Sugar Consumption in India: आहार का स्वाद बनाए रखने के लिए चीनी और नमक बहुत जरूरी है। दुनिया के मशहूर बावर्ची खास और महंगे व्यंजन पकाते हुए नमक की बारी आने पर कहते हैं- स्वादानुसार। नमक तो ज्यादा खाना वैसे भी संभव नहीं होता। मीठा कम खाने के बारे कोई नहीं कहता, इसलिए मीठा रुकने का नाम नहीं लेता।
यह खूब खाया जाता है। इसके असर के बारे में जानते हुए भी लोग इससे बचना जरूरी नहीं समझते। हालांकि मोटापा, मधुमेह और दूसरे कारणों से जब शरीर परेशान होने लगता है, तब मीठा कम करना पड़ता है। हमारी जीवन शैली ही ऐसी है कि चीनी दुखी करने लगे, तब भी किसी न किसी बहाने मीठा खाना छूटता नहीं है।
कितने ही लोग सुबह उठकर गोली खा लेते हैं और दिन में गुलाब जामुन पेश किए जाएं, तो उन्हें मुस्कुराकर स्वीकार कर लेते हैं। कोई खुशखबरी जिंदगी में इठलाती हुई प्रवेश कर जाए और जल्दी से कोई मिठाई न मिल सके, तो चीनी को ही मिठाई मान कर मुंह मीठा करा दिया जाता है। वैसे हर मिठाई में चीनी की ही महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
लगभग हर प्रसाद में मिष्ठान खिलाया जाता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि ज्यादा मीठा खाते रहना सेहत के लिए दिन पर दिन खतरनाक हुआ जा रहा है। खुशी मनाने और मनवाने के लिए मुंह मीठा करवाना हमारी ऐतिहासिक परंपरा है और परंपराओं से मुंह मोड़ना हमारे यहां सांस्कृतिक गुस्ताखी मानी जाती है। मीठा खाकर आराम से बैठने के कारण राष्ट्रीय सेहत बिगड़ रही है।
यह पढ़कर और जानकर कसैला अनुभव होता है कि हमारा देश दुनिया की मीठी राजधानी बनने की ओर अग्रसर है। आशंका है कि वास्तविकता में यह हो भी चुका हो, क्योंकि सच अब बेचारा हो चुका है। पता नहीं वक्त के किस कोने में सिर झुकाए बैठा होगा। ‘कुछ मीठा हो जाए’ जैसे विज्ञापनों ने प्यार तो बहुत पाया, तभी सामान भी खूब बिकवाया, लेकिन जितना नुकसान मीठा खाते रहने वालों का हुआ, उतना मीठा खाने वाले नहीं समझते।
मिठास के पीछे दुनिया इतनी दीवानी है कि उत्सव और खुशियों की पारंपरिक मिठाई, यानी गुड़ को भी नहीं बख्शा गया। उसे ज्यादा मीठा, कुरकुरा और स्वाद बनाने के लिए उसमें चीनी मिलाना कब से हो रहा है। दर्जनों प्रसिद्ध ब्रांडों की गजक चीनी के सहारे बिक रही है। कितनी ही चीजों में असली चीनी की जगह जो नकली चीनी खिलाई जा रही है, वह असली चीनी से ज्यादा खतरनाक बताई जाती है।
अच्छी सेहत के बारे में समझाने वाले उचित ही कहते हैं कि जब बीमारियां दस्तक देना शुरू कर रही हों तो भोजन में चीनी और नमक कम कर देना चाहिए। इस बारे में वाकई संजीदा विचार करना चाहिए और स्वास्थ्य में सुधार करने के लिए कोई विज्ञापन प्रेरित करे या न करे, खुद ही अपने आप से कहा जाए कि मीठा ज्यादा नहीं, अब नमकीन भी कम हो जाए। यह दोनों शरीर में कम प्रवेश करेंगे, तो जिंदगी की असली सेहत सलामत रहेगी और तबीयत भी बार-बार खराब होने से बचा करेगी।
