नेपाल की आपदा से इतर भारत में बाढ़ इस साल भी असम, केरल, हिमाचल, ओडिशा और जम्मू-कश्मीर आदि जगहों पर आफत बन कर आई। अब तक जो आकलन किया गया है, उसके मुताबिक सैकड़ों लोगों की जान गई है। हजारों की संख्या में मवेशी मारे गए हैं। लाखों हेक्टेयर फसल बर्बाद हुई है। लाखों परिवार प्रभावित हुए हैं। वहीं, सैकड़ों सड़कें, पुल, मकान और बाग-बगीचे पूरी तरह नष्ट हो गए हैं। अब प्रशासन के सामने बाढ़, भूस्खलन और अतिवृष्टि की वजह से हुई बर्बादी के बाद अलग-अलग स्तर की कई चुनौतियां सामने हैं। सबसे ज्यादा चुनौतियां असम में दिख रही हैं। वहां राहत के बाद पुनर्वास एक बड़ा संकट है। पीड़ित परिवारों को भुखमरी से बचाना जरूरी है। स्कूल छोड़ने वाले छात्र-छात्राओं की शिक्षा नियमित करना भी बड़ी चुनौती है।
दरअसल, बाढ़ के बाद असली परीक्षा राज्य सरकारों, आपदा प्रबंधन विभाग और बाढ़ पीड़ितों की होती है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रभावित नागरिकों, खासकर जिनके मकान और खेत-खलिहान पूरी तरह नष्ट हो गए होते हैं, उनके लिए स्थायी पुनर्वास और भुखमरी से बचाने की होती है। असम, ओडिशा, केरल, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में हजारों गिरे मकानों को फिर से बना कर लोगों के लिए तत्काल भोजन, पानी-बिजली और अन्य जरूरी चीजों की बेहतर व्यवस्था करना सरकार के लिए किसी कड़ी परीक्षा से कम नहीं है।
केंद्र और राज्य सरकारें आपदा राहत के लिए मुख्यतः राज्य आपदा मोचन बल (एसडीआरएफ) और जरूरत पड़ने पर राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) की मदद लेती हैं, लेकिन इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती यह है कि राहत का काम अपेक्षाकृत तेजी से कैसे हो, जबकि स्थायी पुनर्वास में क्षति का सर्वेक्षण, पात्र परिवारों की पहचान, मुआवजा, बुनियादी ढांचे की पुनर्बहाली में समय अधिक लगने से परिवारों को भुखमरी और दूसरी समस्याओं को कम समय में उचित समाधान करने की चुनौती बनी रहती है। इसलिए बेहतर बाढ़ प्रबंधन नए दौर की जरूरत है।
इस बार मानसून ने असम से लेकर हिमाचल प्रदेश, केरल और ओडिशा जैसे सबसे ज्यादा बाढ़ प्रभावित राज्यों तक यह सवाल फिर सामने रखा है कि क्या हम हर साल बाढ़ आने पर राहत शिविर और मुआवजा देने तक सीमित रहेंगे या ऐसी कोई व्यवस्था बनाएंगे जिसमें बाढ़ के बाद प्रभावित परिवारों को स्थायी रूप से सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनाया जा सके। सवाल यह भी है कि स्थायी पुनर्वास और आत्मनिर्भर बनाने वाली नीति को पारदर्शी तरीके से लागू करना और उस पर अमल करवाना क्या संभव है? यह सवाल इसलिए उठा है कि पिछले वर्षों में बाढ़ प्रभावित लोग महीनों तक दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर हुए थे। इस साल भी हजारों परिवारों के सामने पुनर्वास की विकट समस्या है। इसके अलावा, सड़क, बिजली, पेयजल, सिंचाई, स्कूल और आंगनबाड़ी जैसी परिसंपत्तियों की पुनर्बहाली जैसी समस्याएं हैं, जिन्हें हल करना बेहद जरूरी है।
