आज जब भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, तो इन चमकदार आंकड़ों के समांतर खड़ा आर्थिक असमानता का सच चिंताजनक है। यह एक गहरा विरोधाभास है कि जहां एक तरफ वैश्विक स्तर पर भारत की साख बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ देश के भीतर अमीर और गरीब के बीच की खाई ऐतिहासिक रूप से चौड़ी हो गई है। विकास का मूल्यांकन केवल जीडीपी की वृद्धि दर से करना बेमानी है, क्योंकि यह आंकड़ा संपत्ति के वितरण की नहीं, बल्कि औसत आय की तस्वीर पेश करता है। जमीनी सच्चाई यह है कि देश की बढ़ती संपदा का एक बड़ा हिस्सा मुट्ठी भर अति-धनाढ्यों की तिजोरियों में जा रहा है, जबकि श्रमशक्ति का एक विशाल वर्ग आज भी जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए संघर्षरत है। यह असमानता केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस समावेशी विकास के दावों पर एक गंभीर सवाल है, जो हमारे लोकतंत्र का आधार है।

इस असमानता का सबसे भयानक रूप हमें कोविड महामारी के बाद के समय में देखने को मिला। वह एक ऐसा दौर था जब पूरी दुनिया रुक गई थी, लेकिन संपत्ति का खेल नहीं रुका। एक तरफ लाखों मध्य और निम्न-वर्गीय परिवारों की जमा-पूंजी इलाज, प्राणवायु और बेरोजगारी की भेंट चढ़ गई। करोड़ों लोग, जो अपनी मेहनत से गरीबी रेखा से ऊपर आ चुके थे, वापस उसके नीचे धकेल दिए गए। छोटे व्यापार बंद हो गए, नौकरियां चली गईं और प्रवासी मजदूरों की दर्दनाक तस्वीरें हमारे सामूहिक विवेक को झकझोर गईं।

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दूसरी तरफ, ठीक इसी कालखंड में देश के शीर्ष उद्योगपतियों की संपत्ति में ऐतिहासिक और अकल्पनीय वृद्धि दर्ज की गई। जब आम आदमी कर्ज की मासिक किस्तें चुकाने के लिए संघर्ष कर रहा था, तब शेयर बाजार कुलांचे भर रहा था। अर्थशास्त्रियों ने इसे ‘विषम सुधार’ का नाम दिया। यह एक ऐसी स्थिति थी, जहां अर्थव्यवस्था दो विपरीत दिशाओं में बंट गई। एक तरफ संगठित और अमीर वर्ग ऊपर की ओर बढ़ रहा था, दूसरी तरफ असंगठित और गरीब वर्ग रसातल में जा रहा था।

जब एक आम आदमी महंगाई की मार से त्रस्त होकर अपनी थाली से सब्जियां और दाल कम करने पर मजबूर होता है और उसी वक्त देश में महंगी गाड़ियों तथा विलासिता की वस्तुओं की बिक्री के नए कीर्तिमान बनते हैं, तो यह समझ लेना चाहिए कि समाज का संतुलन बिगड़ चुका है। इस असंतुलन की जड़ें हमारी नीतियों और कर-प्रणाली में भी गहरी धंसी हुई हैं। पिछले कुछ दशकों में उदारीकरण के नाम पर हमने जिस पूंजीवादी ढांचे को अपनाया, उसका मूल मंत्र था- ‘रिसाव का सिद्धांत’। यह माना गया था कि अगर हम ऊपर के लोगों और बड़े निगमित ढांचों को समृद्ध करेंगे, उन्हें करों में छूट देंगे, तो वे निवेश करेंगे और उसका लाभ रिस-रिस कर रोजगार तथा वेतन के रूप में नीचे तक पहुंचेगा।

मजबूत जीडीपी वृद्धि, लेकिन विकास की पूरी तस्वीर अभी बाकी

इसके विपरीत संपत्ति का जमावड़ा ऊपर ही रुक गया और नीचे केवल बूंदें ही पहुंचीं। मुनाफे का उपयोग पुनर्निवेश और रोजगार सृजन के बजाय वित्तीय बाजारों में सट्टेबाजी और निजी संपत्ति बढ़ाने में किया गया।

हमारी कर प्रणाली, विशेष रूप से ‘वस्तु एवं सेवा कर’ यानी अप्रत्यक्ष करों का ढांचा, इस आग में घी डालने का काम करता है। अप्रत्यक्ष कर अपनी प्रकृति में प्रतिगामी होते हैं, क्योंकि वे गरीब और अमीर पर लगभग एक समान बोझ डालते हैं। आंकड़े बताते हैं कि कर संग्रह का बड़ा हिस्सा निचले और मध्य वर्ग की जेब से आता है। इसके साथ ही बड़े औद्योगिक घरानों को दी जाने वाली लाखों-करोड़ों रुपए की कर छूट और कर्ज माफी को अक्सर अर्थव्यवस्था के लिए ‘प्रोत्साहन’ का नाम दिया जाता है।

