इंडियन सिनेमा हमेशा से समाज की सच्चाई दिखाने का जरिया माना जाता है। मगर कई बार ऐसा होता है कि सच्चाई को बड़े पर्दे तक पहुंचने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। कई बार कहानियां इतनी कड़वी, संवेदनशील या बेबाक होती हैं कि सेंसर बोर्ड उन्हें थिएटर तक जाने की इजाजत ही नहीं दे पाता। कहीं फिल्म डायलॉग पर आकर अटक जाती है, कहीं सीन काटने की शर्त रखी जाती है, तो कहीं पूरे कंटेंट को ही विवादित बताकर सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया जाता है। मगर ऐसे में OTT प्लेटफॉर्म के माध्यम से उन कहानियों को दिखाया जाता है।

इन कारणों से होता है फिल्मों का विरोध

इस वक्त भी थलापति विजय की फिल्म सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट ना मिलने के कारण रिलीज नहीं हो पा रही है। दरअसल भारत में सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि भावनाओं, राजनीति, धर्म और समाज से जुड़ा हुआ माध्यम है। यही वजह है कि सेंसर बोर्ड अक्सर फिल्मों के कंटेंट को लेकर सख्त रवैया अपनाता है। खासतौर पर अगर फिल्में सत्ता, सिस्टम, अपराध, धर्म, जाति या जेंडर जैसे मुद्दों पर बनी हो। ऐसी फिल्मों के ट्रेलर से ही विवाद शुरू हो जाता है और इन पर रोक लगाने की कोशिश, इन्हें बायकॉट करने की कोशिश, इनके खिलाफ शिकायतें आदि हो जाती हैं।

OTT पर नहीं कोई रोक

OTT प्लेटफॉर्म्स जैसे नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम वीडियो, डिज्नी+ हॉटस्टार और जी5 ने ऐसी अड़चनों को लगभग खत्म कर दिया है। यहां फिल्मों और वेब सीरीज को थिएटर जैसी कड़ी सेंसर प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता। यही कारण है कि कई निर्देशक और लेखक अपनी कहानियों को सीधे OTT पर रिलीज करने लगे हैं। OTT ने उन्हें न सिर्फ क्रिएटिव आजादी मिल रही है, बल्कि एक ऐसा दर्शक भी दिया जो नए और अलग कंटेंट को देखने में दिलचस्पी रखते हैं।

इस खबर में आज हम उन सभी कहानियों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें अगर थिएटर में लाया जाता तो शायद इतना बड़ा विवाद हो सकता था, जिसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। मगर ओटीटी पर रिलीज होने के बाद उन्हें काफी पसंद किया गया और उसकी कहानी को लोगों ने समझा भी।

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दिल्ली क्राइम

नेटफ्लिक्स की वेब सीरीज ‘दिल्ली क्राइम’ ने सच्ची घटना पर आधारित कहानी को बिना किसी लाग-लपेट के दिखाया। अगर यही कहानी थिएटर में आती, तो शायद कई सीन और संवाद विवादों की भेंट चढ़ जाते। OTT ने इसे पूरी ईमानदारी से दर्शकों तक पहुंचाया और यह सीरीज को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया। इस सीरीज के तीन सीजन आ चुके हैं, लेकिन सबसे पहले जो सीजन आया था, वो निर्भया कांड पर आधारित था। ये वो कांड है, जिसने 2012 में राजधानी समेत पूरे देश को हिलाकर रख दिया था।

भक्षक

भक्षक (Bhakshak) एक गंभीर और सच्ची घटनाओं से प्रेरित हिंदी फिल्म है, जो समाज के उस काले सच को सामने लाती है जिसे अक्सर दबा दिया जाता है। यह फिल्म महिला सुरक्षा, सत्ता का दुरुपयोग और सिस्टम की नाकामी जैसे मुद्दों पर आधारित है। फिल्म की कहानी एक जिद्दी और ईमानदार महिला पत्रकार वैशाली सिंह (भूमिका: भूमि पेडनेकर) के इर्द-गिर्द घूमती है। वैशाली को एक ऐसे शेल्टर होम के बारे में सूचना मिलती है, जहां नाबालिग लड़कियों के साथ यौन शोषण किया जा रहा है। शुरुआत में यह खबर दबाने की कोशिश होती है, क्योंकि इस मामले में प्रभावशाली लोग और राजनीतिक ताकतें शामिल होती हैं।

