सत्ता, व्यवस्था और सदियों पुरानी पितृसत्ता जिस ‘आधे हिस्से’ को अदब, हया और समझौतों की चादर ओढ़ाकर कमरों में कैद रखने का मुगालता पाले बैठी थी, उसकी चूलें अब हिल रही हैं। सड़कों और शिक्षण संस्थानों में गूंजते युवा कदमों की धमक किसी सरकार को बदलने का राजनीतिक शोर भर नहीं, बल्कि उस पुराने लैंगिक समझौते को चुनौती है, जिसमें लड़कियों से स्वतंत्रता के बदले सुरक्षा, सवालों के बदले चुप्पी और बराबरी के बदले समझौते की अपेक्षा की जाती रही।

पारंपरिक विश्लेषक इस उभार को कभी ‘क्षणिक उबाल’, कभी सोशल मीडिया का तात्कालिक चलन मानकर खारिज कर सकते हैं, लेकिन मामला केवल आंदोलनों में लड़कियों की मौजूदगी का नहीं है। भारतीय सामाजिक धरातल पर एक गहरा मानसिक बदलाव आकार ले रहा है। जेन-जी और जेन-अल्फा की ये लड़कियां किसी स्थापित ढर्रे, राजनीतिक दल, एनजीओ या किसी ‘मसीहा’ के सहारे अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने को तैयार नहीं हैं। वे अपनी चेतना की मशाल भी खुद हैं और अपने सवालों की प्रतिनिधि भी।

स्त्रीवाद और सशक्तीकरण के शुरुआती चरणों में कानूनी अधिकार, कार्यस्थल पर समानता और सुरक्षा जैसे मुद्दों के लिए संस्थागत सुधारों और कानूनों पर जोर रहा है। इस बदलाव का रास्ता ऊपर से नीचे की ओर था, लेकिन जेन-जी और जेन-अल्फा की लड़कियों में उभरता सशक्तीकरण इससे अलग है। इसे ‘केंद्रातीत’ कहा जा सकता है। यानी बदलाव का स्रोत किसी संस्था, अभियान, राजनीतिक दल या एनजीओ की प्रतीक्षा में नहीं है, बल्कि लड़की की अपनी चेतना में समाहित है। अपनी पीड़ा, अनुभव और अधिकारों की समझ को वे खुद सवाल में और सवालों को सामूहिक आवाज में बदल रही हैं। अब उन्हें यह बताने के लिए किसी संरक्षक की जरूरत नहीं कि उनका मुद्दा क्या है! लड़कियां अपने सवाल के साथ खुद नेतृत्वकारी भूमिका में खड़ी हो रही हैं।

डिजिटल चौपाल

जेन-जी और जेन-अल्फा डिजिटल युग में पली-बढ़ी पीढ़ियां हैं। स्मार्टफोन और इंटरनेट उनके लिए केवल मनोरंजन के साधन नहीं, दुनिया को समझने और उससे जुड़ने की खिड़की हैं। सूचना के इस लोकतांत्रिक प्रवाह ने उन्हें वैश्विक विचारों और संघर्षों से जोड़ा है। किसी छोटे कस्बे या गांव में बैठी पंद्रह साल की लड़की भी जान सकती है कि दुनिया भर में महिलाएं किन सवालों पर संघर्ष कर रही हैं। सोशल मीडिया उनके लिए आधुनिक चौपाल बन चुका है, जहां निजी अनुभव सामूहिक बहस में बदल जाते हैं। हालांकि इंटरनेट केवल सूचना भर देता है, और चेतना लड़कियां खुद बनाती हैं। स्थानीय अनुभव और वैश्विक विचार जब मिलते हैं, तो असंतोष सवाल बनता है और सवाल प्रतिरोध का रूप लेता है।

परंपरागत समाज ने लड़कियों के लिए एक सुरक्षित घेरा तय किया था- घर में रहो, कम बोलो, संकोच करो और समझौता सीखो। मगर अब नई पीढ़ी इस सौदेबाजी को खारिज कर रही है। उसके लिए सुरक्षा का अर्थ बंद कमरा नहीं, बल्कि सुरक्षित सड़कें, न्यायपूर्ण संस्थान और आजाद आसमान है। उनके सवाल किसी एक घटना तक सीमित नहीं हैं। वे उस व्यवस्था की बुनियाद पर सवाल कर रही हैं, जो लड़कियों को अब भी दोयम दर्जे का नागरिक मानती है।

संवाद से सड़क तक

कोटा, प्रयागराज, देहरादून और पुणे में हुए राष्ट्रीय छात्र-विमर्श तथा संवाद कार्यक्रमों में छात्राओं की बड़ी मौजूदगी ने साफ किया कि आज की छात्र राजनीति में लड़कियां सिर्फ दर्शक नहीं हैं। पेपर लीक, परीक्षाओं में पारदर्शिता और बढ़ती फीस जैसे मुद्दों पर वे अपनी बात रखने और नीतिगत फैसलों में अपनी आवाज शामिल कराने के लिए सामने आ रही हैं। नई दिल्ली में शिक्षा सुधारों को लेकर और यौन हिंसा के खिलाफ आंदोलनों में छात्राओं की व्यापक सक्रियता दिखाई दी। मुंबई में रिया अहीर का छात्रों की रिहाई की मांग करते हुए पुलिस वैन के सामने खड़े होना सिर्फ साहस का दृश्य नहीं था। यह उस ‘अथॉरिटी स्ट्रक्चर’ यानी सत्ता के ढांचे को चुनौती थी, जिसके सामने पहले भय स्वाभाविक माना जाता था।

