जीवन यात्रा में हम सभी सफलता एवं विफलता के अनगिनत दौर से गुजरने को बाध्य होते हैं। धरती पर जन्म लेने के बाद जब हम होश संभालते हैं, चाहे वह बचपन की अवस्था हो तरुण काल हो या प्रौढ़ावस्था, सभी चरणों में हार-जीत के साक्ष्य रेखांकित होते रहते हैं। वर्तमान समय में समाज का सबसे संवेदनशील वर्ग युवा पीढ़ी है, जो अपने अध्ययन, परीक्षा की तैयारी, उसके परिणाम की आशा सहित नौकरी की तलाश में सतत चेष्टारत रहते हैं। कभी-कभी किसी छात्र को पर्याप्त परिश्रम के बाद भी परीक्षा में सफलता प्राप्त नहीं होती, जिससे वह हताश हो जाता है।

मगर कुछ दिनों के बाद जब वह युवक स्वतंत्र मन से यह चिंतन करता है कि सिर्फ इस विफलता से दुखी होने से कोई लाभ नहीं होगा, बल्कि व्यर्थ समय के नष्ट करने पर आगे की परीक्षा की तैयारी का अवसर भी हाथ से निकल जाएगा, तब उसके चेतन मन में आशा का संचार होता हुआ दिखता है। इस पड़ाव पर अगर उस निराश युवक को उसके कोई मित्र, भाई, शिक्षक या माता-पिता हाथ थामते हुए उसे साहस और संबल प्रदान करते हैं, तो युवक अपनी उदासी से बाहर निकल कर फिर अध्ययन के पड़ाव पर संशोधित संकल्प लिए जुट जाता है।

मनोवैज्ञानिकों की राय है कि निराश अवस्था में पड़े व्यक्ति को अगर कुछ पल के लिए अकेले स्वचिंतन के लिए छोड़ दिया जाए, तो उसके उबरने की स्थिति स्वत: निर्मित होने लगती है। मगर उस व्यक्ति पर यह नजर भी रखी जाए कि वह कोई अनहोनी कृत्य की ओर अग्रसर तो नहीं हो रहा है। मानसिक शक्ति के कुछ स्रोत या हार्मोन हताश व्यक्ति को स्वयंबोध कराने की सदैव निरंतरता बनाए रखता है, लेकिन चिंतित और थके मन के जटिल हिस्से उसे उबरने में देर से मदद करते हैं।

प्रश्न है कि आखिर हम विफलता को कभी-कभी जीवन यात्रा की अंतिम परिणति क्यों मान लेते हैं कि अब मुझसे कुछ नहीं हो पाएगा। उसमें भविष्य निर्माण के जो लक्ष्य और मार्ग तय किए थे, जरा-सी फिसलन उसकी हिम्मत आखिर क्यों तोड़ देती है। चूंकि समाज में नकारात्मक पक्ष और सकारात्मक भाव के दैनिक उदाहरण देखे जाते हैं और थके-हारे व्यक्ति को जब सकारात्मक दृश्य, उदाहरण या व्यक्ति से भेंट होती है, तो उसमें घर की गई उदासी के तार धीरे-धीरे अपने आप टूटने लगते हैं।

मानवीय सभ्यता के विकास में असफलता जीवन का एक नैसर्गिक अंश माना गया है, जो हमें बहुत कुछ पाठ भी पढ़ाती है। कई लोग विफलता को नकारात्मक मानते हुए उससे समझौता कर लेते हैं। जबकि विफलता हमें हमारी गलतियों से सीखने का मौका देते हुए उसमें सुधार के सूत्र भी पिरोती है। यह ध्रुव-सत्य है कि कोई भी व्यक्ति अपने अध्यवसाय में कभी भी हारना नहीं चाहता और इसके लिए वह हर यत्न भी करता है। ऐसा भी माना गया है कि सफलता के लिए जिस स्तर का परिश्रम और साधन का उपयोग करना चाहिए था, उसमें जरा-सी भी चूक या कमी के कारण हाथों में आई जीत फिसल जाती है। कई लोग मानते हैं कि उनके भाग्य ने साथ नहीं दिया, इसलिए वे विफल रहे। इस भाव से कुछ देर के लिए हारे हुए व्यक्ति को संतोष तो मिलता है, लेकिन इसी सोच में उसकी निरंतरता उसे कर्म पथ से विलग कर देती है।

