी छलांग है। पिछले वर्ष खरीफ उत्पादन 16.94 करोड़ टन था, जिसमें इस बार लगभग 2.8 फीसद की बढ़ोतरी हुई है। वहीं, रबी उत्पादन पिछले वर्ष 16.91 करोड़ टन था, जिसमें इस दफा 3.2 फीसद की शानदार वृद्धि देखी गई है। थाली के सबसे अहम हिस्से यानी चावल और गेहूं के मोर्चे पर भी भारत ने अपनी जोरदार बढ़त कायम रखी है। दालों के उत्पादन में भी पिछले वर्ष की तुलना में बढ़ोतरी दिखाई दे रही है।
अमेरिका-इजराइल और ईरान के मध्य युद्धविराम के पहले खाद्यान्न की बढ़ती वैश्विक कीमतों के बीच भारत में अनाज का रिकार्ड उत्पादन एक ‘सुरक्षा कवच’ की तरह रहा है। यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि वर्ष 2008 की वैश्विक मंदी में देश की अर्थव्यवस्था खाद्यान्न ताकत की वजह से बहुत कम प्रभावित हुई थी। इतना ही नहीं, छह साल पहले कोरोना से जंग में देश के खाद्यान्न भंडार एक तरह से हथियार बन गए थे। हाल ही में प्रख्यात कृषि विशेषज्ञ और ब्राजील पोटाश के सीईओ मेट सिंपसन ने कहा कि दुनिया में लगातार खाद्य संकट बढ़ता जा रहा है। उर्वरक की कमी के कारण यूरोप और उत्तरी अमेरिका में फसलों की बुआई पर गंभीर असर पड़ रहा है। ऐसे में कई देशों के लिए खाद्यान्न का बड़े पैमाने पर आयात जरूरी होता जा रहा है। कोरोनाकाल में भारत ने जरूरतमंद देशों को खाद्यान्न का निर्यात किया था। अब एक बार फिर जब दुनिया में आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई है, तब भारत खाद्यान्न निर्यात के लिए तत्पर दिखाई दे रहा है।
निस्संदेह कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार और देश के दीर्घकालिक विकास का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ है। ‘पीएम किसान सम्मान निधि’ और न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसे कई कार्यक्रमों से देश का कृषि क्षेत्र लगातार मजबूत हुआ है। अब तक किसानों को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत 22 किस्तों में चार लाख करोड़ रुपए से अधिक की राशि प्राप्त हुई है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत लगभग दो लाख करोड़ रुपए के बीमा दावों का निपटारा किया गया है। देश के गांवों में अप्रैल 2020 से शुरू की गई पीएम स्वामित्व योजना के तहत ग्रामीणों को उनकी जमीन का कानूनी हक देकर उनके आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में काम किया जा रहा है।
वैश्विक खाद्य संकट के बीच खाद्यान्न की बढ़ती मांग के मद्देनजर भारत की ओर से चालू वित्त वर्ष 2026-27 के बजट के तहत कृषि को निर्यात उन्मुख बनाए जाने का लक्ष्य रखा गया है। बजट में कृषि क्षेत्र के लिए 1,62,671 करोड़ रुपए का आबंटन किया गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में सात फीसद अधिक है। स्थानीय किसानों को वैश्विक बाजारों से जोड़ने के लिए स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करने के महत्त्व को रेखांकित किया जा रहा है। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है और वर्तमान में यहां लगभग 4.5 लाख टन मछली का उत्पादन हो रहा है, जबकि अतिरिक्त बीस लाख टन उत्पादन की अपार संभावना है। समुद्री अर्थव्यवस्था की क्षमता को बढ़ाने के लिए नए व्यावसायिक तरीके अपनाए जा रहे हैं। साथ ही कृषि में प्रौद्योगिकी संस्कृति को बढ़ावा देने और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के विकास पर भी जोर दिया रहा है। व्यापक भंडारण अभियान और कृषि-वित्तीय प्रौद्योगिकी तथा आपूर्ति शृंखलाओं में नवाचार को बढ़ाने के प्रयास जारी हैं।
इस बार के बजट के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था को कृषि निर्यात उन्मुख बनने की कोशिश की गई है। इससे भारत के कृषि निर्यात और वैश्विक खाद्य आपूर्ति में और प्रभावी भूमिका निभाने की संभावनाओं को बल मिलता है। देश के पास खाद्यान्न की पैदावार और खाद्य प्रसंस्करण वस्तुओं का उत्पादन एवं निर्यात बढ़ाने की अपार संभावनाएं हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में विविध जलवायु है और कृषि अनुकूल जलवायु क्षेत्रों के मामले में वह समृद्ध है। ऐसे में भारत को निर्यात आधारित खेती, फसल विविधीकरण और खेती में आधुनिक तकनीक के एकीकरण के साथ आगे बढ़ना होगा।
भारतीय कृषि उत्पादों की गुणवत्ता, ब्रांडिंग और मानकों के सभी पहलुओं पर गंभीरता से काम करना होगा। चूंकि देश में अभी भी अनाज, दाल तथा तिलहन के उत्पादन का स्तर मौसम पर ही निर्भर होता है, ऐसे में क्षेत्रवार और फसलवार आधार का व्यापक अध्ययन करते हुए सिंचाई व्यवस्था की नई नीति तैयार करना लाभप्रद होगा। इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि अनाज बर्बाद होने से बचाने के लिए देश में वर्ष 2028 तक सहकारी क्षेत्र में 700 लाख टन अनाज भंडारण की नई क्षमता विकसित करने की महत्त्वाकांक्षी योजना को तेजी से आगे बढ़ाया जाए। उम्मीद है कि खाद्यान्न संकट की वैश्विक चिंताओं के बीच भारत रिकार्ड खाद्यान्न भंडार से देश के आम आदमी की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद्यान्न निर्यात में भी अहम भूमिका निभाएगा।
