कुछ ही हफ़्तों के भीतर चीनी के दाम अचानक बहुत बढ़ गए हैं। पूरे देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत 24 जुलाई को लगभग 45 रुपये प्रति किलो थी, जो 24 अगस्त तक बढ़कर करीब 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई। यानी सिर्फ एक महीने में इसमें लगभग 44 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई है।
सरकार ने जमाखोरी के लिए व्यापारियों और मिल मालिकों को ज़िम्मेदार ठहराया है और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की चेतावनी दी है। हालांकि मुनाफाखोरी या सट्टेबाज़ी ने इस उछाल को थोड़ा बढ़ाया जरूर होगा, लेकिन असली और गहरी सच्चाई यह है कि त्योहारों के सीज़न से ठीक पहले बाज़ार में चीनी की आपूर्ति बहुत कम हो गई है।
आपूर्ति में आई इस कमी के पीछे तीन मुख्य कारण हैं, जिन्होंने मिलकर हालात को और बिगाड़ दिया है। पहली वजह यह है कि इस चालू चीनी वर्ष की शुरुआत में हमारे पास पिछला बचा हुआ स्टॉक सिर्फ 50 लाख टन था, जबकि पिछले साल यह 80 लाख टन था। पिछला स्टॉक कम होने की वजह से इस बार आपूर्ति में आए झटके को संभालना मुश्किल हो गया।
दूसरी वजह यह है कि इस साल चीनी का उत्पादन उम्मीद से काफी कम रहा। शुरुआत में 343 लाख टन उत्पादन का अनुमान था, लेकिन फसलों में बीमारी लगने के कारण सरकार ने इसे घटाकर 306 लाख टन कर दिया है। जून तक केवल 273.5 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था, जिसका मतलब है कि संशोधित अनुमान तक पहुंचने के लिए जुलाई से सितंबर के बीच 32.5 लाख टन चीनी का उत्पादन करना होगा। जबकि इतिहास गवाह है कि इन तीन महीनों में औसतन केवल 3.8 लाख टन चीनी का ही उत्पादन हो पाता है। ऐसे में कुल उत्पादन घटकर 280 से 290 लाख टन ही रहने की उम्मीद है।
तीसरी और सबसे बड़ी वजह यह है कि चीनी की इस तंगी के बावजूद लगभग 27.5 लाख टन चीनी एथेनॉल यानी पेट्रोल में मिलाए जाने वाले ईंधन को बनाने में लगा दी गई। बड़ी बात यह है कि एथेनॉल बनाने का काम कच्चे माल की उपलब्धता से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ा है। सालों तक पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का काम बहुत धीमा था, लेकिन 2019-20 में यह 5 प्रतिशत से बढ़कर 2025-26 में 20 प्रतिशत तक पहुंच गया। कच्चे माल की आपूर्ति इस तेजी का मुकाबला नहीं कर सकी, जिसकी वजह से हमारी ऊर्जा नीति अब सीधे तौर पर खाने-पीने की चीज़ों के बाज़ार से होड़ करने लगी है।
इस संकट का समय भी बहुत गलत है। देश में त्योहारों का सीज़न नजदीक आ रहा है जब चीनी की मांग अचानक बढ़ जाती है, जबकि गन्ने की नई फसल अक्टूबर के मध्य से पहले बाज़ार में नहीं आने वाली। इसलिए बाज़ार को कई हफ़्तों तक पुराने बचे हुए स्टॉक पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। चीनी का कम स्टॉक कीमतों को ऊपर खींच रहा है, और अगर समय रहते सही कदम नहीं उठाए गए तो दाम और भी ऊपर जा सकते हैं।
अगर हमारी अर्थव्यवस्था में बाज़ार पूरी तरह स्वतंत्र होता, तो चीनी की कमी होते ही इसके दाम बढ़ते, बाहर से आयात शुरू हो जाता और लोग खपत कम करके इसे खुद ही संभाल लेते। लेकिन भारत में चीनी का पूरा कारोबार सरकार के कड़े नियंत्रण में चलता है। गन्ने का दाम, चीनी की बिक्री, आयात, निर्यात और एथेनॉल के लिए कच्चे माल का आवंटन—सब कुछ सरकार ही तय करती है। जब सरकार इस पूरी व्यवस्था को खुद चलाती है, तो चीनी के दामों में आए इस उछाल की जिम्मेदारी भी सरकार की ही बनती है। यह नीतिगत नाकामी का एक साफ उदाहरण है।
