आर्थिक आंकड़ों की बात करें तो 2024-25 में राज्यों का बकाया कर्ज कुल जीडीपी के 27 से 29 फीसद तक पहुंच चुका था। जबकि 20 फीसद तक के कर्ज को ही सुरक्षित सीमा माना जाता है। भारत के केंद्रीय बैंक, ‘रिजर्व बैंक आफ इंडिया’ का आकलन है कि 2026 तक अलग-अलग राज्यों का जीडीपी बरक्स कर्ज का अनुपात 17.8 फीसद से लेकर 46 फीसद तक है। कुछ राज्यों का कर्ज 30 फीसद से भी ज्यादा है। ऐसी हालत में चुनावों के वक्त राज्यों में सत्ताधारी दल जनता के लिए मुफ्त योजनाओं का खजाना खोल देते हैं। चुनाव के पहले जो मुख्यमंत्री किसी पुराने जमाने के राजा की तरह खजाना लुटाते हैं, वही चुनाव के बाद राज्य के बुनियादी कामों के लिए भी कर्ज व अनुदान के मोहताज हो जाते हैं। यही नीति आम चुनाव के समय भी हो जाती है, जब जनता के लिए केंद्रीय खजाना खोला जाता है और बाद में कर्ज ही उपाय बचता है। कई राज्यों में विधानसभा चुनाव की तारीखों का एलान होने वाला है। जनता को मुफ्त का माल और उसके बाद कर्ज से बेहाल राज्यों की स्थिति पर बेबाक बोल।
अगर सुबह से शाम तक मुफ्त खाना, साइकिल और बिजली मिलती रहेगी तो लोगों में काम करने की भावना कम हो जाएगी। मुफ्त चीजें बाँटने के बजाय रोजगार के अवसर बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। आखिर भारत के लिए हम कैसी कार्य-संस्कृति चाहते हैं? उपभोक्ताओं को बिजली में सब्सिडी देने की बात करने वाली तमिलनाडु सरकार को फटकार लगाते हुए और अन्य राज्यों को सलाह देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की है।
कुछ समय पहले संपन्न हुआ बिहार का चुनाव अब लगभग भुला दिया गया है, क्योंकि अन्य राज्यों में चुनाव की तारीखों का जल्द ही एलान होने वाला है। बिहार चुनाव के दौरान विपक्ष द्वारा इस्तेमाल किया गया शब्द ‘चुनावी रिश्वत’ आलोचना का विषय बना था। बिहार सरकार के मुखिया नीतीश कुमार ने चुनाव से पहले महिलाओं के खाते में दस हजार रुपये डाले। कहा गया कि इस कदम से चुनावी लड़ाई काफी हद तक उनके पक्ष में चली गई।
लेकिन विपक्ष के जिस खेमे ने इस पर सवाल उठाए, उसके भीतर क्या हुआ? तमिलनाडु के चुनाव की तारीखों का एलान अभी होना है। मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने चुनावी बढ़त लेते हुए तमिलनाडु की 1.3 करोड़ महिलाओं के खाते में पांच हजार रुपये डाले। यह द्रमुक सरकार की जनकल्याणकारी योजना ‘कलाईग्नार मगलिर उरिमाई थित्तम’ के तहत है। यह योजना सितंबर 2023 में शुरू हुई थी, जिसमें परिवार की महिला को मुख्यमंत्री की ओर से मासिक एक हजार रुपये की मदद दी जाती है।
तमिलनाडु सरकार के अनुसार मासिक एक हजार रुपये के अलावा मार्च और अप्रैल के लिए 2000 रुपये का अग्रिम भुगतान किया गया है। इसके अतिरिक्त 2000 रुपये का विशेष ‘ग्रीष्म पैकेज’ भी दिया गया है। स्टालिन का दावा है कि चुनावी मौसम में योजनाओं को रोका जा सकता है, इसलिए सरकार ने अग्रिम भुगतान किया है।
अब शायद ही कोई ऐसा राज्य हो जो मुफ्त योजनाओं को नहीं आजमा रहा हो
अब शायद ही कोई ऐसा राज्य हो जो अरविंद केजरीवाल द्वारा शुरू की गई मुफ्त योजनाओं को नहीं आजमा रहा हो। एक दल की जनकल्याणकारी योजना ‘रेवड़ी’ कहलाती है और दूसरे दल की वैसी ही पहल जनकल्याण। इससे पहले कर्नाटक में भी देखा गया कि चुनावी समय में दी गई पाँच गारंटियों को पूरा करने के कारण सरकार को बजट में कई मदों में कटौती करनी पड़ी।
पक्ष और विपक्ष दोनों की स्थिति देखकर यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारत में गरीबी राजनीतिक इस्तेमाल की वस्तु बन गई है। सवाल है कि इसकी वजह क्या है? पहली वजह गरीबी का बड़ा आँकड़ा है। जब गरीबी अधिक होगी तो उसका राजनीतिक इस्तेमाल होगा ही। वहीं, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ किसी बाध्यकारी फैसले की तरह नहीं होतीं; वे केवल सलाह दे सकती हैं। अमल राजनीतिक दलों को करना है, जो इस ब्रह्मास्त्र को छोड़ने के इच्छुक नहीं दिखते।
