हाल के वर्षों में भारत ने विभिन्न सेवाओं के डिजिटलीकरण में खासी प्रगति की है। देश में नब्बे करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हो गए हैं, जिससे डिजिटल माध्यम से पैसे के लेन-देन और अन्य कार्यों को पूरा करने का चलन भी बढ़ा है। इसी की बदौलत भारत ने दुनिया के सबसे बड़े ‘रियल-टाइम’ भुगतान बाजार के रूप में खुद को परिवर्तित किया है।
वर्ष 2017 और 2023 के बीच ‘रिटेल डिजिटल भुगतान’ में 50.8 फीसद की तेज वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2014 में यह देश की जीडीपी का 4.5 फीसद हिस्सा था और 2026 के अंत तक इसके बीस फीसद तक पहुंचने का अनुमान है। मगर डिजिटल तकनीक के तेजी से हो रहे प्रसार के साथ कई साइबर संबंधी समस्याएं भी सामने आई हैं।
आज अक्सर ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां लोग साइबर धोखाधड़ी के शिकार हो रहे हैं। भले ही डिजिटल समावेशन का सपना अब देश के दूरदराज इलाकों तक पहुंच चुका है, लेकिन इस उपलब्धि के साथ कई तरह की चुनौतियां भी पैदा हो गई हैं। तकनीक का दुरुपयोग सुरक्षा में सेंध लगा रहा है और इस तरह के अपराध पर लगाम लगाना सुरक्षा एजंसियों के लिए भी टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
साइबर अपराध की घटनाओं में चार सौल फीसद की वृद्धि
केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 के बाद से देश में साइबर अपराध से जुड़ी घटनाओं में करीब चार सौ फीसद की वृद्धि हुई है। अब ग्रामीण तथा अर्ध-शहरी क्षेत्र डिजिटल ठगी के नए केंद्र बनते जा रहे हैं। कुछ शहरों में साइबर सुरक्षा व्यवस्था कमजोर होने के कारण वहां इस तरह के अपराध तेजी से बढ़े हैं।
ग्रामीण इलाकों में भी साइबर अपराध का बढ़ना कोई संयोग नहीं, बल्कि यह सामाजिक और तकनीकी बदलाव का नतीजा है। बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट ने डिजिटल पहुंच तो बढ़ा दी है, लेकिन लोगों में डिजिटल समझ नहीं बढ़ी है।
सट्टेबाजी और आनलाइन खेल ऐप, जो मनोरंजन के रूप में पेश किए जाते हैं, वे साइबर ठगी के आसान जरिया बन गए हैं। यही वजह है कि पिछले छह साल में आनलाइन धोखाधड़ी के कारण भारतीयों को 52 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ा है। यह जानकारी भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र के ताजा आंकड़ों से सामने आई है।
समन्वय केंद्र की रपट में कहा गया है कि वर्ष 2025 में देश के नागरिकों ने करीब 19,813 करोड़ रुपए साइबर धोखाधड़ी में गंवाए हैं। इस दौरान 21 लाख से ज्यादा शिकायतें राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर दर्ज हुईं। इससे पहले वर्ष 2024 में 22,849 करोड़ रुपए का नुकसान और लगभग 19 लाख शिकायतें सामने आईं।
आज जब ज्यादातर चीजें मोबाइल और इंटरनेट पर सुलभ हैं, वहीं साइबर अपराधी भी हर उस चूक का इंतजार करते हैं, जो आम लोग अनजाने में कर बैठते हैं। ऐसे में सबसे जरूरी है कि लोग खुद को डिजिटल रूप से प्रशिक्षित और सतर्क बनाएं। समस्या इसलिए भी जटिल होती जा रही है कि साइबर अपराधी ठगी के लिए नए-नए तरीके अपनाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी देश भर में बढ़ रहे डिजिटल अपराध से निपटने के लिए सरकार को उचित एवं प्रभावी कदम उठाने को कहा।
बैंक और संबंधित आधिकारियों को भी सतर्क रहने की जरूरत
शीर्ष अदालत के मुताबिक, डिजिटल धोखाधड़ी के मामलों में बैंकों और संबंधित अधिकारियों को भी सतर्क रहने की जरूरत है। साइबर ठगी के मामलों में पीड़ित व्यक्ति को आर्थिक राहत मुहैया कराने की मांग भी उठ रही है, जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक विचार कर रहा है।
माना जा रहा है कि आरबीआइ एक नया नियम बना सकता है, जिसके तहत साइबर ठगी के छोटे मामलों में पीड़ित को पच्चीस हजार रुपए की आर्थिक मदद मिल सकती है। मगर यह तभी संभव होगा, जब पीड़ित व्यक्ति समय पर बैंक को इस तरह की धोखाधड़ी की जानकारी देगा।
