हम जानते हैं, पर मानते नहीं कि वृक्षों की लगातार कुर्बानी, योजनाओं में फंसे अनियंत्रित यातायात, शहर और अड़ोस-पड़ोस में कंक्रीट के जंगल खड़े करने तथा सड़क निर्माण के लिए जमीन की खुदाई के कारण जलवायु का दुख बढ़ता जा रहा है।

इस बात को भी कभी नहीं स्वीकार करेंगे कि पुरानी इमारतें, रास्ते, तालाब, वृक्ष- सब तब तक स्वस्थ, चुस्त और दरुस्त रहे, जब तक उन्हें बनाने और अनुशासन से संवारने वालों का दखल रहा। इस सक्रिय दखल का श्रेय आमतौर पर अंग्रेजों को जाता है। अपनी चुनी हुई जगहों, वहां बनाई इमारतों, सामान और दूसरी चीजों को संभालने का सलीका पहले के लोगों के पास खूब था। उस समय में बनी इमारतें, रास्ते, पुल और रेलवे की पटरियां इस बात की सच्ची गवाही आज भी देते हैं।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले कुछ दशकों के दौरान विकास को शासन और प्रशासन संभाल नहीं सके। विकास के नाम पर जिस स्तर का भ्रम चतुर्दिक छाया रहा, उसने विचारों की स्पष्टता को बाधित किया। शासन और प्रशासन का आपसी मान, सम्मान और तापमान गलतफहमियों में लिपटा, बिगड़ा और असंतुलित रहा। बीमार, लड़खड़ाते, गिरते पहाड़ों का संताप जांचने और उचित इलाज करने का शुभ मुहूर्त कभी नहीं निकल पाया।

विकास से लदी योजनाओं की भरमार से पहाड़ को संवारने और बचाने के लिए ईमानदार प्रयास कभी नहीं हुए। कभी सच की तलहटी में बैठकर यह नहीं सोचा गया कि इन पहाड़ों, नदियों और जंगल को हमारी जरूरत है या हमको इन सबकी। होशियार राजनीति वैसे भी इस तरह के कामों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखती। पहाड़ पर विकास की बेलगाम दिशा, पानी, मिट्टी, जंगल और हवा को नुकसान पहुंचा रही है। जिन पहाड़ों ने हमें सब कुछ दिया, हमारा जीवन पाला-पोसा, हमने उन्हें ही असुरक्षित कर बिसरा दिया है। क्या कभी किसी को विचार करने की जरूरत पड़ी है कि इसका खमियाजा किसे भुगतना पड़ेगा?

अभी तक समझ में यह नहीं आया कि मानवीय शरीर प्रकृति के उन्हीं पांच तत्त्वों से बना है, जिनसे प्रकृति बनी है। कुदरत की अमानत मिट्टी, पानी, वायु, अग्नि और आकाश का जितना खयाल रखेंगे, उतना ही हमारा शरीर बेहतर रहेगा। मानव जीवन प्रकृति पर निर्भर है, लेकिन स्वार्थ के घेरों में कैद इंसान इसे निरंतर नुकसान पहुंचा रहा है। प्रकृति के जीवन को लेकर जिस हद तक उपेक्षा देखी जाती है, वह कई बार परेशान करती है। हिमखंड पिघल रहे हैं, बर्फ नहीं पड़ रही है।

यहां तक कि बारिश नहीं होती, लेकिन जब मौसम नाराज होता है, आपदाएं आती हैं, तो स्पष्ट दिखता है कि इंसान की गुस्ताखियों का परिणाम निकल रहा है। मौसम में इस रफ्तार से बदलाव या उतार-चढ़ाव की जड़ें कहां हैं, यह खोजने या उस पर सोचना या तो जरूरी नहीं समझा जाता या फिर इतनी ही जानकारी होती है। वैसे मानवीय प्रवृत्ति ऐसे बदलावों से ज्यादा परेशान नहीं दिखती। कुछ दिन बाद फिर से असंतुलित विकास का स्वागत हो रहा होता है।

