भारत में सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता पर चर्चा अक्सर शिकायतों के स्वर में सुनाई देती है, लेकिन उससे अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि उन शिकायतों के बीच समाज किस प्रकार व्यवहार करता है। भारतीय मध्यवर्ग ने एक विशिष्ट रास्ता चुन लिया है। वह व्यवस्था की कमियों से टकराने के बजाय उनसे बच निकलने की कला में दक्ष होता जा रहा है। पेयजल खराब हो, तो घर में जल शुद्धिकरण यंत्र लग जाता है।
बिजली अनियमित हो तो इन्वर्टर व्यवस्था संभाल लेता है। सरकारी विद्यालयों पर भरोसा कम हो, तो निजी शिक्षा की ओर रुख कर लिया जाता है। यह प्रवृत्ति केवल सुविधा का चयन नहीं है। यह एक गहरे सामाजिक अनुबंध का संकेत है, जिसमें सार्वजनिक नागरिक व्यवस्था से दूरी बनाकर अपने लिए अलग रास्ते तैयार कर लिए जाते हैं।
इस व्यवहार को समझने के लिए अर्थशास्त्री अल्बर्ट ओ. हिर्शमैन द्वारा प्रतिपादित विचार अत्यंत प्रासंगिक हैं, जिन्हें उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एग्जिट, वॉइस एंड लॉयल्टी’ (Exit, Voice and Loyalty) में प्रस्तुत किया है। जब किसी संस्था या व्यवस्था की गुणवत्ता गिरती है, तो उसके सदस्य या उपभोक्ता दो प्रमुख प्रतिक्रियाएं देते हैं। एक प्रतिक्रिया होती है व्यवस्था से बाहर निकल जाना, जिसे उन्होंने ‘एग्जिट’ कहा।
दूसरी प्रतिक्रिया होती है उसी व्यवस्था के भीतर रहकर सुधार की मांग करना, जिसे उन्होंने ‘वॉइस’ कहा। उनके विश्लेषण का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि जब ‘एग्जिट’ सरल और सुलभ हो जाता है, तो ‘वॉइस’ कमजोर पड़ जाती है। भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा इसी सिद्धांत का जीवंत उदाहरण पेश करता है।
भारत में ‘एग्जिट’ की यह प्रवृत्ति सार्वजनिक व्यवस्था के लिए एक संरचनात्मक चुनौती बन जाती है। जब मध्यवर्गीय परिवार निजी विकल्पों की ओर बढ़ते हैं, तो वे अनजाने में सार्वजनिक सेवाओं पर निर्भरता कम कर देते हैं। इसके परिणामस्वरूप उन सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने के लिए आवश्यक सामाजिक दबाव घटने लगता है। शहरी भारत में अधिकांश मध्यवर्गीय परिवार जल शुद्धिकरण उपकरणों का उपयोग करते हैं। निजी विद्यालयों में नामांकन पिछले वर्षों में उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। स्वास्थ्य क्षेत्र में नागरिकों द्वारा अपनी जेब से किया जाने वाला व्यय कुल स्वास्थ्य खर्च का आधे से अधिक है।
भारतीय संदर्भ में यह तथ्य स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि जहां निजी समाधान उपलब्ध हैं, वहां नागरिक अपेक्षाकृत शांत रहते हैं, लेकिन जहां निजी विकल्प संभव नहीं हैं, वहां असंतोष मुखर हो उठता है। सड़कें खराब हों या वायु प्रदूषण बढ़ जाए, ऐसे मुद्दों पर विरोध अधिक दिखाई देता है, क्योंकि इन समस्याओं से व्यक्तिगत स्तर पर बाहर निकलना संभव नहीं है। अंतरराष्ट्रीय अनुभव इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण संकेत प्रदान करते हैं।
स्वीडन और नार्वे जैसे देशों ने सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को इस स्तर तक सुदृढ़ किया है कि अधिकांश नागरिक उन्हीं पर निर्भर रहते हैं। सिंगापुर ने आवास और शहरी ढांचे के क्षेत्र में ऐसी सार्वजनिक व्यवस्था विकसित की है, जिसमें बड़ी आबादी सरकारी योजनाओं के अंतर्गत रहती है। ब्रिटेन में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा व्यापक रूप से नागरिकों की पहली पसंद बनी हुई है।
इन उदाहरणों में एक समान तत्त्व दिखाई देता है कि सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता इतनी विश्वसनीय है कि उनसे बाहर निकलने की आवश्यकता सीमित हो जाती है।
भारत में स्थिति भिन्न है, क्योंकि यहां निजी समाधान आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। यह परिस्थिति एक प्रकार की मौन सहमति को जन्म देती है, जिसमें नागरिक अपनी समस्याओं का समाधान खुद ढूंढ़ लेते हैं और राज्य पर सुधार का दबाव सीमित हो जाता है। हिर्शमैन ने अपनी पुस्तक में यह संकेत दिया था कि अगर किसी व्यवस्था में वफादारी का तत्त्व कमजोर हो जाए, तो ‘एग्जिट’ की प्रवृत्ति बढ़ जाती है।
भारतीय संदर्भ में सार्वजनिक संस्थाओं के प्रति विश्वास का क्षरण इसी दिशा की ओर संकेत करता है। जो लोग निजी समाधान वहन कर सकते हैं, वे अपेक्षाकृत सुविधाजनक जीवन जीते हैं, जबकि जो ऐसा नहीं कर सकते या जिनके पास विकल्प नहीं होता, वे उसी सार्वजनिक व्यवस्था में फंसे रहते हैं, जिसकी गुणवत्ता लगातार गिरती जाती है।
इस प्रकार ‘एग्जिट’ केवल व्यक्तिगत राहत का माध्यम नहीं रह जाता। वह सामाजिक विभाजन को भी गहरा करता है। इस परिदृश्य में एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उभरता है कि समाधान किस दिशा में खोजा जाए। क्या सार्वजनिक व्यय बढ़ाना पर्याप्त होगा या नागरिकों के व्यवहार में भी परिवर्तन आवश्यक है।
हिर्शमैन के अनुसार किसी भी व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए आवश्यक है कि ‘वॉइस’ को प्रोत्साहित किया जाए और ‘एग्जिट’ को इस प्रकार संतुलित किया जाए कि वह ‘वॉइस’ को निष्प्रभावी न कर दे। इसका अर्थ यह है कि निजी विकल्पों को समाप्त किए बिना सार्वजनिक सेवाओं को सक्षम बनाया जाए।
भारत के संदर्भ में यह एक गहरी मानसिकता परिवर्तन की मांग करता है। जब तक नागरिक सार्वजनिक समस्याओं को निजी साधनों से टालने को ही समाधान मानते रहेंगे, तब तक व्यवस्था में सुधार की प्रक्रिया धीमी रहेगी। किसी समाज की वास्तविक प्रगति उसकी सार्वजनिक संस्थाओं की गुणवत्ता में परिलक्षित होती है, न कि उसके निजी समाधानों की संख्या में।
जब सुधार या बदलाव की मांग कमजोर पड़ती है, तो लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व भी क्षीण होने लगता है। इसलिए आवश्यक है कि भारतीय समाज इस संतुलन को स्थापित करे, जहां व्यक्तिगत सुविधा के साथ-साथ सामूहिक उत्तरदायित्व का भी समान महत्त्व हो। तभी सार्वजनिक समस्याओं के स्थायी समाधान की दिशा में वास्तविक प्रगति संभव हो सकेगी।
