देश भर में जंगलों में आग लगना अब एक सामान्य घटना बन चुकी है। इससे न केवल प्राकृतिक संपदा नष्ट हो रही है, बल्कि वन्य जीवों, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को भी भारी नुकसान हो रहा है। जंगलों में आग लगने की घटनाएं चिंताजनक रूप से बढ़ी हैं। जलवायु परिवर्तन, प्रबंधकीय कमियों और मानवीय लापरवाही के कारण यह समस्या जटिल होती जा रही है।

हालात को देखते हुए वनों को बचाने के लिए अब सजगता के साथ ठोस कदम उठाने की जरूरत है। इंडिया स्टेट आफ फारेस्ट रपट (आइएसएफआर)-2023 के अनुसार, देश में कुल वन और वृक्ष आवरण यहां के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 25.17 फीसद है। ‘स्टेट आफ वाइल्ड फायर्स’ की रपट से पता चलता है कि जंगलों में वर्ष 2000 से 2019 के बीच आग लगने की घटनाएं दस गुना तक बढ़ी हैं।

वर्ष 2024-25 में उत्तर प्रदेश जंगल में आग की घटनाओं के मामले में सबसे अधिक प्रभावित रहा। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पंजाब भी इससे काफी प्रभावित हुए। हिमालयी क्षेत्रों में चीड़ के विशाल वन सुईनुमा सूखी पत्तियों के कारण शीघ्र ही आग पकड़ लेते हैं। ये पत्तियां सूखने के बाद बेहद ज्वलनशील हो जाती हैं। इनमें तेल की मात्रा अधिक होती है, जो आग में घी का काम करती हैं।

मध्य भारत विशेषकर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओड़ीशा और महाराष्ट्र में साल और बांस के जंगल मुख्य रूप से शुष्क मौसम (फरवरी से जून) में आग की चपेट में आ जाते हैं। यह हर वर्ष की समस्या है। यहां सबसे भीषण आग अप्रैल और मई के महीनों में लगती है। दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के वन भी आग से अछूते नहीं हैं। इसी तरह असम, मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड, मेघालय और त्रिपुरा के वन भी संवेदनशील हैं।

इन दिनों देश भर में भीषण गर्मी और लू के कारण लोग बेहाल हैं। वहीं जंगल भी प्रभावित हुए हैं। देश के एक दर्जन राज्यों में कई जंगल आग की चपेट में हैं। उपग्रहों से मिले आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के जंगलों में बड़े पैमाने पर आग लगने के मामले सामने आए हैं। उत्तराखंड और तमिलनाडु से जंगलों में आग लगने की खबरें आ रही हैं। तमिलनाडु में नीलगिरि जिले तथा उससे लगे मुदुमलई, कोयंबटूर और इरोड के जंगल आग से जूझ रहे हैं।

आग ने इतना विकराल रूप ले लिया कि वायुसेना की मदद की जरूरत पड़ गई। असम और मणिपुर के जंगल भी आग से धधक रहे हैं। पूर्वोत्तर के जंगलों में आग लगने की अधिक आशंका रहती है।

वर्ष 2025 की पर्यावरण लेखांकन रपट और दूसरी रपटों के अनुसार, भारत में जंगलों में आग गंभीर समस्या बनी हुई है। आंकड़ों के अनुसार, नवंबर 2024 से जून 2025 की अवधि के दौरान आग लगने के अनेक मामले सामने आए। सुओमी नेशनल पोलर-आर्बिटिंग पार्टनरशिप (एसएनपीपी) उपग्रह पर लगे वीआइआइआरएस सेंसर के जरिए ये आंकड़े एकत्र किए गए थे। आग लगने की घटनाओं के कारण वन क्षेत्र प्रभावित हो रहा है।

इसके अलावा, हाल के अध्ययनों में यह भी बताया गया है कि वर्ष 2024-25 के दौरान जंगलों की आग से भारत में करीब डेढ़ करोड़ लोग प्रभावित हुए हैं। वैश्विक स्तर पर भी वर्ष 2024 में कनाडा और अमेरिका में लाखों वर्गकिलोमीटर में फैले जंगल राख हो गए।

भारत में जंगल में आग लगने के नब्बे फीसद से ज्यादा मामले मानवजनित हैं। किसान फसल अवशेष जला कर खेत तैयार करते हैं, जिसकी चिनगारी जंगल तक पहुंच जाती है। महुआ, तेंदू पत्ता और जड़ी-बूटियों की अवैध कटाई के बाद आग लगा कर साक्ष्य मिटाने की प्रवृत्ति भी आम है। पर्यटक और चरवाहे जलती माचिस की तीली, बीड़ी या सिगरेट फेंक देते हैं। धार्मिक अनुष्ठानों या शिकार के लिए भी आग लगाने का प्रचलन है, जो अनियंत्रित हो जाती है।

