आजादी ने बंटवारे का दर्द झेला और सांप्रदायिक तनाव का भी सामना किया। पर तब भी ऐसे तमाम लोग थे, जिन्होंने अपने इंसानी उसूल को नहीं भुलाया। मिलजुलकर रहने और एक समाज बनाने का उसूल, जिसने बहुतों को राह दिखाई। लोग तनाव भूलते जा रहे थे। जख्म भरते चले गए।
सत्तर के दशक में एक ऐसी भी पीढ़ी थी, जिसे महसूस ही नहीं हुआ कि उनके मोहल्ले या शहर में किसी तरह का कोई तनाव है। किसी परिवार के घर के कपड़े की सिलाई कोई मुसलमान दर्जी करता था, तो घर की महिलाओं के कपड़ों की सिलाई पड़ोसन तारा कर देती थी।
बच्चे पांच पैसे के पांच लेमनचूस और साथ में ‘घलुआ’ यानी एक मुफ्त लेमनचूस भी मांगते हुए यह सोचते तक नहीं थे कि दुकानदार मुसलिम है या नहीं। उस पीढ़ी के बच्चों के रिश्ते ऐसे ही बन रहे थे। गांव में लगने वाले बाजार में जो सब्जी होती थी, उसे उगाने वाले हिंदू होते थे, तो उनसे खरीद कर बेचने वाले ज्यादातर मुस्लिम।
धूमधाम से होने वाली दुर्गा पूजा या सरस्वती पूजा में पूरे मोहल्ले के हिंदू, मुसलिम, सिख के अलावा निचली कही जाने वाली जातियों तक की बराबर की भागीदारी होती थी। मोहर्रम में कोई बच्चा बिना किसी आग्रह के खुश होकर ताजिए के नीचे चलता था। रात भर विभिन्न गांव से आए हुए मोतियों में पिरोए ताजिए का लोग इंतजार करते थे। उसकी तैयारी में हिंदू भी बराबर शामिल होते थे।
देखरेख की औपचारिकता के लिए सरकारी अधिकारियों का जमावड़ा भले होता था, लेकिन जब ताजिया निकलता था, तब कहीं कोई तनाव नहीं होता था। तब कुछ उदाहरणों के बावजूद लोगों के बीच विभाजित करने वाली सोच नहीं थी। शहरों में बर्तन की दुकान से सभी धर्म और जातियों के लोग बर्तन खरीदते थे। सिलाई मशीन बेचने वाले हिंदू थे, तो उसे खरीदने वाले अधिकतर कारीगर मुस्लिम थे।
मंदिर के बगल में मस्जिद भी होती थी, तो कोई तनाव नहीं दिखता था। होली में रंग लगाने से पहले यह नहीं पूछा जाता था कि तुम हिंदू हो या मुसलमान। रंग लगाने के लिए हिंदू युवक अपने मोहल्ले के मुसलिम दोस्त के घर आसानी से जाते थे। रंग लगाने और होली खेलने में दोनों के बीच जो प्यार और सौहार्द दिखता था, वह अब दुर्लभ है।
इसी तरह, ईद-बकरीद में भी वही प्यार जीवन पाता था। हर त्योहार धूमधाम और उत्सव के साथ मनाया जाता था। हिंदू बच्चे मुस्लिम बुजुर्गों को, तो मुसलिम बच्चे हिंदू बुजुर्गों को नाना, मामा, नानी, मौसा, मामी कह कर संबोधित करते। ईद के समय ये तमाम रिश्ते विभिन्न किस्म के पकवान के साथ ईदी में मिलते, तो सद्भावना और प्यार का रंग थोड़ा और गाढ़ा हो जाता। वहीं दुर्गा पूजा के दौरान इंसानियत के रंगों से सजे हुए बाजार में क्या हिंदू, क्या मुसलमान- सभी बराबर प्यार और सौहार्द के भागीदार होते थे।
तब रास्ते बंटे हुए नहीं थे। हर रास्ता हर किसी के लिए था। मूर्तियों के विसर्जन के दौरान शायद ही कहीं से विवाद की खबर आती थी। इसी तरह ताजियों के लिए किसी रास्ते में अड़चन नहीं थी। कोई समूह जिधर से चाहता था, उधर से विसर्जन के लिए मूर्ति ले जाता था। इन यात्राओं में हिंदू-मुसलमान, सब बराबर और दिल से शामिल होते थे।
आज भी बहुत सारे लोग शायद इस बात पर गौर कर पाते होंगे कि दीपावली की धूमधाम में पटाखे, फुलझड़ियां मुख्य रूप से मुसलिम समुदाय के लोगों द्वारा ही बनाई जाती थीं। उस दौर में पटाखे लेते हुए कौन सोचता था कि पटाखे बेचने वाले लोग किस धर्म से जुड़े हुए हैं!
किसी की मां बीमार हुई, तो देखने वाले डाक्टर की पहचान हिंदू की थी, या मुसलमान की, यह कौन देखता था। तब किसी के दिमाग में इनकी पहचान कराने की बात नहीं आती थी। किसी डाक्टर की धार्मिक पहचान से किसी मरीज को डर नहीं लगता था और न ही डाक्टरों के भीतर अपने मरीजों की पहचान को लेकर कोई आग्रह था। बल्कि हालत तो यह थी कि किसी को यह जानने की जरूरत भी नहीं थी कि कौन डाक्टर और कौन मरीज किस धार्मिक पहचान के साथ जीता है।
मगर जब दंगों के बीज रोपे गए और उनकी जड़ें फैलने लगीं, तो उसके बाद किसी को मुसलमान बना दिया गया, तो कोई हिंदू पहचान के साथ मुखर होने लगा। जिनका जीना-मरना एक साथ था, उनके दो पक्ष बना दिए गए। एक पक्ष खुद को दूसरे से असुरक्षित महसूस करने लगा और लोगों के घर अपनी धार्मिक पहचान के दायरे में सिमटने लगे।
जाहिर है, समय ने करवट बदल ली और सियासी साजिशों ने पूरे माहौल को बदल डाला। मुसलिम और हिंदू की अलग-अलग पहचान होने लगी। पहले दोनों के त्योहार एक दूसरे के साथ मनाए जाते थे, अब वही त्योहार सांप्रदायिक तनाव और पुलिस भारी भारी सुरक्षा के बीच मनाए जाने लगे। दंगों ने नेता पैदा करना शुरू किया। आजादी ने उसूलों वाले नेता बनाए थे।
सांप्रदायिक माहौल से नेता बनना आसान लगने लगा। नेता जवाबदेही से आजाद होना चाहते थे। दंगे ने उन्हें वह आजादी दे दी। कोई जानने की कोशिश क्यों नहीं करता कि खासकर कोरोना महामारी के दौर में मानसिक रोगियों की संख्या तेजी से क्यों बढ़ी, जबकि हमने सुना और पढ़ा है कि अतीत में हम प्लेग को हरा चुके थे।
राजनीतिक लाभ के लिए धर्म पूछ कर सामान खरीदने की नई मानसिक बीमारी पैदा हो चुकी है। अब बच्चे कहां से लेमनचूस खरीदें? सियासी जहर से अब बचपन भी पीड़ित होने लगा है, तो इस बचपन से क्या बनेगा? इन सवालों का जवाब पूछिए, तो सब बहाना बनाने लगते हैं। हम एक इंसान के रूप में वक्त के पन्नों पर अपनी शिकायत दर्ज करवा रहे हैं।