क्षणिक आवेग से आगे

उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कई इलाकों से सामने आईं स्कूली बच्चियों की आक्रामक तस्वीरें भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। स्कूल के भोजन की बदहाली, स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव, जर्जर होते स्कूल भवन, पृथक शौचालय की मांग और प्रशासनिक अव्यवस्था को लेकर जिला कलेक्टरों, पत्रकारों और अधिकारियों के सामने सवाल करती बच्चियां बताती हैं कि जेन-अल्फा की चेतना बहुत कम उम्र में सवाल करना सीख रही है। हाल में जयपुर के एमएनआईटी में छात्रावास की छात्राओं का रात दस बजे की पाबंदी के खिलाफ प्रदर्शन सिर्फ कर्फ्यू के समय का सवाल नहीं था। उनका सीधा तर्क था कि जब लड़कों के लिए ऐसी पाबंदी नहीं है, तो सुरक्षा के नाम पर लड़कियों को सेंट्रल लाइब्रेरी, फूड कोर्ट और स्टडी सेंटर जैसी सुविधाओं से वंचित क्यों किया जाए? यानी सवाल अब यह नहीं कि लड़कियों को सुरक्षा चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि सुरक्षा की परिभाषा कौन तय करेगा।

क्या यह सोच केवल आज का क्षणिक आवेग है, या आज की लड़कियों के साथ आने वाली युवा पीढ़ी की दृष्टि, सोच और सामाजिक व्यवहार में कोई महती बुनियादी बदलाव आकार ले रहा है! आंदोलन खत्म होते हैं। नारे थम जाते हैं। बचता है वह विचार, जो व्यक्ति के भीतर जगह बना चुका हो। घर के भीतर संवाद, करिअर का चुनाव, सार्वजनिक स्थानों पर अपनी उपस्थिति और अपने जीवन से जुड़े फैसलों में समझौता न करने का आग्रह भी जेन-जी और जेन-अल्फा लड़कियों में बदलाव का हिस्सा है। जो मानसिक स्वतंत्रता स्वभाव का हिस्सा बन जाए, उसे आसानी से पीछे नहीं धकेला जा सकता।

आने वाले वर्षों में यही पीढ़ियां कार्यस्थलों, कॉरपोरेट बोर्ड, अदालतों और संसद तक पहुंचेंगी। आज राष्ट्रीय संवादों और विश्वविद्यालयों में सवाल कर रही ये लड़कियां कल सक्रिय मतदाता और नीति-निर्माता होंगी। इस अर्थ में वे भविष्य का महत्त्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक दबाव-समूह बन सकती हैं।

सवालों की किरचें

लड़कियों का यह रास्ता आसान नहीं है। मुखर लड़कियों को चुप कराने के समाज के पुराने हथियार आज भी मौजूद हैं। चरित्रहनन, लोकलाज और सामाजिक दबाव। मगर सवाल का जवाब देने के बजाय लड़की के चरित्र को सवालों के घेरे में खड़ा कर देना पितृसत्तात्मक व्यवस्था का पुराना हथियार है। फर्क यह है कि अब ये हथकंडे हर बार डर पैदा नहीं करते। फिर भी यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि पितृसत्ता अब समाप्त हो रही है। वर्ग, आर्थिक निर्भरता, शिक्षा, ग्रामीण-शहरी अंतर और पारिवारिक दबाव आज भी लड़कियों की स्वतंत्रता की सीमाएं तय करते हैं। इसलिए इस बदलाव की ताकत के साथ उसकी स्थायित्व की परीक्षा भी जरूरी है।

यह महिला सशक्तीकरण की कोई सरकारी योजना या प्रायोजित परिभाषा नहीं है। यह उग्र और सचेत मानसिक आत्मनिर्णय है। परिसरों और सड़कों पर गूंजते युवा कदमों की पदचाप इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि यह एक ऐसे समाज की मांग है, जिसमें लड़की अपने जीवन, अधिकारों और भविष्य के फैसलों में बराबर की हिस्सेदार हो। अगर यह चेतना आंदोलन खत्म होने के बाद भी घर, कक्षा, कार्यस्थल, रिश्तों, सड़क और सत्ता के सामने उसके फैसलों में बनी रहती है, तो इसे क्षणिक आवेग कहना संभव नहीं होगा। तब यह सिर्फ आंदोलनों की कहानी नहीं होगी। यह एक पीढ़ी की दृष्टि और सोच बदलने की कहानी होगी।