दुर्घटना के बाद आपातकालीन बैठक, अनुशासन समिति, किसी को भी किसी भी कीमत पर न बख्शने की सख्त घोषणा, समृद्ध लोकतांत्रिक परंपरा बन कर रह गई है। बुरा वक्त धीरे-धीरे करीब आ रहा है, जब हम अपने किए फैसलों के लिए खुद पर बिफरेंगे। एक-दूसरे को कोसेंगे, झगड़ेंगे और आपस में लड़ेंगे, लेकिन तब तक कुदरत की दौलत बर्बाद कर चुके होंगे। पर्यावरण और अधिक असंतुलित हो जाएगा। असीमित नुकसान हो चुका होगा। धन कुबेर तो कहीं भी जा सकते हैं, लेकिन सामान्य, सीधे, सरल, शांत और संतुष्ट बाशिंदों पर क्या गुजरेगी। पर्यटकों को चौड़ी सड़कों के माध्यम से पर्यटक स्थलों पर जल्दी पहुंचाया जा रहा है।

अन्य राजनीतिक योजनाएं भी विचाराधीन हैं, जिन पर सवार होकर ज्यादा पर्यटक और जल्दी पहुंचेंगे। इन योजनाएं से आवाजाही और भगदड़ खूब बढ़ेगी। किसी को फुर्सत नहीं कि कभी पहाड़ों से भी पूछ लें कि क्या वे और जख्मी होने के लिए तैयार हैं। पहाड़ों की सकल घरेलू उत्पाद में पर्यटन का जितना भी सहयोग हो, फिर भी कुछ दिनों बाद कोई क्षेत्रीय योजना घोषित होते ही कहा जाने लगता है, फलां क्षेत्र के पर्यटन को लगेंगे पंख। किसी ने पर्यटन को वास्तविक आधार देने के बारे में विचार नहीं किया। सबसे पहले तो संभालने, संवारने और बचाए रखने की ज्यादा जरूरत है।

विशेषज्ञों की यह चेतावनी भी भुला दी गई है कि इमारतों के मोहल्लों को बुरे वक्त ने जिस लम्हा मनमाने तरीके से गलत कोण पर हिला दिया, उसका नतीजा कहर ही होगा। मगर हम उन्मुक्त होकर, खुद को स्वार्थ के चक्र में फंसाकर विकास की मेहमान नवाजी किए जा रहे हैं। खबर आती है कि आने वाले वर्षाें में करोड़ों औषधीय पौधे रोपे जाएंगे। कब वे पौधे रोपित होंगे और कब पर्यावरण को फायदा होगा, कह नहीं सकते।

कल्पना कर सकते हैं कि शहर का जन-जीवन वीरान हो जाए। इंसान वहां से चले जाएं, तो जंगलों को कितना आराम मिल सकता है। नदियां स्वच्छ पानी से लबरेज हो सकती हैं। जंगली जानवर, जिन्हें दिन के उजाले में बस्तियों में आकर अपना अधिकार मांगना पड़ता है, उन्हें सत्याग्रह नहीं करना पड़ेगा। वास्तव में ऐसा तो तब ही होगा, जब कुदरत को नुकसान पहुंचाने वाला बुद्धिमान इंसान वहां नहीं होगा।

सवाल यह है कि क्या हम समय रहते पहाड़ से अपने संबंधों को नियंत्रित कर संवेदनशील होना चाहते हैं या सिर्फ अपनी गलतियां ही दोहराते रहेंगे। विदेश में इन मुद्दों पर किस तरह विरोध प्रदर्शन किए जाते हैं, यह जिक्र करना हमारे यहां कोई अर्थ नहीं रखता। फिलहाल तो हमें खुद को बचाने के लिए संभावित विकास के हमलों से बचकर रहने की बहुत जरूरत है।