Lonely Senior Citizens: माता-पिता जब बच्चे को बड़ा करते हैं, तो उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि आगे चलकर बच्चा उनके लिए क्या करेगा। उनकी चिंता यह होती है कि बच्चे को वह सब मिल जाए, जो वे उसे देना चाहते हैं। जो सुविधाएं उन्हें नहीं मिलीं, वे बच्चे को मिलें। जिस रास्ते पर उन्हें मुश्किलें आर्इं, बच्चे के लिए वह रास्ता कुछ आसान हो।

शायद इसी इच्छा ने परिवारों की सोच भी बदली है। दो बच्चों के छोटे परिवार के बाद अब एक-संतान परिवार की धारणा भी इसी बदलाव का हिस्सा है। एक बच्चा हो, तो उसकी पढ़ाई-लिखाई पर अधिक खर्च किया जा सकता है, उसकी पसंद और जरूरतों को समझने के लिए अधिक समय दिया जा सकता है और उसके बेहतर भविष्य की तैयारी की जा सकती है।

एक बच्चे को अधिक अवसर देने की इच्छा आज बहुत-से माता-पिता के फैसलों में दिखाई देती है। इसमें कुछ अस्वाभाविक भी नहीं है। मगर सवाल यह है कि परिवार छोटा होने के साथ क्या बच्चे का अपना संसार भी कुछ छोटा हो जाता है? एक समय घर में भाई-बहन होते थे और रिश्तेदारों की आवाजाही भी बनी रहती थी।

दादा-दादी के पास बैठना, चाचा-चाची से झगड़ना, मामा-मौसी के घर जाना- इन सबका अपना महत्त्व था। बच्चा इन्हीं संबंधों के बीच बड़ा होता था। उसे समझने में ज्यादा समय नहीं लगता था कि हर बात अपनी इच्छा के अनुसार नहीं होती। कभी किसी की सुननी पड़ती थी, कभी अपनी चीज बांटनी पड़ती थी और कभी बिना किसी खास कारण के किसी के काम आना पड़ता था।

एक बच्चे वाले परिवार में माता-पिता का ध्यान स्वाभाविक रूप से उसी पर अधिक रहता है। उसकी पढ़ाई, स्वास्थ्य, पसंद और भविष्य घर की बातचीत का बड़ा हिस्सा बन जाते हैं। कभी-कभी माता-पिता अपनी अधूरी इच्छाओं को भी बच्चे के भविष्य से जोड़ देते हैं। बच्चा सफल होता है तो लगता है जैसे उनकी मेहनत सफल हुई। फिर वही बच्चा बड़ा होकर अपनी राह पर निकलता है।

पढ़ाई के लिए बाहर जाता है, नौकरी दूसरे शहर में मिलती है और फिर अपनी गृहस्थी तथा जिम्मेदारियों में व्यस्त हो जाता है। माता-पिता उसके आगे बढ़ने से खुश होते हैं। आखिर उन्होंने उसे रोकने के लिए तो नहीं पाला था! बच्चों की जिंदगी जितनी फैलती जाती है, कई बार माता-पिता का संसार उतना ही सिमटता जाता है।

फोन है, वीडियो काल है, कभी त्योहार पर मुलाकात हो जाती है। जरूरत हो, तो पैसे भेज दिए जाते हैं। बीमारी में डाक्टर से सलाह भी मिल जाती है। बहुत-सी चीजें आसान हुई हैं। फिर भी उम्र के एक पड़ाव पर शायद इंसान को केवल सुविधा नहीं, किसी अपने की मौजूदगी की जरूरत भी होती है। हाल में एक बुजुर्ग पिता की मृत्यु से जुड़ी एक घटना सामने आई।

उनकी संतानें अपने-अपने जीवन में दूर थीं और अंतिम समय में उनके पास पहुंच पाना संभव नहीं हुआ। आर्थिक मदद और वीडियो काल के जरिए अंतिम विदाई की बात सामने आई। यह घटना एक सवाल छोड़ती है कि क्या रिश्तों की जगह धीरे-धीरे व्यवस्थाएं ले रही हैं? किसी बुजुर्ग की दवा का इंतजाम किया जा सकता है। पैसे भेजे जा सकते हैं।

