इतिहास की परतों को उलटकर देखें तो मरुभूमि की तपती रेत में एक सिसकी सुनाई देती है, जिसे समय ने एक अजीबोगरीब रिवाज की शक्ल दी। यह महज एक पेशा नहीं था, बल्कि सामंती समाज के उस खोखलेपन का दस्तावेज था, जहां ऊंची हवेलियों में औरतों को सलीके से रोने की छूट नहीं थी। पुराने समय में जब किसी रसूखदार की मृत्यु होती, तो काले लिबास में लिपटी कुछ स्त्रियां जिस तरह रोती थीं, वह दरअसल उस इंसान के लिए नहीं, बल्कि उस खोखली प्रतिष्ठा के लिए होता था, जिसे समाज ने ओढ़ रखा था। इतिहास गवाह है कि जब-जब संवेदनाओं का अकाल पड़ा है, दुनिया ने आंसुओं की तिजारत शुरू कर दी है। आज इस दिखावटी दुख का विस्तार मात्र एक परंपरा नहीं, बल्कि उस मानसिक मरुस्थल का प्रतीक है, जहां संवेदनाएं सूख चुकी हैं।
आज के दौर में इस रिवाज की शक्लें बदल गई हैं, पर रूह वही है- मांगने पर उपलब्ध सिसकियां। अब ये किरदार सिर्फ राजस्थान के रेतीले धोरों में नहीं मिलते, बल्कि सोशल मीडिया पर किसी पोस्ट पर टिप्पणियों वाले हिस्से और मुख्य समय की बहसों में भी पैठ बना चुके हैं। यह एक ऐसा युग है, जहां हम अपनी उदासी को भी दूसरों के कंधों पर ढोना चाहते हैं। अब लोग किसी की मृत्यु पर दुखी होने के लिए नहीं, बल्कि किसी के पतन पर उत्सव मनाने या किसी विचारधारा के अपमान पर ‘प्रायोजित विलाप’ करने के लिए शोर ढूंढ़ते हैं। जैसे नुक्कड़ की दुकान पर कड़क चाय की मांग होती है, वैसे ही अब डिजिटल मंचों पर कड़क विरोध और मार्मिक आर्तनाद की मांग है।
यह वैसा ही है, जैसे हम अपनी पुरानी यादों के मलबे में खुद उतरने के बजाय किसी अजनबी को पैसे देकर कहें कि ‘भाई, थोड़ा सलीके से छाती पीट दो, ताकि लोगों को लगे कि मैं बहुत दुखी हूं।’ यह बढ़ती भीड़ हमारे भीतर के उस सूनेपन को पुख्ता करती है, जिसे हम खुद भरने का साहस खो चुके हैं।
साहित्य और समाज के इस चौराहे पर खड़े होकर जब हम सोचते हैं, तो लगता है कि ये किरदार अब एक बड़े तंत्र का हिस्सा हैं। इतिहास में ये वे लोग होते थे, जिनके पास अपना कहने को कुछ न था, इसलिए उन्होंने अपना दुख ही बेच दिया। आज का पढ़ा-लिखा तबका भी इसी कतार में खड़ा है, बस उसके हाथ में महंगे उपकरण या यंत्र हैं। हम दूसरों के गम में शरीक होने का स्वांग रचते हैं, क्योंकि हमें डर है कि अगर हमने शोर नहीं मचाया, तो दुनिया हमें पत्थरदिल करार दे देगी। यह इस बात का इशारा है कि हम ‘पीड़ा’ का अनुभव नहीं करना चाहते, बस उसका तमाशा बनाना चाहते हैं। यह वैसा ही है जैसे किसी बड़े हादसे के वक्त मदद के लिए हाथ बढ़ाने के बजाय फोन निकालकर वीडियो बनाना, ताकि दुनिया को हमारा ‘दुख’ और ‘सक्रियता’ दोनों दिख सके।
