लेखक: अतुल मौर्य

भोर की पहली धूप के साथ जब लड़कियाँ घर की देहरी लाँघती हैं, तो उनके कंधों पर स्कूल बैग से कहीं अधिक भारी बोझ होता है। राजस्थान के एक छोटे कस्बे की प्रिया हो, या दिल्ली के किसी सरकारी विद्यालय की रोशनी; सुबह छह बजे उठकर, रसोई में चाय बनाकर, छोटे भाई-बहनों को तैयार करके जब वे बस की ओर दौड़ती हैं, तो यह दौड़ केवल विद्यालय तक नहीं होती। वे उस संसार में कदम रखती हैं जो उनसे कहता है: प्रश्न करो, आत्मविश्वास रखो, अपने सपनों को नाम दो।

कक्षाओं में वे संविधान की समता पढ़ती हैं, विज्ञान में तर्क के सूत्र सीखती हैं, भाषा में अपनी अभिव्यक्ति को धार देती हैं। परंतु संध्या की छाया के साथ जब वही लड़कियाँ घर की ओर लौटती हैं, तो वे एक बिल्कुल भिन्न दुनिया में प्रवेश करती हैं।

यह दुनिया किताबों की भाषा नहीं बोलती। यहां आवाज़ का तेज़ होना असंस्कार माना जाता है, हँसी की ऊँचाई मापी जाती है। एक ओर कक्षा में शिक्षिका कहती हैं: “बेटा, बोलो, संकोच मत करो”; दूसरी ओर घर में दादी टोकती हैं: “इतनी ज़ोर से हँसते नहीं, लड़की हो।” यही वह अदृश्य विभाजन रेखा है जिसे हम प्रायः दैनंदिन जीवन की सामान्यता मानकर अनदेखा कर जाते हैं।

स्वीकृति के भीतर की अदृश्य सीमा

समाज अब लड़कियों की पढ़ाई का उस तरह विरोध नहीं करता जैसा कभी करता था। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार देश में 15-24 वर्ष की आयु की महिलाओं में साक्षरता दर 90 प्रतिशत तक पहुँच गई है यह निस्संदेह एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। किंतु इस स्वीकार्यता की परतों के नीचे भी एक अदृश्य रेखा खिंची रहती है। मार्च 2025 में बिहार के दानापुर की खुशबू कुमारी की कहानी पूरे देश ने देखी, जिसने कक्षा 10 में 500 में से 399 अंक लाए, पर परिवार ने विज्ञान की जगह कला वर्ग में दाखिला दिलाया। खुशबू डॉक्टर बनना चाहती थीं।

यह कोई अपवाद नहीं है। AISHE (उच्च शिक्षा की अखिल भारतीय सर्वेक्षण रिपोर्ट) 2022-23 के आँकड़े बताते हैं कि उच्च शिक्षा में लड़कियों का नामांकन अनुपात (GER) बढ़ा है, परंतु इंजीनियरिंग, प्रौद्योगिकी और कंप्यूटर विज्ञान में उनकी उपस्थिति अभी भी एक-तिहाई से कम है। शिक्षण, परिचर्या और मानविकी, ये क्षेत्र इसलिए सामाजिक रूप से मान्य हैं क्योंकि इनमें देखभाल और सेवा का भाव दिखता है और समाज स्त्री को इन्हीं भावों से जोड़कर देखने का आदी है।

अभियांत्रिकी, न्यायशास्त्र, राजनीति, रक्षा-सेवाएँ या वैज्ञानिक शोध जैसे क्षेत्रों में जाने वाली लड़कियाँ अभी भी सामाजिक कल्पनाशीलता की परिधि से बाहर हैं। जो इन क्षेत्रों की ओर जाती हैं, उन्हें प्रत्यक्ष प्रतिबंध से अधिक सूक्ष्म असहजताओं से गुजरना पड़ता है जैसे कि “सेना में जाओगी, फिर शादी कौन करेगा?” या “वकालत में घर कब सँभालोगी?” जैसे प्रश्न उनके सपनों को ‘यथार्थ’ की कसौटी पर बार-बार परखते हैं। धीरे-धीरे लड़की स्वयं भी यह आत्मसात करने लगती है कि उसके सपनों की एक ‘सामाजिक सीमा’ है। उसे आगे बढ़ने की स्वतंत्रता है परंतु केवल उतनी, जितनी से स्थापित सामाजिक संरचना असहज न हो।

