यह दुनिया तब ज्यादा शिक्षित सी दिखती है, जब शैक्षणिक संस्थाओं पर राजनीतिक वर्चस्व नहीं होता है। राजनीति ने शैक्षणिक संस्थाओं को हमेशा कमजोर करने की कोशिश की ताकि उसे कठघरे में खड़े करने वाले तैयार ही नहीं हों। इक्कीसवीं सदी में ज्यादातर देश एक बार फिर से महान बनने की तैयारी में हैं, लेकिन वे ये महानता शिक्षा संस्थानों को राजनीतिक बंधक बना कर हासिल करना चाहते हैं। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप ने हार्वर्ड पर हमला बोला। इससे पहले भारत में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) जैसे संस्थानों पर सवाल उठा कर ‘जियो इंस्टीट्यूट’ का माहौल बनाया गया। इतने हमले झेलने के बाद भी जेएनयू जैसे संस्थान वैश्विक मंच पर देश के लिए मान-सम्मान हासिल करते रहे। वहीं सरकारी रहमतों की बारिश से लबालब होने के बाद गलगोटिया जैसे निजी संस्थान शोध व अनुसंधान के नाम पर बाजार से ‘चीनी कुत्ता’ खरीद कर ले आए। पूरी दुनिया में किरकिरी होने के बाद भी इस गलती के जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई हुई, यह देश नहीं जानता। निजी विश्वविद्यालयों में मेधा के इस महाठगिनी रूप पर बेबाक बोल।
एक देश है अमेरिका। उसने खुद को विश्व गुरु नहीं कहा था। लेकिन अपने यहां की सामाजिक, राजनीतिक व शैक्षणिक संस्थाओं का इस तरह विकास किया कि दुनिया भर की कुदरती मेधा उसकी तरफ आकर्षित हुई। उसने भी पूरी दुनिया के दरवाजे अपने लिए खोले। अंतरिक्ष शोध संस्थान से लेकर विश्वविद्यालयों तक में दुनिया भर के मानसिक मेहनतियों को सम्मान मिला। एक समय में अमेरिका अगर इस धरती की एकध्रुवीय शक्ति बनने का दावा कर सका तो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की भावना को विस्तार देने के कारण।
बीसवीं सदी के जाते-जाते दुनिया भर में गरीबी, बेरोजगारी की समस्या खड़ी हुई, जिसका कोई हल इक्कीसवीं सदी के शुरुआती समय में भी नहीं मिला। जब दुनिया भर की राजनीति को इन समस्याओं का हल नहीं मिला तो उन्होंने राजनीति ही बदल लेने की ठानी। राजनीति शुरू हुई आरोप-प्रत्यारोप की। आज की समस्याओं के लिए पुराने समय को जिम्मेदार ठहराया गया। इस राजनीति का अगुआ भी अमेरिका ही बना। इसके तहत सबसे पहले उन संस्थाओं पर प्रहार हुआ जो राजनीति पर सवाल करती हैं, देश और दुनिया के हितों के लिए उसे कठघरे में ठहराती हैं। यानी हमारे शिक्षण संस्थान।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह से अकादमिक विद्वानों का मजाक बनाना शुरू किया, वह दुनिया के लिए नई राह था। उनका साथ दिया धरती पर के अमीर कारोबारियों में से एक एलन मस्क ने। जो हार्वर्ड विश्वविद्यालय दुनिया भर में शैक्षणिक गुणवत्ता का मानक है, ट्रंप ने उसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। विश्वविद्यालय की स्वायत्तता खत्म करने की पूरी कोशिश की। यह सब हुआ अमेरिका को फिर से महान बनाने के नाम पर। ‘फिर से’ शब्द पर गौर फरमाया जाए। आखिर अमेरिका की महानता कब से कम होनी शुरू हो गई? तब से, जब राजनेताओं के पास जनता की समस्याओं का कोई ‘महान समाधान’ नहीं था।
अब हम भारत का रुख करते हैं। विश्व बंधुत्व की बात करने वाली भारत की राजनीति अचानक से विश्व गुरु होने की बात कहने लगी। हार्वर्ड पर हमले के पहले ही भारत के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय को खारिज किया गया। दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत में भी कई तरह की राजनीतिक व आर्थिक असमानताएं हैं। असमानताओं के समुद्र में जेएनयू जैसे संस्थान एक द्वीप की तरह हैं, जहां देश के हर कोने के हाशिये पर पड़े लोग भी उच्च शिक्षा पा सकते हैं। भारत की राजनीति ने इस शैक्षणिक द्वीप को दुश्मन के एक अड्डे की तरह देखना शुरू कर दिया। अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त का राशन देने वाली राजनीति जेएनयू के विद्यार्थियों को मिलने वाली एक-एक सुविधा को इस देश के संसाधनों पर बोझ बताने लगी।
जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों पर सवाल उठा कर ‘जियो इंस्टीट्यूट’ के अस्तित्व में आने से पहले ही उसे उत्कृष्टता का तमगा दे दिया गया था। जेएनयू के बरक्स निजी संस्थानों को प्रतीक बनाया गया। संदेश दिया गया कि महंगी शिक्षा ही अच्छी है। दिल्ली विश्वविद्यालय ने विद्यार्थियों को ‘सीयूईटी’ की प्रक्रिया में ऐसा उलझाया कि मेधावी और संसाधन संपन्न विद्यार्थियों ने निजी विश्वविद्यालयों का रुख करना बेहतर समझा। महज एक अव्यावहारिक दाखिला प्रक्रिया ने देश के सबसे भरोसेमंद विश्वविद्यालय की साख पर सवाल उठा दिए। इसके साथ ही शुरू हुई प्राचार्यों की कक्षाओं को गोबर से पोतने की प्रक्रिया। ‘गुरुओं’ में होड़ लग गई अवैज्ञानिक और अतार्किक दिखने की। यहां तक की राजनीति को खुश करने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों से लेकर भारतीय प्रबंधन संस्थानों के निदेशकों तक ने अविश्वसनीय तरीके से अवैज्ञानिक बयान देने शुरू कर दिए।
इक्कीसवीं सदी की दुनिया के सामने सबसे बड़ी और कठिन परीक्षा बनी-कृत्रिम मेधा। यह तय हो गया कि जो इस क्षेत्र में नेतृत्व करेगा, आने वाले समय में राजनीतिक नेतृत्व भी उसका ही होगा। ऐसे समय में भारत सरकार ने दुनिया का सबसे बड़ा कृत्रिम मेधा सम्मेलन किया। कृत्रिम मेधा से जुड़े दुनिया भर के दिग्गज जुटे। इस सम्मेलन के जरिए दुनिया के सामने संदेश गया कि भारत का गलगोटिया विश्वविद्यालय चीन की तकनीक को अपना बना कर पेश कर रहा है। केंद्र सरकार के मंत्री तक इस चीनी उत्पाद से प्रभावित हो गए। पूरी दुनिया के शिक्षाविदों ने भारत की इस स्थिति पर तंज कसा। पता चला कि गलगोटिया को आइआइटी जैसे संस्थानों से बड़ी जगह दी गई थी, या कहें उसने हासिल की थी।
सवाल है कि इस गड़बड़ी के सामने आने के बाद क्या किया गया? पाठक पहले ही इस पर हंस चुके होंगे, लेकिन इस स्तंभ में दर्ज करना भी जरूरी है। दिल थाम कर सरकार की कड़ी कार्रवाई का सच पढ़िए-कमजोर दिल वाले इस पंक्ति के आगे न पढ़ें-गलगोटिया के स्टाल का बिजली का कनेक्शन काट दिया गया। जहां इतना बड़ा बौद्धिक भ्रष्टाचार हुआ है, वहां आप बिजली गुल कर रहे हैं। वैश्विक मंच पर गलगोटिया को किसने अनुमति दी, उसके शोध की गुणवत्ता की परख करने वाले अधिकारी कौन थे? देश की साख पर इतनी बड़ी शर्मिंदगी के बाद किस पर किस तरह की कार्रवाई हुई, देश इसके बारे में कुछ नहीं जानता है। फिलहाल इसका सारा ठीकरा उस महिला पर फोड़ दिया गया, जिसने चीनी रोबोट कुत्ते को गलगोटिया का उत्पाद बताया था। विश्वविद्यालय की उस कर्मचारी को पूरी व्यवस्था की खामियों का विष पिला दिया गया।
जनता का सब्र ऐसा कि सरकार को गलगोटिया जैसे संस्थानों के खिलाफ कोई नारे नहीं सुनने पड़े। गलगोटिया पर देशद्रोह जैसा कोई मुकदमा भी दर्ज नहीं हुआ। देश के युवा विद्यार्थियों से लेकर अभिभावकों तक ने इसे चुटकुला और रील का विषय भर मान लिया।
जब देश की शिक्षा व्यवस्था में गिरावट का प्रत्यक्ष नमूना चुटकुले तक सीमित हो जाए तो यह अति गंभीर समय है। बीसवीं सदी के संस्थानों से शिक्षित भारतीयों ने अमेरिका से लेकर यूरोपीय देशों में अपनी साख बनाई। प्रतिभाओं का बहिर्गमन हमारे देश के लिए चिंता नहीं गर्व का विषय बना। अब अमेरिका बोल रहा-नहीं चाहिए आपकी प्रतिभा। गलगोटिया मामले में भारत सरकार को भ्रम हो रहा होगा कि आम लोग जल्दी सब कुछ भुला कर फिर जेएनयू को जमींदोज करने में जुट जाएंगे। याद रखिए, उधर ट्रंप हैं। कल वे एलान न कर दें कि भारत के गलगोटिया व वैसे निजी संस्थाओं से आने वाले विद्यार्थियों पर 999 फीसद शुल्क लगेगा।
गलगोटिया के स्टाल की बिजली काट कर सत्ता को लगा कि यह गलती अंधेरे में छुप गई। यह तय है कि शिक्षा की हर रोशन जगह पर गलगोटिया ज्ञान पर लगे अंधेरे के ग्रहण के तौर पर ही देखा जाएगा। अमेरिका से लेकर गलगोटिया तक सबक लीजिए। शिक्षा को राजनीति से दूर रखिए। इसके बुरे परिणाम दिख रहे हैं। कल को वैश्विक रोजगार के संस्थान यह नहीं देखेंगे कि आपने अपने बच्चे के दाखिले के लिए कितना पैसा खर्च किया। वे देखेंगे कि ज्ञान व शोध को लेकर उसकी स्थिति क्या है? हार्वर्ड पर हमले से लेकर गलगोटिया पर चुप्पी तक को अपनी हासिल शिक्षा से विश्लेषित कीजिए। बात समझ में आएगी।