जंगलों में आग की बढ़ती घटनाएं जलवायु परिवर्तन से भी जुड़ी हैं। गर्मियों का मौसम लंबा हो गया है, वर्षा अनियमित है और तापमान रेकार्ड स्तर पर पहुंच रहा है। जलवायु परिवर्तन ने शुष्क मौसम को तीन महीने लंबा कर दिया है। कम आर्द्रता, तेज हवाएं और उच्च तापमान से आग भड़कती है। चीड़ और यूकेलिप्टस जैसे पेड़ों की पत्तियों से भी आग बेकाबू होती है।

जंगल की आग से जैव विविधता नष्ट होती है। हजारों पेड़-पौधे जल जाते हैं। पशु-पक्षी मारे जाते हैं। मिट्टी का कटाव बढ़ने से जलाशय दूषित होते हैं और बाढ़ का खतरा पैदा होता है। कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है, जो वैश्विक ताप को तेज करता है। नए वैश्विक अध्ययनों से सामने आया है कि जंगलों की आग हर साल औसतन 14.3 करोड़ टन जहरीले प्रदूषक छोड़ रही है। इससे गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है और जलवायु परिवर्तन की चुनौती और भी जटिल हो रही है।

‘एनवायरमेंटल साइंस एंड टेक्नोलाजी’ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, जंगलों की आग पहले के अनुमानों से कहीं ज्यादा मात्रा में हानिकारक गैसें और कार्बनिक यौगिक वातावरण में छोड़ रही है। इस आग से निकलने वाले धुएं में सिर्फ कार्बन डाइआक्साइड ही नहीं, बल्कि कई ऐसे कार्बनिक यौगिक भी होते हैं, जो ज्यादा खतरनाक हैं।

आग से पर्यावरण तो प्रभावित होता ही है, भारी आर्थिक नुकसान भी होता है। वनवासी ज्यादा प्रभावित होते हैं। धुआं फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है, कैंसर और हृदय रोग बढ़ाता है। आग पर काबू पाने के लिए आवश्यक संसाधनों की कमी भी नजर आती है, जिससे आग फैल जाती है। एक ओर वन विभाग में कर्मचारियों की कमी है, तो दूसरी ओर पुराने उपकरणों और समन्वय के अभाव की वजह से आग को नियंत्रित मुश्किल हो जाता है। बजट की कमी से अग्निशमन यंत्र, वाहन और प्रशिक्षण का कार्य प्रभावित होता है।

‘फायर लाइंस’ बनाने पर भी खास ध्यान नहीं दिया जा रहा। गौरतलब है कि इसे बनाने के लिए सूखी वनस्पतियां और घास जैसी सामग्री हटाई जाती है। खाइयां और रास्ते भी बनाए जाते हैं। इससे आग का फैलाव रोकने में काफी मदद मिलती है।

आग के जोखिम को बढ़ाने वाली कई गतिविधियां लोगों की रोजी-रोटी और पुरानी प्रथाओं से भी जुड़ी हुई हैं। इसलिए बिना उपयुक्त विकल्पों के उन्हें खत्म नहीं किया जा सकता। इस पक्ष पर खास ध्यान देने की जरूरत है। जंगल की आग को प्रबंधित करने के लिए ठोस योजना जरूरी है। दूसरे देशों में जंगल की आग रोकने और बचाव के उपाय बहुआयामी हैं। वहां तकनीक, समुदाय भागीदारी और नीतिगत प्रयासों पर जोर दिया जा रहा है।

अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ ने आग की तीव्रता से निपटने के लिए नवीन रणनीतियां अपनाई हैं। भारत को भी इन देशों से सीख लेकर वनों को आग से बचाने के लिए मजबूत योजना बनानी होगी। बेहतर प्रबंधन के लिए बजट बढ़ाने के साथ कृत्रिम मेधाऔर ड्रोन तकनीक का उपयोग करना आवश्यक है। वनों से जुड़े समुदायों को साथ लेकर इस योजना पर काम करना होगा। मानदेय देकर उनका उत्साह बढ़ाया जा सकता है। इंसानी गतिविधियां और लापरवाही जंगल की आग के लिए ज्यादा जिम्मेदार है। इसलिए लोगों को जागरूक करने पर ध्यान देने की जरूरत है। वनों को आग से बचाना हम सभी के हित में है।