शहर धीरे-धीरे बदलते हैं, लेकिन उनके बदलने की आवाज बहुत कम लोगों को सुनाई देती है। यह आवाज किसी मशीन की तरह तेज नहीं होती, बल्कि किसी पुराने दरवाजे के धीरे-धीरे बंद होने जैसी होती है। पहले मोहल्लों में दरवाजे खुले रहते थे। लोग बिना सूचना के एक-दूसरे के घर चले जाते थे। चाय चढ़ जाती थी, बातें शुरू हो जाती थीं और समय बिना हिसाब के बीत जाता था। अब दरवाजे पहले से अधिक मजबूत हो गए हैं, घंटियां पहले से अधिक आधुनिक हो गई हैं, लेकिन दस्तकें कम हो गई हैं।

हम अपने पुराने मोहल्ले से गुजर कर देखें। वही गलियां होंगी, वही पेड़, वही मोड़, लेकिन उनमें वह आत्मीयता नहीं होगी, जो कभी उन जगहों की असली पहचान हुआ करती थी। बच्चे गली में क्रिकेट खेलते थे, महिलाएं एक-दूसरे के घरों से कटोरी में चीनी या चायपत्ती मांग लाती थीं और बुजुर्ग सड़क किनारे बैठकर मौसम और राजनीति पर चर्चा करते रहते थे। अब वहां ऊंची दीवारें हैं और हर दरवाजे पर कैमरे लगे हैं।

हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन सहजता घट गई है। मोबाइल फोन ने संवाद को आसान बनाया, लेकिन बातचीत को छोटा कर दिया। अब हालचाल पूछना भी एक औपचारिक क्रिया बनता जा रहा है। किसी की आवाज सुनने की जगह लोग नीले टिक देखकर संतोष कर लेते हैं। रिश्ते अब शब्दों से कम और संकेतों से ज्यादा चलने लगे हैं।

आखिर ऐसा क्या बदल गया कि लोगों ने एक-दूसरे के जीवन में धीरे-धीरे आना बंद कर दिया। शायद हम सब अपने-अपने संघर्षों में इतने व्यस्त हो गए कि दूसरों की थकान देखना भूल गए। पहले दुख साझा होते थे। किसी घर में बीमारी होती तो पूरा मोहल्ला उसके साथ खड़ा दिखाई देता। अब लोग संवेदनाएं भी संदेशों में भेजने लगे हैं। शब्द बचे दिखते हैं, लेकिन उनका ताप कम हो गया है।

कुछ समय पहले रेलवे स्टेशन पर एक वृद्ध व्यक्ति हाथ में पुराना बैग थामे थे। उनकी आंखों में बेचैनी थी। वे बार-बार टिकट को जेब से निकालकर देखते और फिर प्लेटफार्म की ओर देखने लगते। शायद किसी का इंतजार कर रहे थे। उनके पास बैठा एक लड़का मोबाइल पर वीडियो देख रहा था। आसपास सैकड़ों लोग थे, लेकिन उस बूढ़े आदमी की घबराहट किसी की नजर में नहीं आ रही थी। थोड़ी देर बाद पूछने के बाद मुस्करा कर उन्होंने कहा कि बेटा आने वाला था, शायद ट्रैफिक जाम में फंस गया होगा। उनकी आवाज में शिकायत कम, भरोसा ज्यादा था। यानी दुनिया अभी पूरी तरह कठोर नहीं हुई है। उम्मीद अब भी लोगों के भीतर बची हुई है। बूढ़े पिता अब भी बेटों का इंतजार करते हैं, मांएं अब भी बच्चों के लौटने तक जागती रहती हैं और कुछ लोग अब भी किसी अनजान आदमी से रास्ता पूछ लेने भर से सहज हो जाते हैं।

समाज केवल सड़कों, इमारतों और योजनाओं से नहीं बनता। वह छोटे-छोटे मानवीय व्यवहारों से बनता है। किसी थके हुए आदमी को पानी पूछ लेना, पड़ोसी की अनुपस्थिति में उसके घर का ध्यान रख लेना, रिक्शेवाले से सम्मान से बात करना, बच्चों की बात धैर्य से सुन लेना- ये मामूली लगने वाले व्यवहार ही समाज को रहने योग्य बनाते हैं। आज जब दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है, तब सबसे अधिक आवश्यकता संवेदनशील बने रहने की है। आधुनिक होना बुरा नहीं है, लेकिन इतना आधुनिक हो जाना खतरनाक है कि हमें किसी की आंखों की उदासी दिखाई देना बंद हो जाए। मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसकी करुणा है। यदि वही कम होने लगे तो विकास अधूरा रह जाएगा।

शायद यही कारण है कि आज संवेदनशीलता केवल एक नैतिक गुण नहीं, बल्कि सामाजिक आवश्यकता बन गई है। हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जहां सूचनाएं पहले से कहीं अधिक तेजी से पहुंचती हैं, लेकिन भावनाएं उतनी ही धीमी होती जा रही हैं। किसी दुर्घटना, किसी पीड़ा या किसी संघर्ष की खबर कुछ ही क्षणों में हमारे मोबाइल तक पहुंच जाती है, पर कई बार वह हमारे मन तक नहीं पहुंच पाती। हम देख लेते हैं, जान लेते हैं, लेकिन महसूस करने की क्षमता धीरे-धीरे कम होती जाती है। यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है कि मनुष्य का वास्तविक विकास केवल तकनीकी उपलब्धियों से नहीं मापा जा सकता। उसका आकलन इस बात से भी होना चाहिए कि वह अपने आसपास के लोगों के प्रति कितना सजग और सहृदय है।

जीवन की भागदौड़ में अगर हम किसी अजनबी की परेशानी देखकर दो पल ठहर सकें, किसी उदास चेहरे पर मुस्कान लौटाने का प्रयास कर सकें या किसी अकेले व्यक्ति को यह एहसास दिला सकें कि वह अकेला नहीं है, तो शायद समाज थोड़ा और बेहतर बन सके। करुणा और सहानुभूति ऐसी पूंजी हैं, जो बांटने से घटती नहीं, बल्कि बढ़ती हैं। यही वे मूल्य हैं जो परिवारों को जोड़े रखते हैं, पड़ोस को जीवंत बनाते हैं और समाज को मानवीय बनाए रखते हैं।

आखिरकार भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती मशीनों को अधिक बुद्धिमान बनाना नहीं, बल्कि मनुष्यों को पर्याप्त मानवीय बनाए रखना है। अगर हम यह संतुलन बचा सके, तो आधुनिकता और मनुष्यता साथ-साथ चल सकेंगी। कभी-कभी लगता है कि हमें फिर से दस्तक देना सीखना होगा- दूसरों के दरवाजों पर, और उनके मन पर भी, क्योंकि दुनिया आखिरकार तकनीक से नहीं, मनुष्यता से बची रहेगी।

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