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लैला

नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध 2019 की वेब सीरीज ‘लैला’ (Leila) एक डिस्टोपियन थ्रिलर है, जो प्रयाग अकबर के उपन्यास पर आधारित है। कहानी 2047 के एक काल्पनिक भारत ‘आर्यावर्त’ पर आधारित है। जहां एक तानाशाही शासन है। हुमा कुरैशी ने एक मां का किरदार निभाया है, जो अपनी लापता बेटी ‘लैला’ को खोजने के लिए हर खतरे का सामना करती है। यह सीरीज समाज को कठोर नियमों और पवित्रता को दिखाती है। इस दुनिया में लोगों को अलग-अलग वर्गों और इलाकों में बांटा गया है।

कटहल

‘कटहल – ए जैकफ्रूट मिस्ट्री’ (2023) एक कॉमेडी-ड्रामा फिल्म है, जो उत्तर प्रदेश के ‘मोबा’ नामक एक छोटे से कस्बे में ‘अंकल हॉन्ग’ प्रजाति के कटहल के गायब होने की कहानी है। इसमें सान्या मल्होत्रा ने इंस्पेक्टर महिमा बसोर का किरदार निभाया है। ये फिल्म पुलिस की लापरवाही, जातिगत भेदभाव, राजनीतिक दबाव और मानव तस्करी जैसे गंभीर मुद्दों को उजागर करती है। यह फिल्म सीधे सिस्टम पर हमला करते हुए एक सामाजिक संदेश देती है। ऐसे में अगर इसे थिएटर में रिलीज किया जाता तो काफी विवाद हो सकता था।

क्या OTT पूरी तरह आजाद है?

हालांकि OTT पर भी अब नियमों की चर्चा शुरू हो चुकी है, लेकिन अभी भी यहां थिएटर के मुकाबले ज्यादा आजादी है। यही कारण है कि सामाजिक मुद्दों, क्राइम, राजनीति और रिश्तों की जटिल कहानियां OTT पर ज्यादा देखने को मिल रही हैं।

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ओटीटी पर क्यों नहीं सेंसर बोर्ड की रोक

ओटीटी प्लेटफॉर्म पर सेंसर बोर्ड की सीधी रोक इसलिए नहीं होती, क्योंकि भारत में थिएटर और डिजिटल माध्यम के लिए अलग-अलग नियम बनाए गए हैं। सिनेमा हॉल में रिलीज होने वाली फिल्मों पर सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) की मंजूरी जरूरी होती है, क्योंकि थिएटर में हर उम्र और हर वर्ग के लोग बिना किसी नियंत्रण के फिल्म देखते हैं। वहीं ओटीटी कंटेंट को ऑन-डिमांड माना जाता है, जहां दर्शक अपनी मर्जी से कंटेंट चुनकर देखते हैं, इसलिए उस पर पहले सेंसर लगाने की व्यवस्था नहीं की गई। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि ओटीटी पूरी तरह आज़ाद है। सरकार ने आईटी नियम 2021 के तहत ओटीटी प्लेटफॉर्म को सेल्फ-रेगुलेशन, उम्र के अनुसार रेटिंग, कंटेंट डिस्क्लेमर और शिकायत निवारण जैसी शर्तों के दायरे में रखा है। इसी वजह से ओटीटी पर कई ऐसी बोल्ड, सामाजिक और राजनीतिक कहानियां देखने को मिलती हैं, जो थिएटर में सेंसर की वजह से रिलीज़ नहीं हो पातीं।