पुराने दौर में राजाओं की मृत्यु पर प्रजा का रोना अनिवार्य होता था, चाहे वह हुक्मरान कितना ही निर्दयी क्यों न रहा हो। आज भी, जब कोई रसूखदार मरता है, तो इन विलापकर्ताओं का एक पूरा तंत्र सक्रिय हो जाता है। वे विलाप के ऐसे महीन तार छेड़ते हैं कि सुनने वाले को लगने लगता है कि सचमुच कोई अपूरणीय क्षति हुई है। जीवन में जब असल एहसास कम हो जाते हैं, तो लोग किराए पर अभिनय मंगा लेते हैं। ये नए दौर के किरदार कीबोर्ड के पीछे छिपे शिकारी हैं, जो हैशटैग के साथ आंसू बहाते हैं। इनका इतिहास दरअसल इंसान की उस आदिम भूख का इतिहास है, जिसमें वह अपनी अंदरूनी कमियों को दूसरों के चिल्लाने से ढकना चाहता है।
समाज के इस चरित्र चित्रण में ये विलापकर्ता एक बिंब हैं उस बाजारवाद के, जहां आंसू भी एक माल की तरह बिकते हैं। अगर हम गुजरे हुए वक्त को गौर से देखें, तो पाएंगे कि ऐसी तादाद तभी बढ़ी है, जब समाज में आपसी बातचीत मर गई है। जब घर के सदस्य एक-दूसरे की आंखों में झांकना बंद कर देते हैं और संवाद का धागा टूट जाता है, तब ये बिचौलिए भावनाओं का व्यापार संभालते हैं। वे उस सन्नाटे को शोर से भरते हैं, जो हमारे अकेलेपन ने पैदा किया है।
गीता में कहा गया है कि दुख में विचलित न हो, पर आज का आदमी बिना चीखे-चिल्लाए दुख को मान ही नहीं पाता। उसे एक ‘शोर से भरा’ माहौल चाहिए। ये किरदार वही शोर मुहैया कराते हैं। वे बाल बिखेरते हैं, विलाप करते हैं और ऐसा माहौल बुनते हैं कि पत्थर भी पसीज जाए। पर क्या वह नमी असली होती है? यह एक मौसमी बुखार की तरह है, जो आता है, हलचल मचाता है और अपनी कीमत वसूलकर चला जाता है। आधुनिक दौर के ये लोग भी यही कर रहे हैं। वे हमारे डिजिटल संसार को सिसकियों से भर देंगे, पर जैसे ही स्क्रीन बंद होगी, वे अगले ग्राहक की तलाश में निकल जाएंगे।
सिसकियों की यह भीड़ एक गंभीर चेतावनी है उस संस्कृति के लिए, जो जीने से ज्यादा प्रदर्शन करने पर उतर आई है। अगर इतिहास खुद को दोहरा रहा है, तो इस बार वह किसी महाकाव्य की तरह नहीं, बल्कि एक खराब नाटक की तरह सामने है। हम एक ऐसे मोड़ पर हैं, जहां आंखों की असली नमी दुर्लभ हो गई है और बनावटी सिसकियों का साम्राज्य फैल गया है। असल में ये आंसू भी अब किसी ‘सब्सक्रिप्शन’ या ग्राहकी की तरह हो गए हैं। तय कीमत चुकाओ और मनचाहा विलाप पा लो।
इस भीड़ का बढ़ना इस बात का सबूत है कि हम सामूहिक रूप से भावनाओं के दिवालिएपन की ओर बढ़ रहे हैं। हमें रुककर सोचना होगा कि क्या हम वाकई एक ऐसी दुनिया की तरफ बढ़ रहे हैं, जहां हमारे आखिरी वक्त पर रोने वाले लोग हमारे चाहने वाले नहीं, बल्कि वे होंगे जिन्हें हमने अपनी वसीयत से भुगतान किया होगा? वक्त हमें संभलने का इशारा कर रहा है, पर सिसकियों का यह शोर हमें अपनी ही धड़कन सुनने की मोहलत नहीं दे रहा।