सरकार ने अब तक राहत के नाम पर केवल 10 लाख टन चीनी पर आयात शुल्क हटाने का फैसला किया है, जो कि बहुत कम है और बहुत देर से लिया गया फैसला है। अनुमान के मुताबिक सरकार को त्योहारों से पहले कम से कम 30 से 40 लाख टन रिफाइंड चीनी बाहर से मंगवानी चाहिए और इसे खुले बाज़ार में उतारना चाहिए। इसके साथ ही रिफाइंड चीनी पर लगने वाले 100 प्रतिशत आयात शुल्क को घटाकर शून्य या सिर्फ 5 प्रतिशत कर देना चाहिए।
दूसरा कदम यह होना चाहिए कि एथेनॉल बनाने के लिए चीनी का इस्तेमाल तुरंत और भारी मात्रा में कम किया जाए और इसकी जगह दूसरे विकल्पों का इस्तेमाल हो। एफसीआई के पास ज़रूरत से काफी ज़्यादा चावल का स्टॉक पड़ा हुआ है। सरकार उस चावल का इस्तेमाल एथेनॉल बनाने में कर सकती है और चीनी की खपत बचा सकती है। हालांकि एफसीआई को एथेनॉल कंपनियों से चावल की सही कीमत वसूलनी चाहिए।
वैसे एथेनॉल बनाने के लिए मक्का सबसे अच्छा विकल्प है क्योंकि इसके उत्पादन के लिए चावल या गन्ने की तरह बहुत अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती। यद्धपि भारत में मक्के की पैदावार बहुत कम है। अगर बिना पैदावार बढ़ाए मक्के से एथेनॉल बनाया गया, तो मक्का महंगा हो जाएगा। इसका सीधा असर मुर्गियों के दाने, अंडे और दूध की कीमतों पर पड़ेगा क्योंकि मक्का जानवरों का मुख्य भोजन है। यानी सिर्फ चीनी की जगह चावल या मक्का चुन लेने से भोजन और ईंधन का संकट खत्म नहीं होता। इसका एकमात्र तरीका मक्के की पैदावार बढ़ाना है।
तीसरा रास्ता यह हो सकता है कि जब देश में खान-पान की चीज़ों पर दबाव बढ़ रहा हो, तो सरकार सीधे बाहर के देशों से बना-बनाया एथेनॉल आयात कर ले, या फिर पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने के लक्ष्य को घटाकर अस्थायी रूप से 15 प्रतिशत कर दे।
इस पूरे घटनाक्रम से सबसे बड़ा सबक यह मिलता है कि भारत को अपनी एथेनॉल नीति पर दोबारा विचार करने और सुधार करने की सख्त जरूरत है। तेल कंपनियों को यह आजादी मिलनी चाहिए कि वे खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण का ध्यान रखते हुए सबसे सस्ता कच्चा माल चुन सकें। सरकार को हर चीज़ खुद बांटने के बजाय सिर्फ आपातकालीन स्टॉक और खाद्य सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए।
तुरंत किए जाने वाले उपाय बिल्कुल साफ हैं: बाज़ार में चीनी का स्टॉक बढ़ाने के लिए पर्याप्त चीनी आयात की जाए, एथेनॉल बनाने में चीनी का इस्तेमाल तुरंत रोका जाए, एफसीआई के अनाज का इस्तेमाल सिर्फ तभी हो जब वह वाकई फालतू हो, और जरूरत पड़ने पर बाहर से एथेनॉल मंगाने का रास्ता खुला रखा जाए।
मक्के से एथेनॉल बनाना पर्यावरण के लिए अच्छा है लेकिन इसके लिए उसकी पैदावार बढ़ानी होगी। 2019-20 में 5 प्रतिशत से बढ़कर 2025-26 में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने के लक्ष्य ने कच्चे माल पर बहुत भारी दबाव डाल दिया है। कुल मिलाकर, ईंधन के मामले में खुद पर निर्भर बनने की होड़ में कभी भी देश के सामने भोजन और ईंधन में से किसी एक को चुनने की नौबत नहीं आनी चाहिए। ईंधन की आत्मनिर्भरता से देश की खाद्य सुरक्षा मजबूत होनी चाहिए, कमजोर नहीं; भोजन हमेशा पहली प्राथमिकता होना चाहिए। उम्मीद है कि मोदी सरकार अपनी एथेनॉल नीति का हर तरफ से मूल्यांकन करेगी और इसमें जरूरी सुधार करेगी ताकि आम लोगों के लिए खाने-पीने की चीजें महंगी न हों।
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