SIR को लेकर चल रहे विवाद के बीच गांधी जयंती पर युवा वकील मोहनदास गांधी के दक्षिण अफ्रीका के दिनों को याद करना जरूरी है। उस समय वहां की औपनिवेशिक सरकार भारतीयों से उनका वोट देने का अधिकार छीनने की कोशिश कर रही थी। गांधी की पहली राजनीतिक लड़ाई सत्याग्रह नहीं बल्कि वोट देने के अधिकार के लिए थी। जुलाई 1894 में नटाल सरकार ने अपनी औपनिवेशिक नीति के तहत भारतीयों को वोट देने के अधिकार से वंचित करने का प्रस्ताव रखा।
गांधी ने ब्रिटिश उपनिवेश मामलों के सचिव लॉर्ड रिपन को भेजी अपनी याचिका में लिखा था कि अगर किसी भारतीय के पास वोट देने का अधिकार नहीं होगा तो वह ‘इस उपनिवेश में अपना आत्मसम्मान खो देगा।’ एक साल बाद गांधी ने चेतावनी दी कि भारतीयों से वोट का अधिकार छीनने के नतीजे ‘सोचने तक में बहुत डरावने’ होंगे।
दक्षिण अफ्रीका की उस लड़ाई ने आगे चलकर भारत और आजाद भारत के नागरिक को लेकर गांधी की सोच की नींव रखी। 1947 से पहले के कई दशकों में कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के कई लोगों का मानना था कि भारत में बहुत ज्यादा अशिक्षा, जातिगत भेदभाव और विविधता है। ऐसे में सभी वयस्कों को वोट देने का अधिकार देना सही नहीं होगा। गांधी इससे बिल्कुल सहमत नहीं थे। 1920 के दशक में उन्होंने ‘यंग इंडिया’ और ‘हरिजन’ में लिखा कि शुरू से ही सभी वयस्कों को वोट देने का अधिकार मिलना चाहिए। उनका मानना था कि इससे ताकतवर लोगों को आम लोगों की बात सुनने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
1931 की गोलमेज सम्मेलन में गांधी ने बिना किसी शर्त के सभी वयस्कों को वोट देने के अधिकार की मांग की। उनका कहना था कि यह अधिकार पुरुषों और महिलाओं, अमीर और गरीब, पढ़े-लिखे और अनपढ़ सभी को मिलना चाहिए। इसमें धर्म और जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।
इसी सम्मेलन में गांधी ने अपने अनुभव के आधार पर बताया कि मतदाता सूचियों में भी हेरफेर किया जा सकता है। सितंबर 1896 में दक्षिण अफ्रीका के डरबन में मोहनदास गांधी ने देखा कि मतदाता सूची में उनका नाम दर्ज था जबकि उन्होंने इसके लिए आवेदन नहीं किया था।
एक उम्मीदवार को पता था कि कुछ भारतीयों के पास वोट देने का अधिकार है। उसने गांधी की जानकारी के बिना उनका नाम मतदाता सूची में डाल दिया था ताकि उनका समर्थन हासिल किया जा सके।
करीब 35 साल बाद इस घटना को याद करते हुए गांधी ने कहा था, ”तब से मैं जानता हूं कि मतदाता सूचियां कैसे तैयार की जाती हैं।”
आजाद भारत में चुनावों में पैसे और बाहुबल का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है। लेकिन SIR के दौरान जिस बड़े पैमाने पर लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं वैसा बड़े स्तर पर लोगों को वोट के अधिकार से वंचित करने का मामला पहले नहीं देखा गया। इससे लोकतंत्र में हर नागरिक के वोट को बराबर महत्व देने की भावना पर भी सवाल उठते हैं।
2 अक्टूबर को यह बात याद करना इसलिए जरूरी है क्योंकि भारत ने 1950 में गणराज्य बनने के साथ ही सभी वयस्क नागरिकों को वोट देने का अधिकार दिया था। उस समय यूरोप के कई लोकतांत्रिक देशों में भी महिलाओं को वोट देने का अधिकार देने को लेकर हिचकिचाहट थी। भारत में सभी वयस्कों को मतदान का अधिकार देने का विचार गांधी का था और उनके प्रयासों के बाद यह कानून का हिस्सा बना।
आज SIR ने नागरिक और उसके वोट के अधिकार को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अगर मतदाता सूची में इस तरह बदलाव किया जाता है जिससे मतदाताओं की संख्या बढ़ने के बजाय कम हो जाए और यह प्रक्रिया कानून के खिलाफ हो तो यह 1894 में दक्षिण अफ्रीका के नटाल में हुई घटना की याद दिलाती है। वहां भी नियमों का इस्तेमाल करके मतदाताओं की संख्या और उनके अधिकार सीमित करने की कोशिश की गई थी।
गांधी जयंती पर SIR की प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों को (जो संविधान का पालन करने की शपथ लेते हैं) गांधी की सोच के आधार पर तीन सवाल खुद से पूछने चाहिए।
पहला- क्या मतदाता सूची में बदलाव से नागरिक का आत्मसम्मान बढ़ रहा है या कम हो रहा है?
दूसरा- क्या मतदाता सूची निष्पक्ष तरीके से तैयार की जा रही है या किसी खास उम्मीदवार की जीत की संभावना को ध्यान में रखकर इसमें बदलाव हो रहा है? गांधी ने 1896 में मतदाता सूची में ऐसी ही गड़बड़ी का अनुभव किया था।
तीसरा- क्या वोट को नागरिक के ऐसे अधिकार के रूप में देखा जा रहा है जिसकी रक्षा होनी चाहिए या ऐसी सुविधा के रूप में जिसे सरकार अपनी मर्जी से दे सकती है?
इतने बड़े स्तर पर मतदाताओं के नाम हटाना केवल तकनीकी गलती नहीं है। लेखक इसे नागरिकों के अधिकारों को नुकसान पहुंचाने और बड़े पैमाने पर लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित करने के रूप में देखते हैं।
गांधी ने 1894 में लिखा था कि चुनाव सिर्फ एक दिन होने वाली प्रक्रिया नहीं है। यह उस संवैधानिक अधिकार की गारंटी है कि समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति की आवाज भी मायने रखती है।
गांधी जयंती पर गांधी को याद करने का मतलब सिर्फ उनके हाथ में छड़ी वाली तस्वीर को याद करना नहीं है। उन्हें उस युवा वकील के रूप में भी याद करना चाहिए जिसने समझा था कि मतदाता सूची में किसी व्यक्ति का नाम होना उसका अधिकार है और नाम हट जाना उसके अधिकार को खत्म करना है।
