सार्वजनिक शोक कई बार रणनीतिक माना जाता है- सहानुभूति, या सांस्कृतिक निकटता का निमंत्रण। कुछ लोग शोक सामग्री की इस नई लहर को ‘प्रदर्शनकारी शोक’ कहते हैं, क्योंकि ये ‘लाइक’ की गिनती संभावित रूप से ज्यादा लोगों को अपने साथ जोड़ने या कुछ मामलों में पैसे भी दिला सकती है। जब 26 जनवरी, 2020 को अमेरिका के मशहूर बास्केटबाल खिलाड़ी कोबे ब्रायंट की मृत्यु हुई, तो सोशल मीडिया मानो एक विशाल स्मारक बन गया, लेकिन शोक मनाने वालों की आलोचना हुई। कहा गया कि आप एक ऐसे बास्केटबाल खिलाड़ी के बारे में आनलाइन क्यों आंसू बहा रहे हैं, जिसे आप निजी तौर पर जानते तक नहीं! मगर जो लोग सचमुच दुख का इजहार करने की कोशिश करते हैं, उनके लिए आनलाइन माहौल अक्सर भ्रामक बन जाता है।
सच्चे दुख को कई बार संदेह, आलोचना या इस धारणा से देखा जाता है कि यह सब दिखावा है। सोशल मीडिया तुलना और प्रतिस्पर्धा को जन्म दे सकती है, जो आनलाइन शोक तक भी फैल जाती है। कौन ज्यादा बेहतर शोक मना रहा है, किसने सबसे अच्छा श्रद्धांजलि संदेश लिखा, किसने सबसे अच्छी तस्वीर पोस्ट की, कौन सबसे ज्यादा करीब था..! आनलाइन शोक के सामाजिक पदानुक्रम को समझना थोड़ा मुश्किल है। बहुत जल्दी या बहुत बार पोस्ट करने से यह आभास हो सकता है कि कोई व्यक्ति मृतक के उतने करीब नहीं था, जितना दूसरे सोचते हैं।
निजी तौर पर दोस्तों के बीच संवेदनशील बातचीत होती थी, जहां दुख वास्तविक लगता था। मगर आनलाइन की दुनिया में सब कुछ बदल गया है। सोशल मीडिया के मंचों पर शोक बनावटी महसूस होता है। यह वास्तविक दुख से ज्यादा धारणा प्रबंधन जैसा लगता है। पश्चिमी संस्कृति में खुले तौर पर दुख व्यक्त करना अक्सर नापसंद किया जाता है, लेकिन अन्य संस्कृतियों में दुख सामुदायिक होता है।
एशिया प्रशांत क्षेत्र में सार्वजनिक रूप से शोक मनाना यह दर्शाता है कि व्यक्ति उस समुदाय का हिस्सा है। जैसे-जैसे युवा पीढ़ी शयनकक्ष और निजी बातचीत से सार्वजनिक तौर पर सोशल मीडिया पर दुख को स्थानांतरित कर रही है, मृत्यु या किसी बुरी घटना के बारे में बातचीत सार्वजनिक चौराहे पर लौट रही है। कुछ मायनों में, अगर हम अपने दुख के बारे में कोई टिप्पणी नहीं करते हैं, तो यह ऐसा है- क्या आपको परवाह भी थी?
संचार के डिजिटल तरीकों की अवैयक्तिक प्रकृति ने जताई जा रही सहानुभूति की गहराई और ईमानदारी को लेकर भी चिंताएं पैदा की हैं। भौतिक मौजूदगी की कमी और गलत संचार या संवाद की संभावना से व्यक्ति तब अलग-थलग या बेसहारा महसूस कर सकता है, जब उसे सबसे ज्यादा दया और समझ की जरूरत होती है। दुख और सहानुभूति जताने में सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन इसे अभी तक ज्यादा पारंपरिक तरीकों की पूरी तरह से जगह नहीं माना जाता है।
पिछले एक दशक में सोशल मीडिया ने मृत्यु और शोक से जुड़ी पारंपरिक वर्जनाओं को चुनौती दी है, जिससे निजी अनुष्ठान सार्वजनिक, सुलभ दुख की अभिव्यक्तियों में बदल गए हैं। हालांकि डिजिटल शोक निजी भावनाओं को सार्वजनिक रूप से साझा करने से शोक मानदंडों पर खरा उतर रहा है या नहीं, यह बहस का विषय बन चुका है।
ऐसा लगता है कि सोशल मीडिया ने शोक की प्रक्रिया का लोकतंत्रीकरण कर दिया है, जिससे कोई भी किसी खास व्यक्ति की मौत के बारे में अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकता है। कुछ लोग मानते हैं कि यह एक तरह का भाव-विरेचन या विरोध है, लेकिन ज्यादातर लोग इसे सांस्कृतिक गिरावट का एक संकेत मानते हैं। मौत का जश्न मनाना (यहां तक कि एक अनैतिक जीवन जीने वाले व्यक्ति की मौत का भी) मृतक और ऐसे उल्लास में भाग लेने वालों दोनों को अमानवीय बनाने का जोखिम लिए होता है। शोक संदेशों में तथ्यों को सम्मान के संतुलित लहजे के साथ मिलाया जाता रहा है। यहां तक कि जब मृतक बहुत नेक नहीं था, तब भी शोक संदेश लिखने वाले अक्सर इस कहावत का पालन करते थे कि मृतक के बारे में कुछ भी बुरा न कहें। मृतक के बारे में अच्छा ही कहें।
मौत खुद एक निश्चित विनम्रता की मांग करती है। ऐसे मृत लोग (खासकर प्रसिद्ध या शक्तिशाली) प्रतीक बन जाते हैं- शक्ति, असफलता, आशा या पाखंड के…। उनका निधन न केवल यह परिभाषित करने का अवसर बन जाता है कि वे कौन थे, बल्कि यह भी कि समाज उनकी याद में किस चीज को महत्त्व देना या बुरा कहना चुनता है। सोशल मीडिया ध्यान आकर्षित करने की प्रवृत्ति पर चलता है।
शोक संदेश जीवन के योगदानों का लेखा-जोखा रखने या कम से कम गरिमा के साथ उसके अंत को स्वीकार करने का होता है, हिसाब बराबर करने का जरिया नहीं। मृतक के कार्यों की परवाह किए बिना गंभीरता और सम्मान की उम्मीद आज के शोर मचाते मीडिया वाले माहौल में बेतुकी है, जहां हर मौत सुर्खियों में आई चर्चा का एक अवसर है।
हमें सुविधा और करुणा के बीच की पतली रेखा को समझना होगा। जब कोई, जिसकी हम परवाह करते हैं, किसी मुश्किल समय से गुजर रहा होता है, जैसे किसी प्रियजन को खोना, तो यह स्वाभाविक है कि हम अपना समर्थन और संवेदनाएं देना चाहें। फिर भी मानवीय स्वभाव है कि हम ऐसी स्थितियों से दूर रहें, जो मुश्किल या असहज लगती हैं- खासकर जब हमें यकीन न हो कि क्या कहना है।
