ईरान पर अमेरिका और इजराइल के सैन्य हमले के बाद रसोई गैस की आपूर्ति में आई बाधाओं ने भारत की ऊर्जा व्यवस्था में संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर कर दिया है। देश प्रतिवर्ष रसोई गैस के आयात पर लगभग 26.4 अरब डालर खर्च करता है। इस आयात का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से होकर ऐसे समुद्री मार्गों से आता है जो भू-राजनीतिक तनावों के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैं। होर्मुज जलमार्ग पर किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा असर भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ता है।

हालिया वैश्विक परिस्थितियों ने स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा के लिए बाहरी निर्भरता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक जोखिम भी है। इस पृष्ठभूमि में जब घरेलू स्तर पर गैस की उपलब्धता प्रभावित होती है या कीमतों में तेजी आती है, तो इसका सबसे अधिक असर उन परिवारों पर पड़ता है, जिनके लिए रसोई गैस दैनिक जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। इस संकट ने यह प्रश्न खड़ा किया है कि क्या भारत को अपनी ऊर्जा संरचना में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता है?

भारत में रसोई गैस का प्रसार पिछले एक दशक में तेजी से हुआ है। वर्ष 2015 में जहां देश में लगभग 15 करोड़ रसोई गैस कनेक्शन थे, वहीं वर्ष 2025 तक यह संख्या बढ़ कर 33 करोड़ से अधिक हो गई। यह वृद्धि मुख्यत: सरकारी योजनाओं के कारण संभव हुई, जिनका उद्देश्य स्वच्छ ईंधन को गरीब और ग्रामीण परिवारों तक पहुंचाना था। इसके बावजूद वास्तविकता यह है कि देश के लगभग 37 फीसद परिवार अब भी पारंपरिक ईंधन जैसे लकड़ी, उपले और कोयले पर निर्भर हैं। इसका एक प्रमुख कारण रसोई गैस की बढ़ती लागत है।

जब एक सिलेंडर की कीमत घरेलू आय के अनुपात में अधिक हो जाती है, तो गरीब परिवार पारंपरिक ईंधन की ओर लौट जाते हैं। इससे न केवल प्रदूषण बढ़ता है, बल्कि स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी पैदा होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, घरेलू वायु प्रदूषण से हर वर्ष लाखों लोगों की मृत्यु होती है।

भारत की ऊर्जा संरचना में एक बड़ी चुनौती इसकी आयात निर्भरता है। देश अपनी लगभग साठ फीसद रसोई गैस और लगभग आधी प्राकृतिक गैस की आवश्यकता आयात से पूरी करता है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में रसोई गैस और प्राकृतिक गैस का कुल आयात बिल 26.4 अरब डालर तक पहुंच गया, जो छह वर्ष पहले की तुलना में लगभग 50 फीसद अधिक है। यह वृद्धि वैश्विक बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव और मांग में वृद्धि के कारण हुई है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतें बढ़ती हैं, तो उसका सीधा असर घरेलू कीमतों पर पड़ता है।

सरकार की ओर से दी जाने वाली सबसिडी इस प्रभाव को कुछ हद तक कम कर सकती है, परंतु बढ़ते वित्तीय दबाव के कारण इसे लंबे समय तक बनाए रखना कठिन हो जाता है। ऐसे में उपभोक्ताओं को अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। इस स्थिति ने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की खोज को अनिवार्य बना दिया है।

इस समय बिजली आधारित खाना पकाने का विकल्प एक महत्त्वपूर्ण समाधान के रूप में उभर रहा है। हाल के अध्ययनों से यह संकेत मिला है कि शहरी क्षेत्रों में बिजली से खाना बनाना रसोई गैस की तुलना में सस्ता पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, दिल्ली में चार सदस्यों वाले एक परिवार के लिए बिजली आधारित चूल्हे से खाना पकाना रसोई गैस की तुलना में लगभग 37 फीसद सस्ता पाया गया, जबकि पाइप गैस की तुलना में यह लगभग 14 फीसद सस्ती है।

ऊर्जा दक्षता के दृष्टिकोण से भी बिजली आधारित उपकरण अधिक प्रभावी होते हैं। इंडक्शन चूल्हे में लगभग 85 फीसद ऊर्जा सीधे बर्तन तक पहुंचती है, जबकि गैस बर्नर में यह केवल चालीस फीसद के आसपास होती है और शेष ऊर्जा वातावरण में नष्ट हो जाती है। इसके अलावा, इलेक्ट्रिक प्रेशर कुकर जैसे उपकरण ऊर्जा की खपत को और कम कर देते हैं।