प्रतीकों का अनकहा पाठ

शिक्षाशास्त्री प्रो. कृष्ण कुमार की दृष्टि में समाज स्त्री को केवल विधि-निषेधों से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संकेतों की एक सूक्ष्म भाषा से गढ़ता है। पहनावा, चाल, आवाज़ का आरोह-अवरोह इत्यादि, ये सब मिलकर एक अघोषित पाठ्यक्रम रचते हैं। इसकी अभिव्यक्ति कभी-कभी बेहद ठोस होती है। दिल्ली के कुछ विश्वविद्यालयों में एक शोध के दौरान छात्राओं से पूछा गया कि वे कक्षा में प्रश्न पूछने से क्यों हिचकती हैं।

उत्तर चौंकाने वाले थे कि “लड़के हँसते हैं”, “प्राध्यापक सीरियसली नहीं लेते”, “घर में माँ कहती हैं ज़्यादा बोलना अच्छा नहीं।” ये तीनों उत्तर तीन अलग-अलग दुनियाओं से आए थे परंतु एक ही निष्कर्ष पर मिलते थे : “तुम्हारी आवाज़ का एक निर्धारित दायरा है।” शायद इसीलिए बहुत-सी लड़कियाँ कम आयु में ही दो भिन्न संसारों के बीच एक अदृश्य सेतु बनाना सीख लेती हैं।

विद्यालय में वे आत्मविश्वास से बोलती हैं, घर में संयम धारण करती हैं। वे जानती हैं कि किस परिसर में कितनी हँसी स्वीकार्य है, और कहाँ मौन ही समझदारी है। मनोविज्ञान इस प्रक्रिया को ‘कोड-स्विचिंग’ कहता है। कोड-स्विचिंग वह मानसिक श्रम है जो व्यक्ति को एक संदर्भ से दूसरे संदर्भ में जाते ही अपना व्यवहार, भाषा और अभिव्यक्ति बदलनी पड़ती है। यह श्रम अदृश्य है, थकाने वाला है, और अनिवार्यतः असमान क्योंकि यह लड़कियों से ही अपेक्षित है, लड़कों से नहीं।

परिवर्तन की धीमी, दृढ़ आहट

तथापि परिवर्तन की धारा रुकती नहीं। बिहार सरकार द्वारा चलाई गई’साइकिल योजना’के द्वारा साइकिल मिलने के बाद जब लड़कियाँ पाँच किलोमीटर दूर के माध्यमिक विद्यालय जाने लगीं, तो पाँच वर्षों में राज्य की बाल विवाह दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज हुई। यह शोध “अमेरिकन इकोनॉमिक जर्नल: अप्लाईड इकोनॉमिक्स” में प्रकाशित हुआ। एक साइकिल ने केवल दूरी नहीं घटाई; उसने लड़की के लिए एक समय का स्वामित्व दिया, एक स्वतंत्रता दी।

प्रत्येक पीढ़ी में कुछ लड़कियाँ निर्धारित सीमाओं को थोड़ा और पीछे धकेलती हैं। झारखंड की मरियम, जिसने घर वालों के विरोध के बाद भी कानून की पढ़ाई जारी रखी और आज अपने जिले की पहली महिला वकील है, वह किसी आंदोलन की देन नहीं है; वह उस छोटी बातचीत की देन है जो उसकी माँ ने एक रात उसके पिता से की थी। बदलाव हमेशा बड़े आंदोलनों से नहीं आता, वह अक्सर घरों के भीतर होने वाली उन छोटी-छोटी बातचीतों से उगता है जो खामोशी को तोड़ती हैं।

शिक्षा का वास्तविक अर्थ मनुष्य को केवल आजीविका के योग्य बनाना नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन के बारे में सोचने, प्रश्न करने और चुनाव करने की क्षमता से लैस करना है। विद्यालय जाने वाली लड़कियाँ प्रतिदिन लौटती हैं। परंतु उनके साथ जो प्रश्न लौटते हैं; वे प्रश्न जिन्हें वे कक्षाओं में नहीं पूछ सकतीं, जो उनके मन की गहराई में सुलगते रहते हैं, उन्हें समाज सुनने की कोशिश नहीं करता। अब समय आ गया है कि हम उनकी परीक्षाओं के अंकों से अधिक, उनके अनुभवों को पढ़ना सीखें।

(लेखक अतुल मौर्य जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली के शिक्षा संकाय में शोधार्थी हैं)