किसी देखभाल करने वाले को रखा जा सकता है। यह सब जरूरी भी है, लेकिन इन सबके बीच वह व्यक्ति कहां है, जो उसके पास बैठकर उसकी बात सुन सके? बीमारी का खर्च उठाना और बीमारी के समय पास बैठना एक ही बात नहीं है। तकनीक ने दूरियों को कम करने में बहुत मदद की है। आज हजारों किलोमीटर दूर बैठे बच्चे भी अपने माता-पिता को रोज देख सकते हैं, लेकिन स्क्रीन पर दिखाई देने वाला चेहरा और सामने बैठा हुआ व्यक्ति एक जैसा अनुभव नहीं देते।

शायद इसलिए संपर्क बढ़ने के बावजूद अकेलापन हमेशा कम नहीं हुआ है। एकल-संतान परिवारों के संदर्भ में यह बात और महत्त्वपूर्ण हो जाती है। एक बच्चे के लिए माता-पिता बहुत कुछ कर पाते हैं। अपनी आय, समय और ध्यान का बड़ा हिस्सा उसी पर लगा सकते हैं, लेकिन आगे चलकर वही बच्चा अपनी दुनिया में व्यस्त हो जाए, तो माता-पिता के पास अपने भावनात्मक संसार को साझा करने वाले लोग भी कम हो सकते हैं। यह एक बच्चे के होने की समस्या नहीं, बल्कि छोटे होते पारिवारिक दायरे की एक चुनौती है।

जीवन बदल चुका है। लोगों के रहने और काम करने के तरीके बदल गए हैं। मगर रिश्तों का अर्थ शायद इतना नहीं बदला है कि उनमें उपस्थिति की जरूरत ही न रहे। माता-पिता अगर बच्चे को अपना पूरा संसार बना लें, तो उसके दूर जाने पर उनका अकेलापन बढ़ सकता है। उम्र के साथ अपने मित्रों, रुचियों और सामाजिक जीवन को बनाए रखना भी जरूरी है। परिवार जीवन का बड़ा हिस्सा है, पूरा जीवन नहीं। फिर भी बच्चे को स्वतंत्र बनाना और उसे रिश्तों से मुक्त कर देना- इन दोनों में फर्क है।

उसे अच्छी शिक्षा देना जितना जरूरी है, उतना ही यह समझ देना भी जरूरी है कि जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिन्हें सुविधा के हिसाब से नहीं निभाया जाता। परिवार छोटा होना कोई समस्या नहीं। सवाल बस इतना है कि क्या परिवार के छोटा होने के साथ हमारी दुनिया भी इतनी छोटी हो गई है कि उसमें माता-पिता के लिए जगह निकालना मुश्किल पड़ने लगे?

हमने अपने बच्चे को ज्यादा देने के लिए परिवार छोटा किया। शायद अब यह सोचने की बारी है कि हमने उसे दूसरों के लिए जगह बनाना कितना सिखाया। माता-पिता को अपने बच्चों से कोई प्रतिदान नहीं चाहिए।

वे चाहते हैं कि बच्चा अपनी दुनिया बनाए, आगे बढ़े और खुश रहे। बस इतना कि उस दुनिया में उनके लिए कोई कोना ऐसा हो, जहां उम्र बढ़ने पर भी उन्हें अपने होने का एहसास बना रहे। आखिर परिवार छोटा करना हमारी पसंद हो सकती है, लेकिन रिश्तों को छोटा करना हमारी मजबूरी नहीं होना चाहिए।

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तुलना मानव जीवन की सबसे सहज, लेकिन सबसे घातक प्रवृत्तियों में से एक है। संसार में जन्म लेने के साथ ही हम तुलना के समांतर जगत में भी प्रवेश कर जाते हैं। जीवन के लगभग हर पड़ाव पर हमारे हाथ में एक अदृश्य मापनी थमा दी जाती है- ‘तुलना की मापनी’। धीरे-धीरे हम स्वयं को अपने भीतर से नहीं, बल्कि दूसरों के संदर्भ में देखना सीख जाते हैं। पढ़िए पूरी खबर…