शैक्षिक परिदृश्य में विश्व तेजी से परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। प्रत्येक देश प्राथमिक शिक्षा को बेहतर बनाने का प्रयास करता है, क्योंकि मजबूत नींव ही बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकती है। विश्व के सभी देश यह सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं कि उनकी शिक्षा व्यवस्था की नींव सुदृढ़ हो। भारत ने वर्ष 2015 में अपनाए गए सतत विकास एजेंडा-2030 के अंतर्गत सभी के लिए समावेशी और समान गुणवत्तायुक्त शिक्षा सुनिश्चित करने तथा जीवनपर्यंत शिक्षा के अवसरों को बढ़ावा देने का लक्ष्य निर्धारित किया था। नई शिक्षा नीति में भी इस लक्ष्य को प्रमुखता दी गई है। इसके लिए संपूर्ण शिक्षा प्रणाली को पुनर्गठित कर अधिगम को प्रभावी बनाने की आवश्यकता होगी।

अगर भारत वास्तव में 2030 तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लक्ष्य प्राप्त करना चाहता है, तो उसे सबसे पहले प्राथमिक शिक्षा पर विशेष ध्यान देना होगा। विडंबना यह है कि वर्ष 2026 तक भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पूरी तरह लागू नहीं हो सकी है। नई शिक्षा नीति में दावा किया गया था कि सभी विद्यार्थियों को, चाहे उनका निवास स्थान कहीं भी हो, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराई जाएगी। इसके साथ ही हाशिये पर रह रहे समुदायों, वंचित तथा अल्प-प्रतिनिधित्व वाले समूहों पर विशेष ध्यान देने का संकल्प भी लिया गया था। वास्तव में प्राथमिक शिक्षा उन्हीं बच्चों के लिए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है, जो किसी कारणवश विद्यालय की चौखट तक नहीं पहुंच पाते।

शिक्षा पर सभी का समान अधिकार है, लेकिन सरकारें शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए अधिकतर उच्च प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा पर ही ध्यान केंद्रित करती रही हैं। स्वतंत्रता के बाद प्राथमिक शिक्षा को अपेक्षित महत्त्व नहीं मिल पाया। प्राथमिक शिक्षा के अध्यापकों और विद्यार्थियों की समस्याओं की ओर भी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया। जबकि किसी भी देश की वास्तविक नींव उसके बच्चे होते हैं। अगर यह नींव कमजोर होगी, तो पूरा देश कमजोर होगा।

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नींव मजबूत होगी, तो बीच में स्कूली पढ़ाई छोड़ने की दर अपने आप कम होगी और भविष्य अधिक सशक्त बनेगा। एक बेहतर और बौद्धिक रूप से विकसित राष्ट्र के लिए ऐसी शैक्षणिक संस्थाओं का होना आवश्यक है, जहां प्रत्येक विद्यार्थी का स्वागत हो, उसकी देखभाल की जाए, उसे सुरक्षित तथा प्रेरणादायक वातावरण मिले। ऐसी संस्थाओं को सभी आवश्यक बुनियादी ढांचे और उपयुक्त संसाधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

शिक्षा के मूलभूत सिद्धांत केवल उच्च स्तर पर ही सुनिश्चित नहीं होने चाहिए, बल्कि प्राथमिक शिक्षा तथा अभिभावकों को भी बच्चों की क्षमताओं के प्रति संवेदनशील बनाया जाना चाहिए। बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा बच्चों के सीखने की नींव होती है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि बच्चों के मस्तिष्क का लगभग नब्बे फीसद विकास छह वर्ष की आयु से पहले हो जाता है। इसलिए बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए गुणवत्तापूर्ण प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा आवश्यक है, जो आज भी करोड़ों बच्चों के लिए दूर की कौड़ी बनी हुई है।

भारत में प्राथमिक शिक्षा और उसकी देखभाल के लिए नई शिक्षा नीति में संकल्प तो लिए गए, लेकिन उनका ढांचा खड़ा नहीं हो पाया है। यह परिकल्पना की गई थी कि पांच वर्ष की आयु से पहले प्रत्येक बच्चा बालवाटिका या प्रारंभिक कक्षा से जुड़ जाएगा, जहां प्रशिक्षित ईसीसीई शिक्षक खेल-आधारित शिक्षा के माध्यम से बच्चों में संख्यात्मक, भावनात्मक और शारीरिक क्षमताओं के साथ प्रारंभिक साक्षरता एवं संख्या ज्ञान विकसित करेंगे। यह परिकल्पना सही मायनों में प्रारंभ भी नहीं हो सकी है। जहां बालवाटिकाएं बनाई जा रही हैं, वहां प्रशिक्षित शिक्षक नहीं हैं और कई स्थानों पर शिक्षकों की नियुक्ति केवल औपचारिकता बनकर रह गई है।

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सरकारें प्राथमिक शिक्षा को अक्सर इस दृष्टि से देखती हैं कि बच्चा घर से ही स्वाभाविक रूप से तैयार होकर विद्यालय आएगा, जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है। सरकार को समय रहते गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा का एक प्रभावी ढांचा विकसित करना होगा। ईसीसीई शिक्षकों का अलग प्रारंभिक वर्ग तैयार करना आवश्यक है। बच्चों के शैक्षणिक विकास के साथ-साथ उनके स्वास्थ्य की नियमित निगरानी और जांच की भी व्यवस्था होनी चाहिए। बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान सीखना प्रत्येक विद्यार्थी के लिए अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यही आगे की स्कूली शिक्षा और जीवनपर्यंत सीखने की आधारशिला है।

वर्तमान में प्राथमिक विद्यालयों में बड़ी संख्या में ऐसे विद्यार्थी हैं, जिनकी अनुमानित संख्या पांच करोड़ से अधिक बताई गई है, जो बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान तक प्राप्त नहीं कर सके हैं। जब तक प्राथमिक शिक्षा पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक बच्चों में सामान्य लेख पढ़ने, समझने और अंकों के साथ बुनियादी जोड़-घटाव करने की क्षमता विकसित नहीं हो सकेगी।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने वर्ष 2025 तक प्राथमिक विद्यालयों में सार्वभौमिक मूलभूत साक्षरता और संख्या ज्ञान प्राप्त करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन वर्ष 2026 तक भी यह अभियान प्रभावी रूप से प्रारंभ नहीं हो पाया है। सीखने की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा किए बिना शिक्षा नीति के अन्य लक्ष्य अप्रासंगिक सिद्ध होंगे। इसलिए सरकार को प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए तत्काल प्रभाव से ठोस क्रियान्वयन योजना तैयार करनी चाहिए। सरकारों को चाहिए कि वे सबसे अधिक ध्यान प्राथमिक शिक्षा पर केंद्रित करें और भारत की इस मूलभूत नींव को गुणवत्तापूर्ण प्रबंधन के माध्यम से मजबूत बनाएं।

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