बाढ़ पीड़ितों के लिए स्थायी पुनर्वास और भविष्य में बाढ़ से जोखिम कम करने की चुनौती राज्य सरकारों के सामने होती है, लेकिन हर साल ये समस्याएं उसी रूप में बनी रहती हैं। इसलिए अतिवृष्टि और बाढ़ आने पर लोगों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है। ऐसे में जरूरी है कि ऐसा बाढ़ नियंत्रण ढांचा तैयार किया जाए, जिससे विकट बाढ़ और बरसात में लोगों को कम से कम परेशानी का सामना करना पड़े, जैसे जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों में देखने में आता है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, असम में इस साल बाढ़ की वजह से सबसे ज्यादा जान-माल और बुनियादी ढांचे का नुकसान हुआ है। इस साल अब तक सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। 10,748.64 हेक्टेयर फसल क्षेत्र जलमग्न हो चुका है। 47,000 से अधिक मवेशी बाढ़ में बह गए या भूख से मर गए। असम सरकार के मुताबिक, इस साल 12 अगस्त तक बाढ़ और अतिवृष्टि की वजह से 150 करोड़ का नुकसान हुआ है। सरकार का अनुमान है कि इस साल बाढ़ के बाद राहत और पुनर्वास में एक हजार करोड़ से अधिक खर्च हो सकता है। राज्य सरकार के मुताबिक, यह आंकड़ा और भी बढ़ सकता है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि असम को इस साल अतिवृष्टि और बाढ़ से कितना नुकसान हुआ है।
हिमाचल प्रदेश में असम से अलग तरह की समस्या है। यहां अचानक आई बाढ़, बादल फटने, भूस्खलन और पहाड़ी ढलानों के टूटने से तबाही मची। तीस जून से 11 अगस्त तक हुए नुकसान के जो आंकड़े राज्य प्रशासन ने उपलब्ध कराए हैं, उसके मुताबिक 70 से अधिक लोगों की मौत हुई है। सार्वजनिक संपत्ति में करीब 910.35 करोड़ का नुकसान हुआ। यहां भी अचानक बादल फटने से ढह गए मकानों को फिर से बनवाना एक बड़ी चुनौती होती है, क्योंकि पहाड़ी इलाका होने की वजह से पुनर्वास सहज नहीं होता है।
ओडिशा में बाढ़ और अतिवृष्टि के कारण हर साल की तरह इस साल भी जान-माल का भारी नुकसान हुआ है। 22 जिलों में 1,458 गांवों और 85 प्रखंडों में 8,63,909 मकानों को नुकसान पहुंचा है। राज्य सरकार ने 110 करोड़ की शुरुआती बाढ़ राहत की घोषणा की। यहां फसलों को सबसे अधिक नुकसान हुआ। इसी तरह केरल में बाढ़, भारी बरसात और भूस्खलन से जान-माल का काफी नुकसान हुआ। ऐसे में राहत के बाद स्थायी पुनर्वास और प्रभावित लोगों को हर तरह की मदद की दरकार है। यहां हर साल बाढ़ और अतिवृष्टि से काफी जान-माल का नुकसान होता है, लेकिन पुनर्वास की समस्या यहां भी है। इस पर राज्य सरकार को गौर करने की जरूरत है।
बाढ़, भूस्खलन और अतिवृष्टि के कारण मकानों-मवेशियों और फसलों के नष्ट होने से लोगों पर ऐसी मुसीबत आती है कि प्रभावित क्षेत्रों में कुछ भी दिखाई नहीं देता है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकार की जिम्मेदारी हर स्तर पर बढ़ जाती है। मसलन, किसान की एक गाय या भैंस केवल एक पशु नहीं होती, यह बच्चों के लिए दूध-भोजन, शिक्षा और परिवार के लिए नियमित आय का आधार होती है। इसी तरह फसल का नुकसान केवल एक मौसम की आय का नुकसान नहीं है, किसान की अगली फसल के लिए बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी, पानी के लिए पूंजी का आधार भी है।
आपदा प्रबंधन का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितने लोगों को बचाया गया या कितने राहत शिविर लगाए गए। समग्रता से हर स्तर, हर क्षेत्र और हर व्यक्ति के नुकसान का मूल्यांकन होना चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि असम में राहत और स्थायी पुनर्वास के लिए पूरे दम-खम और ईमानदार इच्छाशक्ति के साथ काम किया जाएगा। बाढ़ का पानी उतरने के बाद राहत के कार्य तेजी से करने की बेहद जरूरत है। यह तभी संभव है जब बाढ़ प्रभावित राज्यों के अधिकारी पूरी संवेदना और ईमानदारी के साथ राहत कार्यों की निगरानी करें।