एक समय उच्च माध्यमिक विद्यालय के पाठ्यक्रम में ‘असफलता ही सफलता की कुंजी है’ विषय पर निबंध लेखन का प्रचलन था। व्यक्ति विशेष की विफलता के सूक्ष्म विश्लेषण से यह पता चलता है कि उसके अध्ययन के कौन-से तरीके सही रूप में उसे काम नहीं आए और आगे इसमें क्या सुधार किया जाए। कारणों की गहराई में डुबकी लगाने से विफलता हमें और मेहनत करने के लिए भाव-भूमि प्रदान करती है। यह हमें अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए और अधिक प्रयास करने के लिए प्रोत्साहित भी करती है।

जब हम अपनी विफलताओं का नीर क्षीर परीक्षण करते हैं तब समझ पाते हैं कि खुद से निराश होने का अर्थ है कि हम बहुत देर तक अपने को असहाय या निष्फल देखना नहीं चाहते। हम उन अनुकूल परिस्थितियों और उपायों को पहचान करने में सक्रिय हो जाते हैं, जिसमें सुधार करने की प्रबल गुंजाइश होती है। सफलता के प्रभावी सूत्र हमारे भीतर छिपे हैं, न कि बाहर। यह चिंतन संदेश सफलता के द्वार पर पहुंचने का प्रथम कदम माना गया है।

कभी-कभार विफलता से आहत की अवस्था में लोग अपनों से दूर हो जाते हैं, क्योंकि वे यह धारणा बना लेते हैं कि उनसे सामना होने पर वे उन्हें कमजोर और विफल समझेंगे। हालांकि इससे उबरने की जरूरत है, क्योंकि हमारे स्वजन हितैषी हैं, न कि दुश्मन। आवश्यकता है कि अपनी विफलता के मुख्य दर्द को अपनों से बांटा जाए और उनसे प्राप्त सलाह से सफलता की कसौटी के आयाम गढ़े जाएं। संघर्ष प्रबंधन पर स्वयं का सकारात्मक दृढ़ विचार और स्नेहिल समाज का सान्निध्य खोई हुई सफलता के लिए नूतन संस्करण का सृजन कर सकता है।

अगर निरपेक्ष ढंग से आत्मचिंतन कर यह मूल्यांकन करें कि परिश्रम के मार्ग में कहां त्रुटि हो गई, तो विफलता हमें सहिष्णु भी बनाती है। यह समझने में मदद करती है कि सफलता रातोंरात नहीं मिलती, इसके लिए लक्ष्य बिंदु की प्राप्ति हेतु कठिन प्रयास की आवश्यकता होती है। कई सफल लोगों ने अपने जीवन में असफलता का पहले सामना किया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी, बल्कि कारणों की पृष्ठभूमि में गोते लगाते हुए सफलता तक संघर्षरत रहे। विफलता को नकारात्मक नहीं मानना चाहिए, बल्कि खुद पर भरोसा रखते हुए इसे एक सीखने के अवसर के रूप में देखा जाए तो यह हमें मजबूत बनाती है और सफलता के सूर्योदय की ओर ले जाती है।

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इतिहास में युद्धों को अक्सर महान उद्देश्यों, राष्ट्र की रक्षा और सम्मान की भाषा में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन जब हम युद्धों के आर्थिक और सामाजिक परिणामों का विश्लेषण करते हैं, तो एक कठोर वास्तविकता सामने आती है। युद्ध केवल सेनाओं का टकराव नहीं होते, बल्कि वे धन, भूमि और संसाधनों के पुनर्वितरण का साधन भी बनते हैं। साधारण लोग युद्धों में मरते हैं, घायल होते हैं, अपने घर और खेत खो देते हैं, जबकि अत्यंत धनी वर्ग, बड़े उद्योगपति और वित्तीय घराने युद्धों के दौरान असाधारण लाभ अर्जित करते हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक