आज हम ऐसे दौर में हैं जहां पर्यावरणीय संकटों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है। मौसम का मिजाज बिगड़ रहा है। शहरों की हवा जहरीली हो चुकी है। नदियां कचरे और रासायनिक गंदगी का बोझ ढो रही हैं। कचरे के पहाड़ हमारे ही मोहल्लों की सरहद पर उग आए हैं और रोजमर्रा की जिंदगी में भी इस दबाव की आहट साफ सुनाई दे रही है। यह सब दूर के भविष्य की चेतावनी नहीं, यह अब हमारा वर्तमान है।
गौर करें तो पाएंगे कि प्रकृति और संसाधन के साथ जो हमारा संबंध था, वह पूरी तरह बदल गया है। हमारी आदतें बदल गई हैं। प्रकृति के साथ हमारे रिश्ते बदलने के कई कारण हैं। विकास का वैश्विक मॉडल, आर्थिक नीतियां, बाजारवाद, वर्तमान शहर नियोजन और डिजिटल एल्गोरिद्म एक साथ मिल कर हमारी आदतें बदल रहे हैं।
मगर व्यवस्था में बदलाव को नजरअंदाज कर अच्छी आदतों के साथ पर्यावरण संरक्षण का सारा बोझ आम लोगों के कंधों पर डालने की परिपाटी है। हर व्यक्ति अपनी कुछ आदतें बदलें, तभी पर्यावरणीय संकट से निजात मिल सकती है। बत्ती बंद कीजिए, पानी बचाइए, कचरा अलग कीजिए, कपड़े सोच-समझ कर खरीदिए, कार की जगह बस और मेट्रो का इस्तेमाल कीजिए इत्यादि। जैसे लगता है कि मौजूदा संकट केवल आम लोगों की आदतों का ही परिणाम हो।
हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहां ज्यादातर बड़े संकट जैसे प्रदूषण, वैश्विक ताप इत्यादि के मूल में पिछले कई दशकों से अपनाई गई व्यवस्था है। मगर सरलीकरण का आलम यह है कि अंगुली सबसे पहले आम लोगों की आदतों पर उठती है। जलवायु परिवर्तन से लेकर पानी, ऊर्जा और कचरे के सवाल तक, सार्वजनिक विमर्श में अक्सर यह संदेश गूंजता है कि अगर आम लोग थोड़ी ‘अच्छी आदतें’ अपना लें, तो हालात बदल सकते हैं। नल बंद रखिए, प्लास्टिक थैला छोड़िए, साइकिल चलाइए, ये सब जरूरी बातें हैं। मगर जब पूरा ध्यान यहीं केंद्रित हो जाता है, तो असली वजह धुंधली होने लगती है। व्यवस्थाजनित संकटों का समाधान केवल व्यक्तिगत संयम में खोजना एक तरह से जिम्मेदारी के बड़े हिस्से को अदृश्य कर देना भी है।
पानी का सवाल उठाइए, तो चर्चा अक्सर हमारे स्नानागार और रसोई से शुरू होती है। सलाह दी जाती है कि ब्रश करते समय नल न बहने दें, बाल्टी से नहाएं, पाइप से गाड़ी न धोएं। इन सबका महत्त्व कम नहीं है, लेकिन वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर जल-उपयोग का सबसे बड़ा हिस्सा खेती, उद्योग और शहरी आपूर्ति व्यवस्था में खपता है, जबकि घरेलू उपयोग उसका छोटा अंश है। खेतों तक जाने वाली नहरों में यदि जगह-जगह रिसाव हों, शहरों की पाइपलाइनें वर्षों से मरम्मत के बिना पानी बहाती रहें और उद्योग अपना गंदा पानी बिना शोधन के नदियों में छोड़ते रहें, तो अकेले घरों का अनुशासन कुल तस्वीर को कितना ही बदल पाएगा।
फिर भी जागरूकता अभियानों में दिखाई देता है- टपकता नल और ब्रश करता बच्चा, न कि रिसाव वाली नहर या अंधेरे में चुपचाप नदी की ओर बहता फैक्टरी का नाला।
ऊर्जा मामले में भी यही कहानी दोहराई जाती है। सवाल है कि ऊर्जा-उपभोग और उत्सर्जन की सबसे बड़ी मांग कहां से आ रही है। भारी उद्योग, सीमेंट, इस्पात और रसायन उद्योग, डेटा सेंटर, विमानन तथा मालवाहक जहाज, ये सारे क्षेत्र मिल कर ऊर्जा की बहुत बड़ी हिस्सेदारी निगलते हैं, जबकि घरेलू स्तर की बचत का दायरा संरचनात्मक सहयोग के बिना सीमित रह जाता है।
उपभोग के मोर्चे पर हम सब एक खालिस उपभोक्ता बनते जा रहे हैं। बाजार व्यवस्था की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण है। बाजार में उपलब्ध अधिकतर उत्पाद इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि उनकी उम्र सीमित रहे। मरम्मत कठिन या महंगी हो और उपभोक्ता कुछ ही वर्षों में नया सामान लेने को प्रेरित हो जाए। मोबाइल फोन और टीवी से लेकर घरेलू उपकरणों तक यह प्रवृत्ति अब औद्योगिक मॉडल का हिस्सा बन चुकी है।
उपभोक्ताओं से कहा जाता है कि कम खरीदिए, सोच-समझ कर खरीदिए, लेकिन जब दुकान में टिकाऊ और मरम्मत-योग्य विकल्प लगभग नदारद हों तथा सस्ते वही सामान हों जो जल्दी टूटने के लिए बनाए गए हों, तो जिम्मेदार उपभोग की नैतिकता भी अपने आप में अधूरी हो जाती है।
‘इस्तेमाल करो और फेंको’ की व्यवस्था ने हमारी प्रकृति सम्मत आदतों की जमीन ही बदल दी। बोतलबंद पानी से लेकर सुविधाजनक पैकेजिंग और तेज वितरण ने जीवन को निस्संदेह आसान बनाया, पर बदले में प्लास्टिक, थर्मोकोल और ई-कचरे के पहाड़ खड़े कर दिए। ऑनलाइन बाजारों ने एक कदम और आगे बढ़ कर प्रचार-रणनीतियों से हमारी इच्छाओं का नक्शा तक अपने हाथों में ले लिया है। ‘केवल आज की विशेष छूट’ और ‘बस दो पीस बचे हैं’ जैसी तरकीबें यह सुनिश्चित करती हैं कि जरूरत और चाहत के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जाए।
नए शहरों के नियोजन में भी इसी तरह का विरोधाभास दिखाई देता है। सार्वजनिक अपील यह होती है कि लोग निजी वाहन कम चलाएं, बस और मेट्रो का उपयोग करें। आसपास जाने के लिए साइकिल चलाएं और पैदल चलें। मगर जैसे-जैसे शहरों का विस्तार हुआ है, नई आबादी ज्यादातर उन इलाकों में बसाई गई हैं जहां न भरोसेमंद बस सेवा है, न मेट्रो और न साइकिल पथ। ऐसी स्थिति में निजी वाहन विकल्प नहीं, मजबूरी बन जाता है।
आर्थिक रूप से सक्षम वर्ग इस मजबूरी को कार और दोपहिया से संभाल लेता है। जो नहीं संभाल पाते वे रोजमर्रा की यात्रा में समय और सुरक्षा दोनों की ऊंची कीमत चुकाते हैं। बाद में यही लोग भीड़ और प्रदूषण बढ़ाने वाले नागरिकों की श्रेणी में रख दिए जाते हैं, जबकि शहर की मौलिक योजना और परिवहन नीति पर सवाल अपेक्षाकृत कम ही उठते हैं।
डिजिटल दौर में ‘फुटप्रिंट’ की भाषा, चाहे वह कार्बन की हो या डेटा की, तेजी से लोकप्रिय हुई है। ऐप बताने लगते हैं कि आपकी हर उड़ान, हर भोजन, हर खरीदारी से कितनी अतिरिक्त मात्रा में उत्सर्जन जुड़ रहा है। यह जानकारी उपयोगी है, क्योंकि वह हमारी रोजमर्रा की आदतों को देखने की एक नई दृष्टि देती है, लेकिन जब पूरा नैतिक दायरा केवल व्यक्ति तक सिमट जाता है, तो उत्पादन प्रणालियों, ऊर्जा स्रोतों, व्यापार नियमों और नियामक ढांचों की भूमिका छिप जाती है। सामने दिखता रहता है- केवल गैर-जिम्मेदार उपभोक्ता।
यह कहना बिल्कुल उचित नहीं होगा कि व्यक्ति की जिम्मेदारी शून्य है। हर किसी के पास कुछ न कुछ विकल्प होते हैं और हमें अपने हिस्से की जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए। निजी जीवन में संयम, संसाधनों का सम्मान, पुन: उपयोग, मरम्मत और साझा उपयोग जैसी आदतें न केवल प्रतीकात्मक हैं, बल्कि व्यावहारिक भी हैं।
संकट मौजूदा आर्थिक व्यवस्था और विकास के प्रारूप के हैं, तो समाधान भी व्यवस्था के स्तर पर ही निकलेंगे, हालांकि उनकी शुरुआत व्यक्ति से होकर ही गुजरती है। जरूरत उस संतुलित दृष्टि की है जिसमें हम न तो सारी उम्मीद ‘ऊपर की शक्तियों’ पर छोड़ दें, न ही पूरा नैतिक बोझ केवल आम नागरिकों पर डाल दें।
जब व्यक्तिगत नैतिकता और व्यवस्थागत बदलाव एक-दूसरे के पूरक की तरह देखे जाएं, तभी यह उम्मीद की जा सकती है कि हमारी सामूहिक शक्ति सचमुच उस दिशा में काम करेगी जहां पृथ्वी, समाज और भविष्य, तीनों के हित एक साथ बचाए जा सकें।