यह बिल्कुल सही कहा गया है कि डाक्टर के पास जाकर दवाई खाकर स्वस्थ रहना, स्वस्थ रहना नहीं है, बल्कि डाक्टर के पास न जाकर, स्वानुशासन अपनाकर स्वस्थ रहना ही वास्तव में स्वस्थ रहना है। यह बात दीगर है कि विषाणु, दुर्घटना, प्रदूषण और गरीबी के पड़ोस में तो कोई भी बीमार हो सकता है। खुशी मनाने के लिए ‘कड़वा हो जाए’ कहने का प्रचलन भी हमेशा रहा है और बढ़ता ही जा रहा है। मिठाई खाने से ज्यादा स्वाद तो लोग सोमरस पीने और पिलाने में लेते हैं।
यह पेय मिठाई खिलाने से कम रसीला नहीं माना जाता। यही माना जाता है कि खुशी की पार्टी तो तभी पूरी होती है, जब मदिरापान हो। एक बार मिली जिंदगी का पूरा लुत्फ लेने के लिए पीना पिलाना बढ़ रहा है। हमारे देश को इस तरह के स्वाद रस की खपत में दुनिया भर में काफी बढ़त मिली है। खुशी के अवसरों पर बच्चों, युवाओं और महिलाओं से बच बचाकर, ‘आज शाम को पार्टी हो जाए’ भी खुलकर कहा जा रहा है।
अक्सर देखने में आया है कि चीनी और नमक से खबरदार करने वाले भी इस संदर्भ में कड़वे बोल नहीं कहते। जबकि इस तरह की पार्टी के बहाने शुरू हुई आदत का सिरा आगे चल कर सेहत के खिलाफ किस तरह खड़ा हो जाता है, यह छिपा नहीं रहा है। खुशी तो हम शरीर, दिल और दिमाग से भी महसूस कर सकते हैं। उसमें कुछ मीठा खाना तो बाहरी कर्म है।
कोई ताजा फल खा लिया जाए, तो भी जिंदगी में खुशी और उत्साह उभर सकता है। बदलते जमाने के साथ ‘आज कुछ खट्टा-मीठा हो जाए’ कहा जाए और खाया भी जाए तो क्या हर्ज है? यह बिल्कुल नया और सेहतमंद अनुभव होगा। किसी को मीठा ज्यादा परेशान कर रहा है, तो ‘अब सिर्फ खट्टा हो जाए’ बोल कर सिर्फ खट्टा ही खाया और खिलाया जा सकता है।
बाजार में सामान बहुत है, इसलिए खुशी मनाने और सेहत बचाने के लिए मीठे की जगह कुछ नया और अलग खाना शुरू करना चाहिए। सबसे पहले तो ‘कुछ मीठा हो जाए’ की जगह अब ‘कुछ नमकीन हो जाए’ जैसी सेहतमंद बात क्यों न की जाए!
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समय की बूढ़ी हथेली से फिसलता हुआ सत्य आज जिस मोड़ पर खड़ा है, वहां विजय-गाथा के कथानक युगबोध के छल में कैद हो चुके हैं। रसातल में दबे हुए यथार्थ और रश्मियों के स्वप्निल गीतों के बीच एक गहरा सन्नाटा पसरा है, जो मौन की ठंडी नदी की तरह समाज की रग-रग में बह रहा है। जब वर्जनाएं शिशिर की तरह इतिहास को थाम लेती हैं, तब केवल प्रकृति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की चेतना भी जम जाती है। थरथराती हुई टहनियों पर लदी हिम की सुगंध दरअसल उस ठिठुरते हुए जनमानस की तरह है, जिसका इतिहास बर्फ के नीचे सहमकर और दबकर चेतना से शून्य हुआ जाता है। पढ़िए पूरा लेख…