सुप्रीम कोर्ट मुफ्त की रेवड़ियों पर पहले भी टिप्पणी कर चुका है, लेकिन ये टिप्पणियाँ किसी ठोस फैसले में तब्दील नहीं हो पाई हैं। बिहार में महिलाओं के खाते में पैसे डाले गए और मतदान के समय उसे बढ़ाने का एलान भी हुआ। केंद्र सरकार ने दावा किया कि 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आ गए, लेकिन 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन मिलना जारी रहा। चुनाव दर चुनाव होते जा रहे हैं, पर मुफ्त राशन लेने वालों की संख्या में उल्लेखनीय कमी नहीं दिखती।
लोकतंत्र में इस समस्या का समाधान क्या है? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जो लोग भुगतान करने में असमर्थ हैं, उनकी मदद समझी जा सकती है, लेकिन अमीर और गरीब में बिना अंतर किए सबको सुविधा देना गलत नीति है। यह भी तय है कि जिसके पास सत्ता होगी, वह चुनाव के समय जनता के खातों में राहत पहुँचाएगा। सवाल यह है कि क्या गरीबी सिर्फ इस्तेमाल की वस्तु बनी रहेगी या उसका वास्तविक उन्मूलन होगा? इसका बड़ा उदाहरण पड़ोसी देश चीन है। 2012 के बाद चीन ने गरीबी उन्मूलन के लिए जो अभियान चलाया, वह मिसाल बना।
सबसे पहले विस्तृत डाटा तैयार किया गया और लक्षित लाभार्थियों की पहचान की गई। क्षेत्र विशेष को पूरी तरह गरीब मानने के बजाय परिवार-आधारित विश्लेषण किया गया। गरीबी के कारणों—भौगोलिक, स्वास्थ्य, बेरोजगारी—की पहचान कर समाधान दिए गए। सड़क, बिजली, इंटरनेट जैसी बुनियादी सुविधाएँ बढ़ाई गईं। नौ वर्ष की शिक्षा अनिवार्य की गई। सीधे नकद वितरण के बजाय डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराए गए। तटीय अमीर प्रांतों को पश्चिमी गरीब प्रांतों से जोड़ा गया।
इन सुधारों के परिणामस्वरूप 1980 के बाद चीन में लगभग 77 करोड़ ग्रामीणों को गरीबी से बाहर निकाला गया। विश्व बैंक के अनुसार वैश्विक गरीबी में आई कुल कमी का लगभग 70 फीसदी योगदान चीन का रहा।
चीन का उदाहरण इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उसने अपनी आर्थिक और सामरिक शक्ति का वैश्विक मंच पर प्रदर्शन किया है। आज जब दुनिया का शक्ति-संतुलन बदल रहा है, तब भारतीय राज्यों के चुनाव क्या संदेश देते हैं? एक ओर सबको मुफ्त सुविधाएं, दूसरी ओर विश्व शक्ति बनने की आकांक्षा। कोई भी देश उसके राज्यों और नागरिकों से मिलकर बनता है। चुनावी मुद्दे ही उसकी दिशा तय करते हैं।
अमेरिका के साथ शुल्क समझौते पर अंतिम मुहर लगने की तैयारी है। कृषि क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। वहीं कमजोर तबके को रोजगार देने वाली योजनाओं के संसाधन सीमित हैं। पूरी दुनिया की नजर भारत के बाजार पर है और सवाल यह है कि हमारी राजनीति देश की जनसंख्या को किस दिशा में ले जा रही है।
हाल तक आम जनता चीनी उत्पादों के बहिष्कार की बात करती थी। आज स्थिति यह है कि एक महंगे विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान चीन के रोबोट को अपना बताने की घटना से देश की साख पर सवाल उठते हैं।
मुख्यमंत्री पहले मुफ्त तोहफे देते हैं, फिर कर्ज लेकर राज्य चलाते हैं। आखिर कर्ज लेकर कब तक सत्ता चलाई जा सकती है? कई राज्यों में चुनाव आने वाले हैं। राजनीतिक दलों से अपील है कि स्वयं भी काम करें और जनता को भी काम करने दें। देश की जनता को भी तय करना होगा कि उसका कल्याण स्थायी आर्थिक सशक्तीकरण में है या सिर्फ योजनाओं का लाभार्थी बने रहने में।
यह भी पढ़ें- ‘सुबह से शाम मुफ्त खाना-बिजली मिलने से काम करने की भावना कम होगी’, सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु बिजली बोर्ड को कड़ी फटकार लगाई है। तमिलनाडु बिजली बोर्ड उपभोक्ताओं को मुफ्त बिजली देने की बात कर रहा था। ऐसे ही एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस पर नाराज़गी जताई कि राज्य मुफ्त सुविधाएं देने का काम कर रहे हैं, जिससे आर्थिक विकास प्रभावित हो सकता है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