हालांकि, इस परिवर्तन के मार्ग में कई चुनौतियां भी हैं। भारतीय रसोई की संरचना और खाना पकाने की शैली विविध और जटिल है। यहां एक ही समय में कई व्यंजन तैयार किए जाते हैं, जिसके लिए कई बर्नर की आवश्यकता होती है। वर्तमान में बिजली से चलने वाले अधिकांश चूल्हे एकल प्लेट वाले होते हैं, जो इस आवश्यकता को पूरा नहीं कर पाते। इसके अलावा कई पारंपरिक व्यंजन उच्च तापमान और खुली आंच की मांग करते हैं, जो गैस के माध्यम से अधिक सहजता से प्राप्त होती है। इसलिए यह आवश्यक है कि तकनीकी नवाचार के माध्यम से ऐसे उपकरण विकसित किए जाएं जो भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल हों। यदि यह अनुकूलन नहीं किया गया, तो उपभोक्ताओं के लिए इस परिवर्तन को अपनाना कठिन रहेगा।

बिजली आधारित चूल्हे के विस्तार का एक बड़ा असर बिजली की मांग पर पड़ता है। गौरतलब है कि भारत में बिजली की अधिकतम मांग वर्ष 2014 में लगभग 148 गीगावाट थी, जो वर्ष 2025 तक बढ़ कर 240 गीगावाट से अधिक हो गई है। यह वृद्धि मुख्यत: शहरीकरण, औद्योगीकरण और तापमान में वृद्धि के कारण हुई है। यदि बड़ी संख्या में परिवार खाना पकाने के लिए बिजली का उपयोग करने लगते हैं, तो यह मांग और अधिक बढ़ सकती है। विशेषकर शाम के समय, जब अधिकांश घरों में खाना पकाया जाता है।

इस चुनौती से निपटने के लिए उन्नत तकनीकों का उपयोग आवश्यक है। स्मार्ट ग्रिड और मांग प्रबंधन प्रणाली इस दिशा में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। ‘ओपनएडीआर’ जैसी प्रणाली बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन स्थापित करने में सहायक है। इसके माध्यम से उपकरणों को इस प्रकार नियंत्रित किया जा सकता है कि वे आवश्यकता अनुसार अपनी ऊर्जा खपत को समायोजित करें। भारत में इसके प्रारंभिक उपयोगों में सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं, जहां अत्यधिक मांग को कम करने में सफलता मिली है।


सौर ऊर्जा और ऊर्जा भंडारण इस परिवर्तन को और अधिक व्यावहारिक बना सकते हैं। भारत में सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएं हैं और छतों पर सौर पैनल लगाने की प्रवृत्ति धीरे-धीरे बढ़ रही है। यदि घरों में दिन के समय उत्पन्न ऊर्जा को बैटरी में जमा कर रखी जाए और शाम के समय खाना पकाने में उपयोग किया जाए, तो मांग पर दबाव कम किया जा सकता है। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर ऊर्जा का आदान-प्रदान भी एक समाधान हो सकता है, जिसमें पड़ोसी एक-दूसरे के साथ अतिरिक्त बिजली साझा करते हैं। इस प्रकार की ऊर्जा प्रणाली न केवल अधिक लचीली होती है, बल्कि यह ऊर्जा आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा देती है।


नीतिगत स्तर पर भी कई सुधारों की आवश्यकता है। रसोई गैस पर दी जाने वाली सबसिडी का एक हिस्सा बिजली आधारित उपकरणों को बढ़ावा देने के लिए उपयोग किया जा सकता है। इसके अलावा सस्ती और उन्नत तकनीक वाले उपकरणों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। नए घरों और शहरी विकास योजनाओं में बिजली आधारित रसोई को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही, गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए, ताकि उपभोक्ताओं का भरोसा बना रहे। यदि ये कदम उठाए जाते हैं, तो यह परिवर्तन अधिक सुगम और प्रभावी हो सकता है। रसोई गैस की आपूर्ति में आई बाधाएं केवल एक अस्थायी संकट नहीं हैं, बल्कि वे भारत की ऊर्जा व्यवस्था में एक गहरे परिवर्तन की आवश्यकता को दर्शाती हैं।