‘ये मस्खरों को वजीफे यूं ही नहीं मिलते
रईस खुद नहीं हंसते हंसाना पड़ता है’

– अजहर इनायती

मसखरापन अदाकारी का मुश्किल पक्ष होता है। मसखरे खुद को जितना मूर्ख साबित करवा सकें उतने ही सफल। पिछले दिनों सत्ता पक्ष के एक सांसद ने वीर रस की मुद्रा में नथुने फड़काते हुए, ललकारते हुए गोरखपुर के बारे में कहा-हमको स्पेन लगता है तुम आंख का अंधा है तो हम क्या करें। नेताओं, विधायकों व सांसदों के साथ ऐसे वजीफे टीवी एंकरों को भी मिलते हैं जो सत्ता के आंकड़ों पर सवाल उठाने वालों के खिलाफ हल्ला बोल देते हैं। वे जनता की आंखों पर गुलाबी रंग का चश्मा डालने की कवायद करते हैं। जनता की गुलाबी देखती आंखें जब अपनी जेब पर पड़ती हैं तो अहसास होता है कि उसका कोई विकास ही नहीं हुआ है।जीडीपी के आंकड़े, गुलाबी अर्थव्यवस्था के बीच सवाल करने वालों को अंधा घोषित करने वाली राजनीति पर बेबाक बोल।

‘तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है’

आज के दौर में आम आदमी फाइलों से नहीं टीवी एंकर के हो-हल्ले से अर्थव्यवस्था का रंग जान पाता है। या कहें, एंकर के बताए रंग को ही पहचान पाता है। देश के घरों की बैठकों में अचानक से बधाई-बधाई-बधाई, गर्व-गर्व-गर्व का हड़कंप मच गया। एंकरों के आदेश पर गर्वित होने के बाद होश आया तो असली मुद्दा पता चला कि देश के सकल घरेलू उत्पाद की दर 7.8 फीसद पहुंच गई है।

एक आदमी अभी-अभी जयंत चौधरी का वीडियो देख कर उठा था कि औसत भारतीय परिवार महीने में एक किलो चीनी नहीं खाता होगा। मध्य प्रदेश के नेताजी ने चीनी की महंगाई पर सवाल पूछ रहे मीडियाकर्मियों से कह दिया कि पत्रकार लोग तो मिठाई खाना पसंद ही नहीं करते हैं। एक चैनल पर एंकर पूरा आंकड़ा ले आई कि अगर हर आदमी दिन में एक चम्मच चीनी कम खाए तो देश में कितने लाख टन चीनी की बचत हो सकती है। पूरे देश के लोगों को मधुर शब्दों में मधुमेह का मरीज होने से डराया गया। इन दिनों किसी भी चीज का वास्तविक असर रील में दिखता है। अब धड़ल्ले से बन रही रील में बहू पूछती है कि पहली रसोई में मीठे में क्या बनाऊं तो सास का जवाब होता है, हमारे यहां तो मैगी बनाने की परंपरा है, तुम वही बना लाओ।

सोना नहीं खरीदने, विदेश नहीं जाने की सलाह तो छोड़िए जिस देश में हर तरफ से चीनी कम खाने की सलाह दी जा रही है, वहां तो विकास के आंकड़ों पर सवाल करना देशद्रोह की श्रेणी में ही ला देना चाहिए। इससे पहले दाल और खाद्य तेल के दुष्परिणामों के बारे में आगाह किया ही जा चुका है। पिछले कुछ समय से गुलाबी मौसम वाली अर्थव्यवस्था का कायदा बन चुका है कि हर महंगी हुई चीज को आम लोगों के लिए त्याज्य बता दिया जाए।

टीवी पर एंकर मैडम जब विकास पर सवाल पूछने वालों से जवाब मांग रही थीं तो एक आम घर में किसी ने पूछा, जीडीपी बढ़ने का मतलब क्या हुआ? क्या हमारी सरकार बहुत अमीर हो गई है? सवाल पूछने वाले ने टीवी पर चल रहे जयकारे से यही मतलब निकाला कि कोई तो बहुत अमीर हो गया है। पर वो अमीर है कौन?

जवाब देने वाले ने स्कूली ज्ञान बघार दिया कि जीडीपी सरकार का कोई निजी खजाना नहीं है। इससे जानकारी मिलती है कि जनता के पैसे, श्रम और उत्पादन का कुल जमा जोड़क्या है। यह सुन कर उधर से घबराए हुए स्वर में सवाल आया, मतलब जनता अमीर हुई है? तो क्या हमलोग जनता नहीं हैं? क्या मतदाताओं की तरह जनता का भी विशेष पुनरीक्षण हो गया है? हमें उसमें नहीं गिना जा रहा है? क्या हम जनता के रुतबे से भी कट गए? जरा देखें तुम्हारा बटुआ, उसमें कितना विकास आया है? इतना सुनते ही बटुए ने आह भरी।