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दूसरी ओर, जब किसानों की कर्ज माफी, वृद्धावस्था पेंशन या गरीबों के लिए राशन की बात आती है, तो उसे ‘मुफ्त की रेवड़ी’ कहकर अपमानित किया जाता है। यह दोहरा मापदंड देश की अर्थव्यवस्था और समाज में असंतुलन का कारण बनता है। असमानता का यह जहर सिर्फ बैंक खातों और आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह धीरे-धीरे समाज की नसों में उतर कर ‘अवसरों की समानता’ को भी खत्म कर देता है।

इसका सबसे ज्यादा और दूरगामी असर शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। एक लोकतांत्रिक देश में अच्छी शिक्षा और बेहतर इलाज हर नागरिक का मौलिक अधिकार होना चाहिए, न कि केवल उन लोगों का विशेषाधिकार जो इसे खरीद सकें। लेकिन आज जमीनी हकीकत यह है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं आम लोगों के लिए एक महंगा सौदा बन चुकी हैं। जब एक गरीब परिवार का प्रतिभाशाली बच्चा केवल संसाधनों, अतिरिक्त शिक्षण और अच्छी किताबों के अभाव में उच्च शिक्षा से वंचित रह जाता है, तो देश केवल एक व्यक्ति का भविष्य नहीं खोता, बल्कि अपनी एक संभावना को खो देता है।

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इतिहास गवाह है कि जब धन का अत्यधिक संकेंद्रण होता है, तो सत्ता और राजनीति भी उसी धन के प्रभाव में आ जाती है। ऐसे में नीतियां आम जनता, किसान और मजदूर के हितों को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि बड़े औद्योगिक घरानों के मुनाफे को सुरक्षित करने के लिए बनाई जाने लगती हैं। आज चुनाव, जो लोकतंत्र का उत्सव माने जाते हैं, इतने महंगे हो गए हैं कि एक सामान्य नागरिक के लिए इसमें भाग लेना तो दूर, इसके बारे में सोचना भी मुश्किल है। राजनीतिक दलों का बड़े चंदे पर निर्भर होने से यह संभावना ज्यादा होती है कि चुनाव जीतने के बाद उनकी वफादारी जनता के प्रति कम और चंदा देने वालों के प्रति अधिक होगी। यह ‘पूंजीवाद’ का वह दौर है, जहां बाजार और सरकार के बीच की रेखा धुंधली नजर आती है।

हमें ग्रामीण भारत की स्थिति पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, जहां आज भी देश की बहुसंख्यक आबादी निवास करती है। शहरों में चमकती गगनचुंबी इमारतें, द्रुतगामी रेल, चौड़े राजमार्ग और बड़े बाजार एक अलग कहानी कहते हैं, जबकि गांवों में पसरा सन्नाटा और मायूसी दूसरी कहानी बयां करती है। खेती, जो कभी सम्मान का पेशा थी, आज घाटे का सौदा बनकर रह गई है। खाद, बीज और ईंधन की लागत बढ़ रही है, लेकिन फसल का उचित ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ नहीं मिल पा रहा है। गांवों से शहरों की ओर हो रहा लोगों का अनियंत्रित पलायन इसी आर्थिक मजबूरी का परिणाम है। यह पलायन शहरों के बुनियादी ढांचे पर भी दबाव डाल रहा है और एक नए तरह के शहरी वर्ग-संघर्ष को जन्म दे रहा है।

तकनीक और वैज्ञानिक क्रांति ने भी अनजाने में ही सही, असमानता की एक नई परत जोड़ दी है। इसे ‘तकनीकी खाई’ या ‘डिजिटल विभाजन’ कहा जा रहा है। आज की दुनिया में सूचना ही शक्ति है, और यह शक्ति उनके पास है, जिनके पास आधुनिक संचार यंत्र, संगणक और तीव्र गति वाली इंटरनेट सुविधाएं हैं। ऐसे में सबसे पहले हमें विकास की अपनी परिभाषा को बदलना होगा। सकल घरेलू उत्पाद से आगे बढ़कर हमें ‘मानव विकास’, ‘खुशहाली’ और ‘असमानता के स्तर’ को प्रगति का मुख्य पैमाना बनाना होगा। स्वास्थ्य और शिक्षा पर सरकारी खर्च को एक बड़े हिस्से तक बढ़ाना होगा। साथ ही कर प्रणाली में भी सुधार करना होगा। रोजगार के मोर्चे पर हमें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को प्रोत्साहन देना होगा। उचित न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करना और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। हमें एक ऐसे समतामूलक समाज का निर्माण करना होगा, जहां हर किसी को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार हो?