साइबर अपराध बढ़ने से आम लोगों की आर्थिक सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हालात ये हैं कि साइबर अपराध अब केवल तकनीकी चूक का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह व्यक्तिगत गोपनीयता और समग्र डिजिटल व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। आज साइबर ठगी केवल ई-मेल या फोन काल तक सीमित नहीं रह गई है।
‘AI वायस क्लोनिंग’, ‘डीपफेक वीडियो’, नकली ऐप और सोशल मीडिया पर बनाए गए फर्जी प्रोफाइल के जरिए अपराधी आम लोगों पर मानसिक दबाव बनाकर धोखाधड़ी कर रहे हैं। कई मामलों में जालसाज खुद को बैंक अधिकारी, पुलिस अफसर, आयकर अधिकारी या किसी करीबी रिश्तेदार के रूप में पेश कर तत्काल भुगतान की मांग करते हैं। ऐसे में साइबर सुरक्षा अब महज पैसों के नुकसान से बचाने का मामला नहीं है, बल्कि यह देश की आंतरिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बन चुका है।
एक रपट के मुताबिक, भारत में डिजिटल तरीके से वित्तीय लेन-देन अब बड़े पैमाने पर होने लगा है। इसलिए साइबर सुरक्षा अब सिर्फ तकनीकी रूप से ही नहीं, बल्कि डिजिटल व्यवस्था में नागरिकों के भरोसे को कायम रखने के लिए भी जरूरी है। सरकार ने साइबर ठगी को रोकने के लिए कानून जरूर बनाए हैं, लेकिन आज भी इनका प्रभावी तरीके से क्रियान्वयन, तथ्य जांच और वास्तविक समय में निगरानी जैसी प्रणालियां बहुत धीमी गति से काम करती हैं।
जाहिर है, किसी एक एजंसी पर जिम्मेदारी डालने से साइबर अपराध पर अंकुश लगाना संभव नहीं है। इसके लिए केंद्र-राज्य सरकारें, बैंकिंग-वित्तीय संस्थान, टेक कंपनियां और आम नागरिक, सभी को एकजुट होकर एक रणनीति के साथ काम करना होगा। इसमें दोराय नहीं कि इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या बढ़ने के साथ-साथ डिजिटल धोखाधड़ी का दायरा भी बढ़ रहा है।
ऐसे में संदिग्धों का पंजीकरण इस तरह के मामलों से निपटने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है, लेकिन यह एक व्यापक रणनीति का हिस्सा होना चाहिए। साइबर सुरक्षा उपायों को मजबूत करना, डिजिटल साक्षरता बढ़ाना और नागरिकों में सतर्कता एवं जागरूकता को प्रोत्साहित करना भी उतना ही अहम है। नीति निर्माताओं को नागरिकों की वित्तीय सुरक्षा को केंद्र में रखना होगा।
आज भारत एक डिजिटल समाज बनने की ओर अग्रसर है, मगर अब भी बड़ी संख्या में लोग डिजिटल रूप से साक्षर नहीं हैं। अगर साइबर धोखाधड़ी को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो निकट भविष्य में इसके भयावह परिणाम सामने आ सकते हैं। यह विफलता हमारे समाज को नकदी-आधारित प्रणालियों की ओर फिर से रुख करने के लिए मजबूर कर सकती है।
मगर हम नवाचार, संस्थागत सहयोग और नैतिक प्रारूप के सही संयोजन के साथ सुरक्षात्मक उपाय तलाशेंगे, तो न केवल देश में इस खतरे को नियंत्रित कर सकते हैं, बल्कि साइबर धोखाधड़ी की रोकथाम के लिए वैश्विक स्तर पर भी मिसाल कायम कर सकते हैं। इसलिए तेजी से बदलते डिजिटल दौर में खुद को आगे रखने के लिए सरकार, प्रौद्योगिकी क्षेत्र और समाज के बीच एक समन्वित एवं सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है। साथ ही सतर्कता, डिजिटल अनुशासन और विशेषज्ञों की ओर से सुझाए गए व्यावहारिक उपायों के जरिए इस खतरे को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
यह भी पढ़ें: PM-किसान से पेंशन तक: ‘सिस्टम हैक’ कर निकाले करोड़ों रुपये । Express Investigation
राम दयाल 25 वर्ष के हैं मनोहर थाना के मदनपुरा गांव के निवासी हैं। उनका कहना है कि जब दो साल पहले उनके अकाउंट में 33,000 रुपये आए तो वह चौंक गए। क्योंकि उन्होंने किसी भी योजना के लिए आवेदन नहीं किया था तो वो सतर्क हो गए। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…