उसकी बेइज्जती करवाने पर तरस आया। वैसे भी डिजिटल भुगतान का समय चल रहा है। तभी सलाह मिली कि जरा बैंक खाता देखो, वहां जरूर विकास आया होगा। लेकिन खाता बता रहा था कि तय रकम से कम होने के कारण वह भी दागदार हो चुका है। तभी इस निकृष्ट सोच पर गुस्सा आया कि हम अपने घर में ही क्यों विकास खोज रहे हैं। जब सरकार ने कहा है, विकास आया है तो जरूर आया होगा। कहीं दिमाग की तरह आंखें भी नक्सली तो नहीं हो गई हैं, जिन्हें सरकार का विकास दिख ही नहीं रहा है।

विकास को खोजने के लिए सबसे पहले सब्जी मंडी पहुंचे। सब्जियों के दाम में विकास देख कर थोड़ा सुकून पहुंचा। अविकसित सब्जी पहले जितने पैसे में आ जाती थी, विकास होने के बाद उतने में इतनी थोड़ी आती है कि उससे चटनी ही बन सकती है। इतनी विकसित सब्जी को घर ले जाने के बारे में सौ बार सोचना पड़ता है कि हमारी रसोई इतना विकास झेल पाएगी भी या नहीं। दूध तो विकास में इतनी दौड़ लगा चुका है कि कि उसकी कीमत डालर के हिसाब से बताई हुई लगती है।

स्कूल फीस, बिजली बिल को विकास के किसी खास पुरस्कार से नवाजा जाना चाहिए। यह सब सोचते हुए वापस अपने घर पहुंचे। वहीं मकान मालिक मिठाई का डिब्बा लेकर खड़े थे। हंसते हुए कहा कि जीडीपी का विकास 7.8 फीसद हो गया। मिठाई खाओ और किराया बढ़ाओ। घर की तरफ देखने के बाद लगा कि सबसे बड़ा विकासवादी तो किराया ही है।

घर के बढ़े हुए किराए को याद कर महसूस हुआ कि सांख्यिकी विभाग पर फिर सवाल उठना ही चाहिए। याद आया कि 2019 में राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के कुछ गैर सरकारी सदस्यों ने रोजगार से जुड़े आंकड़ों को जारी करने में कथित देरी व नीतिगत हस्तक्षेप के विरोध में इस्तीफा दिया था। आरोप लगे थे कि सरकार बेरोजगारी का असली परिदृश्य सामने नहीं आने देना चाहती है। घर के बढ़े किराए से लग रहा कि इस बार सांख्यिकी विभाग ने गलत आंकड़ा दिया है। यहां मकसद उन सरकार विरोधियों का पक्ष लेना नहीं है जो जीडीपी में महज 2.6 फीसद की वृद्धि बता रहे हैं। घर के बढ़े खर्चे देख कर लग रहा जीडीपी को 14 के दहाई अंक में पहुंच जाना चाहिए था।

अब रोजगार के बिना विकास पर बात कैसे पूरी हो। जंतर मंतर पर चले आंदोलन में सत्ता पक्ष का सबसे बड़ा सवाल था कि इन प्रदर्शनकारियों में नीट के विद्यार्थी कितने हैं? यही तो विकास था कि परीक्षा पर चर्चा के लिए बने मंच पर पूरे देश से बेरोजगारों का हुजूम पहुंच गया। पटना से लेकर झारखंड तक हर जगह प्रदर्शन में वे बेरोजगार भी पहुंचे थे, जिन्हें अगर अभी भी नौकरी नहीं मिली तो जल्द ही उनकी सेवानिवृत्ति की उम्र आ जाएगी।

सरकार की तरफ से विकास की राह में रोड़ा भी यही लोग बताए जा रहे हैं जो सरकारी नौकरी की आस में बैठे हैं। क्या ये पकौड़े तलने जैसा स्वरोजगार भी नहीं कर सकते हैं? जब तेल और चीनी कम खाने की सलाह है तो आम जनता चाय-पकौड़े खाने जैसा देशद्रोही काम क्यों करेगी? पकौड़े तल भी लेंगे, चाय बना भी लेंगे तो मुनाफा कहां है कि रेहड़ी लगाने के लिए रिश्वत और ‘हफ्ता’ दे सकें।

जीडीपी के आंकड़े पर बहस कोई नई बात नहीं है। जब तक आंकड़ों के गुलाबी रंग के बरक्स बढ़ती महंगाई और घटते उपभोग वाली जनता रहेगी तब तक सवाल उठते ही रहेंगे। आंकड़ों में जीडीपी 7.8 फीसद हो या फिर 2.6 फीसद, पैमाना यही है कि देश की जनता का विकास कितना हुआ है। अर्थव्यवस्था में पैदा हुई वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य की माप को सरकारें अपनी साख बताती रही हैं तो जनता सिर्फ इतना कहती आई है कि हमारी लाज भी तो बचाओ। बढ़ी हुई जीडीपी के निशान निवेश, रोजगार, मजदूरी, उपभोग में भी तो दिखने चाहिए।

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने तंज किया कि कुछ ही महीनों में 13 करोड़ नाम कम हो गए तो यह भारत की जनसंख्या वृद्धि का समाधान भी हो सकता है। सवाल है कि क्या अन्य विभाग भी इसी कागजी खुशहाली लाने की राह पर चलना पसंद करते हैं? आंकड़ों पर विवाद के बीच सरकार अंधा न कह दे तो फिलहाल कहना पड़ेगा-हमका भी स्पेन लगता है।